Moral Lessons of Satyapal Malik Affair: Mantri ji, Avoid Embarrassment-Unless You are Asking for it!

रेल के निर्णय बताते हैं कि कैसे #KMG के वर्चस्व के चलते रेलवे बोर्ड मेंबर्स के हाथ में कोई नियंत्रण नहीं बचा। न वे रोटेशन कर पा रहे हैं, न ही भ्रष्ट-अकर्मण्य को मिल रहे संरक्षण को रोक पा रहे हैं! ऐसे में सरकार को और प्रधानमंत्री को सत्यपाल मलिक जैसा #embarrassment ही मिलेगा, ये निश्चित दिख रहा है!

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ‘ace communicator’ हैं, उनके एक ही वाक्य में संदर्भ और क्लिष्ट बातों का सार समा जाता है। ऐसा ही उन्होंने दिल्ली दरबार के इको-सिस्टम – इसके लाभार्थियों, उनकी सोच – को ‘खान मार्केट गैंग’ (#KMG) में समाहित कर दिया-

Please Read- Prime Minister Narendra Modi Interview to Indian Express:

Khan Market gang hasn’t created my image, 45 years of tapasya has.. you cannot dismantle it

रेल के प्रति प्रधानमंत्री का लगाव उनके भारतीय रेल के सिस्टम में किए रिकॉर्ड निवेश से ही पता चलता है। रेल सिस्टम में आधारभूत मुद्दों पर, जैसे ट्रैक रिन्यूअल, ब्रिज मेंटेनेंस, #ICF कोच रिटायरमेंट, #UMLC, जीरो-डिस्चार्ज टॉयलेट उनके स्वयं के दृढ़ संकल्प के बिना कठिन था। ट्रैक रिन्यूअल में तो प्रधानमंत्री ने बहुत कठिन राजनैतिक निर्णय लिया और ट्रेन पंक्चुअलिटी की कीमत पर उन्होंने रेल को सेफ बनाने के सारे प्रोजेक्ट इंप्लीमेंट करवाए। रवीश कुमार के जहरीले कटाक्ष लोग भूल नहीं सकते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री की संकल्प शक्ति ही थी जिसने इतनी आलोचना के बावजूद रेल सेफ्टी को पंक्चुअलिटी के ऊपर वरीयता दी।

हमने जब देखा कि पुरानी सरकारों कि भांति केंद्र में दूसरी बार सत्तारूढ़ मोदी सरकार को भी रेलमंत्री बार-बार बदलना पड़ा, तो हमने इस बात से उनको और उनकी सरकार को चेताया। #Railwhispers ने बार-बार बताया कि कैसे रेल में समाए #KhanMarketGang – जिसे रेलकर्मी अब #KMG के नाम से जानने लगे हैं – ने उनकी सभी पहलों (#initiatives) पर अपनी काली छाया डाल दी।

हमने बताया कि कैसे प्रधानमंत्री ने अपने राजनीतिक नेतृत्व की शुचिता दिखाते हुए रेल की स्थिति के लिए मंत्री के स्तर पर ज़िम्मेदारी तय की और रेल अधिकारियों को सम्मान दिया। लेकिन हमने उनसे यहां थोड़ा मतभेद रखा, हमारी रिसर्च ने यह बताया कि उनके चुने मंत्रियों की गलती वही थी जो दूसरी सरकारों के मंत्रियों की रही-मंत्री बदलते रहे, लेकिन #KMG को ये चिन्हित नहीं कर पाए।

जिस नेता को जो चाहिए, #KMG अपने हित को साधते मंत्री को शीशे में उतारते रहे। #KMG और ऑल इंडिया डेलही सर्विस (#AIDS) का इको-सिस्टम इतना मजबूत रहा कि मंत्री क्या पढ़ते हैं, क्या सोचते हैं, क्या और कहां से फीडबैक लेते हैं, मंत्रियों इन सब पर गतिविधियों पर #KMG का पूरा नियंत्रण रहा।

रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव एक ‘प्रॉमिसिंग मंत्री’ तो हैं, लेकिन कैसे इनके सलाहकार समूह ने इन्हें शीशे में उतारा, वह आज रेल व्यवस्था में चर्चा का विषय है। इस पर हमने बहुत विस्तार से लिखा। हमने यह भी बताया कि कैसे पूर्णतः गैरकानूनी आदेश मंत्री से साइन करवाए गए, हमने उनके सलाहकार के स्वयं की महत्वाकांक्षा के बारे में, उनकी तकनीकी अक्षमता (technical incompetence) के बारे में भी हमने प्रमाण सहित विस्तार से लिखा। हमें खेद यह है कि वह अक्षम (#incompetent) और भ्रष्ट (#corrupt) टीम को संरक्षण दे रहे हैं। मंत्री जी द्वारा 3 अप्रैल को दिए भाषण ने रेल अधिकारियों को भरोसा दिया कि विजिलेंस विभाग उनकी नजर में है। इससे रेल में छाए अंधियारे में थोड़ा प्रकाश हुआ।

हमने यह भी बताया कि कैसे रेल भवन के विजिलेंस प्रकोष्ठ में पदस्थ रहे वरिष्ठ प्रशासनिक वेतनमान (#SAG) स्तर के अधिकारियों के पास रेल में फील्ड पर जटिल काम करने का शून्य अनुभव रहा, जिसके कारण वे रेल में सरकार की नीति के अनुरूप संबंधित फाइलें समझने में पूरी तरह से असफल रहे और सैकड़ों बोल्ड, निष्ठावान और समर्पित अधिकारियों के कैरियर को बर्बाद कर गए और मंत्रीगण इस महत्वपूर्ण तथ्य को समझने में अब तक नाकामयाब रहे हैं।

रेलवे बोर्ड विजिलेंस के संरक्षण और समर्थन से कुछ अधिकारियों के ‘बिजनेस’ हित-साधन किए गए, इस विषय पर शीघ्र ही एक विस्तृत और गहन अनुसंधानात्मक रहस्योद्घाटन किया जाएगा!

रेल मंत्रालय को अपनी विजिलेंस व्यवस्था इसीलिए दी गई, क्योंकि यहां हर पल ऐसे निर्णय लिए जाते हैं जिनका वित्तीय इम्प्लिकेशन होता है और व्यवस्था समझे बिना निर्णय में निहित #vigilance_angle नहीं समझा जा सकता। मोदी जी, आपकी सरकार में इस चिह्नित नेक्सस ने सैकड़ों निष्ठावान, कर्मठ अधिकारियों के उत्साह और कैरियर को बर्बाद कर दिया। ऐसा नहीं कि रेल में भ्रष्ट अधिकारियों की कोई कमी है। उन पर भी हमने मुखर होकर लिखा, लगातार लिख रहे हैं, और बता रहे हैं कि रेल में भ्रष्टाचार के मूल में रोटेशन पालिसी को लागू न करना है। मोदी जी, हमने आपके संसदीय क्षेत्र में पनप रहे माफिया के बारे में भी लिखा।

फीडबैक न लेने का परिणाम हमने यहां लिखा-

फीडबैक का संज्ञान न लेने से फैलते कैंसर की जवाबदेही किसकी – मंत्री, सीआरबी, सीवीसी?

लगातार जारी #KMG सीरीज में हमने बताया कि कैसे ऐसा तंत्र रेलमंत्री को घेरे है जिसने 50 साल से ज्यादा रेल भवन में निकाल दिया-जो इसमें निहित था वह यह कि ये अफसर किसी मंत्री या सरकार के सगे नहीं हैं। रेल अधिकारी खुले रूप से अब बोलने लगे हैं कि “उन्हें परिवर्तन नहीं दिखा, क्योंकि व्यवस्था को दुहने वाले पहले भी वही अफसर थे, जो आज भी हैं-कुछ नहीं बदला है?”

हमने एक प्रोवोकेटिव लेख प्रकाशित किया-

योगी जी के राज में अतीक-मुख्तार का राज और अय्याशी कैसे चली?

इसमें हमने बताया कि कैसे सरकार की नाक के नीचे एक बहुत बड़ा वर्ग है सरकारी कर्मचारियों का, जिन्हें केवल अपना हित दिखता है-सरकार की किरकिरी भी जबरदस्त होती है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व बेबस बना रहता है।

लेकिन फिर आते हैं सत्यपाल मलिक सरीखे लोग-

कई राजनीतिक दलों से कूदते-फांदते श्री मलिक सरकार में अपने लेफ्ट लिबरल गैंग के मित्रों के तंत्र पर सवार होकर एक के बाद एक गवर्नर के पद लेते रहे हैं। उनके मामले में सरकार से वही गलती हुई जो रेल में वह कर रही है, सरकार अपने एजेंडा के प्रति कटिबद्ध अधिकारियों को दरकिनार कर भ्रष्ट, अकर्मण्य, अक्षम, जुगाड़ू, गैरनिष्ठावान, गैरभरोसेमंद और सरकार के एजेंडा के बजाय अपना एजेंडा लागू करने वाले मलिक जैसे उन अधिकारियों को पोसती रही, जिन्हें पिछली सरकारों ने पैदा करके पाला-पोसा था।

मलिक साहब के दावे, जैसे पुलवामा पर उनका बचकाना वक्तव्य अत्यंत दुखद और निपट बेसिर-पैर का है। थोड़ी समझ और थोड़े विश्लेषण से ही यह पता चल जाता है कि मालिक साहब एक व्यर्थ की सनसनी फैलाकर राजनीतिक लाभ ढूंढ़ रहे हैं-

Modi Silenced Me on Lapses Leading to Pulwama, Is Ignorant on J&K, Has No Problem with Corruption

इस पर सोशल मीडिया में एक अच्छी टिप्पणी आई कि “कैसे ये भाजपा को सबक है अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं के ऊपर अवसरवादियों को आगे करने का!”

भारतीय रेल और आम जानता की आकांक्षाएं

आप उत्तर प्रदेश-बिहार में कहीं भी चले जाएं आपको प्रमुखता से रेल में भर्ती की कोचिंग के पोस्टर दिख जाएंगे। रेल जैसी व्यवस्थाएं बहुत बड़ी मैनपावर मांगती हैं। आज के परिवेश में यह सरकार के लिए वरदान साबित हो सकता है।

लेकिन रेल की भीतरी अक्षमता (#incompetence) को देखें, जहां एक ओर रेल में पोस्टें सरेंडर करवाई जा रही हैं, वहीं रोजगार मेले में जॉब ऑफर बांटे जा रहे हैं-हालांकि इसका हम स्वागत करते हैं, लेकिन दूसरी ओर ऐसी चिट्ठियां आ जाती हैं-जो कहती हैं कि हमसे गलत भर्ती हो गई! 390 स्टेशन मास्टर और 292 गुड्स गार्ड अधिक भर्ती हो गए और इनके लिए काम नहीं है!

Surplus recruitment by Northern Railway

इस विषय पर हमारा ट्वीट देखें-

हमने इंजीनियरिंग कैडर्स के फेलियर के बारे में यहां लिखा था:

“Third Party Inspection: जब तैराक तैरना भूल जाए, तो उसे क्या कहेंगे?”

यह दो निर्णय बताते हैं कि कैसे #KMG के वर्चस्व के चलते रेलवे बोर्ड मेंबर्स के हाथ में कोई नियंत्रण नहीं बचा। न वे रोटेशन कर पा रहे हैं, न ही भ्रष्ट-अकर्मण्य को मिल रहे संरक्षण को रोक पा रहे हैं! ऐसे में सरकार को और प्रधानमंत्री को सत्यपाल मलिक जैसा #embarrassment ही मिलेगा, ये निश्चित दिख रहा है। हमारी रिसर्च कुछ विचलित करने वाले तथ्य पुष्ट कर रही है, लेकिन यदि रेल भवन में बैठे वरिष्ठ रेल अधिकारी सोने का अभिनय कर रहे हैं, तो उन्हें कौन जगा सकता है? क्रमशः जारी..

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी