रेल भवन में शीर्ष पद का राजनीतिक मोह: विस्तार और वर्चस्व की होड़ में व्यवस्था का बंटाधार होने का संकट

व्यवस्था से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं हो सकता, और डरा-धमकाकर चलाया जा रहा अस्थाई ढ़ांचा बहुत दिनों तक इस वर्चस्व के अहंकार को नहीं झेल पाएगा!

सुरेश त्रिपाठी

भारतीय रेल के सर्वोच्च प्रशासनिक पद, चेयरमैन रेलवे बोर्ड (सीआरबी) को लेकर इन दिनों रेल अधिकारियों और रेल भवन के गलियारों में एक नया और बेहद गंभीर विमर्श (नैरेटिव) चल रहा है। रेल अधिकारियों के बीच दबी जुबान में वर्तमान चेयरमैन को “कॉकरोच ऑफ रेलवे बोर्ड” का एक नया उपनाम दिया गया है, और उनको रेलमंत्री बनाए जाने की चर्चाएं इस समय अपने चरम पर हैं। अधिकारियों का एक धड़ा मानता है कि यदि इन चर्चाओं में तनिक भी सत्यता हुई और यदि वे वास्तव में रेलमंत्री के पद तक पहुँच गए, तो उनकी वर्तमान तिकड़मी कार्यशैली और कदाचारपूर्ण प्रशासनिक गतिविधियां अपनी पराकाष्ठा पर चली जाएंगी। यद्यपि नीतिगत मामलों के जानकार इसे बहुत दूर की कौड़ी और एक काल्पनिक विचार मानते हैं, परंतु राजनीति और समय के चक्र में किसी भी संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

सोशल मीडिया से साभार

इस पूरे प्रकरण के पीछे अंदरूनी रणनीति और अत्यंत गुप्त तरीके से की जा रही सेटिंग की बातें भी सामने आ रही हैं। उद्देश्य यह दिखाया जा रहा है कि वर्तमान रेलमंत्री के स्थान पर इनसे बेहतर और कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस योजना को हवा देने वाले उनके एक अत्यंत करीबी और प्रभावशाली व्यक्ति हैं, जो वर्तमान रेलमंत्री से व्यक्तिगत रूप से असंतुष्ट बताए जाते हैं। हाल ही में एक बंद कमरे की बैठक में उस व्यक्ति के मुंह से यह बात अनजाने में ही निकल गई कि जिस प्रकार विदेश मंत्रालय में एस. जयशंकर को मंत्री बनाना एक सफल प्रयोग था, ठीक उसी प्रकार वर्तमान सीआरबी को रेलमंत्री बनाना भी एक सही निर्णय साबित होगा। हालांकि, यह तुलना करते समय वे यह भूल गए कि रेल भवन के भीतर ही कई वरिष्ठ रेल अधिकारी इस विचार से कतई सहमति नहीं रखते, और उन्होंने इस गोपनीय बैठक में ही इस गर्वोक्ति पर अपनी आपत्ति भी दर्ज करा दी थी।

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भीतरी सूत्रों के अनुसार, यह महाशय पिछले कुछ महीनों से अत्यंत गोपनीय रूप से संगठन और सत्तारूढ़ दल के उन प्रभावशाली लोगों से निरंतर मुलाकातें कर रहे हैं, जो वर्तमान रेलमंत्री की कार्यप्रणाली से पूरी तरह प्रसन्न नहीं हैं। रेलवे को कवर करने वाले देश के कुछ बड़े और अनुभवी पत्रकारों का इस विषय पर कहना है कि सत्ता के शीर्ष पर कुछ भी संभव है, परंतु यदि ऐसा कोई निर्णय लिया गया, तो भारतीय रेल के पूरे तंत्र का बंटाधार होना निश्चित है। जबकि कुछ वरिष्ठ रेल अधिकारियों का मानना है कि इस प्रशासनिक उलटफेर का परिणाम यह होगा कि कुछ महत्वपूर्ण विभाग पूरी तरह बंद कर दिए जाएंगे, और कई ईमानदार, योग्य तथा सक्षम सीनियर ऑफिसर्स या तो स्वयं नौकरी छोड़ देंगे या फिर उन पर दबाव बनाकर उनसे नौकरी छुड़वा दी जाएगी। वर्तमान सीआरबी की प्रशासनिक कार्यशैली को देखते हुए यह भय भी व्याप्त है कि किसी भी अनावश्यक और छोटी सी चीज को तिल का ताड़ बना दिया जाएगा, जबकि सबसे आवश्यक और सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को पूरी तरह महत्वहीन और टालमटोल करके केवल समय काटने का प्रयास किया जाएगा।

इस प्रशासनिक असमंजस के बीच एक अत्यंत अव्यावहारिक तर्क भी तैर रहा है कि चूँकि हर काम के लिए मैकेनिकल डिपार्टमेंट ही केवल सक्षम रह गया है, इसलिए रेलवे के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अंतर्गत आने वाले ट्रैक और ब्रिज (पुल) के रखरखाव का पूरा काम भी मैकेनिकल विभाग को सौंप दिया जाए। इसके पीछे यह बेतुका तर्क दिया जा रहा है कि सिविल इंजीनियर्स कार्य की क्वालिटी को मेनटेन करने में पूरी तरह असफल रहे हैं, और चूंकि ट्रैक तथा रेल पुलों का वास्तविक प्रयोग रोलिंग स्टॉक (मैकेनिकल विभाग) ही करता है, इसलिए मैकेनिकल विभाग ही इस पूरे इंजीनियरिंग ढ़ांचे को सही तरीके से संचालित कर सकता है। रेलवे बोर्ड और पूरे रेल तंत्र में इस समय यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि शीर्ष पर बैठे लोग रेल समस्याओं की गहराई को समझने और उनका कोई दीर्घकालिक या परमानेंट सोल्यूशन देने के बजाय केवल डांट-डपट, भय का वातावरण बनाने, अपमानित करने और धमकी देने के एडहॉक तरीके से काम कर रहे हैं। लिखित रूप में आदेश जारी करने और जिम्मेदारी लेने के बजाय बड़े और संवेदनशील ऑर्डर्स केवल मुंहजबानी देकर काम निकालना ही बोर्ड के वर्तमान नेतृत्व का मुख्य उद्देश्य रह गया है।

यह तथ्य भी जगजाहिर हो चुका है कि सीआरबी प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) या कैबिनेट सेक्रेटरी स्तर की किसी भी महत्वपूर्ण बैठक में किसी अन्य बोर्ड मेंबर, एडिशनल मेंबर या अधीनस्थ अधिकारी को अपने साथ ले जाना पसंद नहीं करते। वे इन बैठकों में अकेले ही जाते हैं, ताकि कोई अन्य योग्य अधिकारी अपनी क्षमता से उनकी जगह न ले सके और उनके व्यक्तिगत पीआर (पब्लिक रिलेशंस) में कोई बाधा न आए। उनके इर्द-गिर्द रहने वाले चापलूसों और करीबियों को अभी भी उनके रेलमंत्री बनने की पूरी उम्मीद है। उनका कहना है कि यदि किसी कारणवश वे मंत्री नहीं भी बन पाए, तो देश का कोई अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक पद उन्हें अवश्य मिल जाएगा। यदि वह भी संभव न हुआ, तो अगला सर्विस कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन तो पक्का ही है। उनके घोर शुभचिंतक यहां तक दावा कर रहे हैं कि एक्सटेंशन मिलने के बाद अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनावों के पश्चात, ए. के. शर्मा के मॉडल की तरह, इन्हें भी सीधे उत्तर प्रदेश में केंद्रीय कोटे से मंत्री बनाकर भेजा जा सकता है।

परंतु, इतिहास साक्षी है कि भारतीय रेल के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग जब अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में आते हैं, तो अपना वर्चस्व और प्रभाव बनाए रखने के लिए इस प्रकार की राजनीतिक चर्चाओं और अफवाहों को स्वयं ही हवा देते हैं। पूर्व में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड रह चुके के. सी. जेना का उदाहरण सबके सामने है, जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार में उड़ीसा से लोकसभा चुनाव का टिकट मिलने की अफवाहों को खूब हवा दी थी। उस समय भी ऐसा ही वातावरण बनाया गया था, मगर अंततः उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ और सेवानिवृत्ति के बाद वे पूरी तरह गुमनामी के अंधेरे में खो गए। वर्तमान नेतृत्व को भी इतिहास के इस पन्ने से सीख लेनी चाहिए कि चालाकी, तिकड़मबाजी और रेलवे के प्रशासनिक तंत्र को पंगु बनाकर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने वाले नौकरशाहों का अंत केवल गुमनामी और विफलता ही होता है। व्यवस्था से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं हो सकता, और डरा-धमकाकर चलाया जा रहा यह अस्थाई ढ़ांचा बहुत दिनों तक इस वर्चस्व की लड़ाई अथवा अहंकार को नहीं झेल पाएगा!