प्रधानमंत्री की अपील के बाद रेलवे में कितनी ईंधन बचत हुई!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सरकारी खर्च कम करने, ईंधन बचाने और सरकारी व्यवस्था में अनावश्यक खर्च रोकने की बात कह रहे हैं। प्रधानमंत्री केवल कह नहीं रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपने बेड़े और खर्चों में भी कटौती कर दी है। ऐसे में सबसे पहले जिस विभाग पर निगाह जाती है—वह है भारतीय रेल। रेलवे देश की सबसे बड़ी सरकारी व्यवस्थाओं में से एक है, जहां अधिकारियों, रेलवे बोर्ड, जोनल कार्यालयों और इसके विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में सरकारी और किराये पर ली गई गाड़ियों का उपयोग होता है। जनता जानना चाहती है कि प्रधानमंत्री के ईंधन बचत वाली अपील के बाद रेलवे में वास्तव में कितना बदलाव आया, कितनी बचत हुई, और इसका रेल अधिकारियों पर कितना असर पड़ा!
रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव को इस विषय पर पूरे भारतीय रेल में तत्काल एक बड़ा ऑडिट करवाना चाहिए। यह ऑडिट रेलवे बोर्ड, सभी जोन, डिवीजन, उत्पादन इकाईयों और रेलवे के पीएसयू तक सभी में होना चाहिए। खासतौर पर अधिकारियों के लिए किराये पर ली गई गाड़ियों, उनके ईंधन खर्च, ड्राइवर खर्च और वाहन उपयोग की पूरी जांच होनी चाहिए। यह देखा जाना आवश्यक है कि कितनी गाड़ियां वास्तव में चाहिए और कितनी वास्तव में केवल सुविधा और साहबियत बघारने के नाम पर चल रही हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या सरकारी गाड़ियों का उपयोग केवल सरकारी कार्यों के लिए हो रहा है या फिर घर के उपयोग, निजी कार्यों, परिवार के उपयोग और अनावश्यक आवाजाही में भी सरकारी ईंधन खर्च किया जा रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सीआरबी से लेकर बोर्ड मेंबर्स और जीएम, पीएचओडी तक के आवासों में परिवार के उपयोग के लिए ठीक उसी तरह सरकारी खर्च पर गाड़ियाँ उपलब्ध हैं जिस तरह बड़ी संख्या में डिपार्टमेंटल और कॉन्ट्रैक्चुअल लेबर का दुरुपयोग इनके आवासों में होता है। यदि प्रधानमंत्री स्वयं बचत की बात कर रहे हैं, तो रेलवे जैसी बड़ी संस्था में भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
रेल मंत्रालय को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि प्रधानमंत्री के बयान के बाद रेलवे में पेट्रोल और डीजल खर्च में कितनी कमी आई। कितनी गाड़ियों को कार्यालयों से हटाया गया, कितने वाहन अनुबंध कम किए गए, और किराये की गाड़ियों पर होने वाला खर्च कितना घटा। यदि कोई वास्तविक बचत हुई है तो उसका आंकड़ा जनता के सामने रखा जाना चाहिए। केवल आदेश या अपील जारी कर देना पर्याप्त नहीं है, परिणाम भी दिखने चाहिए।
रेलवे को यह भी जांचना चाहिए कि वाहन हायरिंग के नए टेंडरों में कमी आई या नहीं। क्या लग्जरी और अनावश्यक गाड़ियों का उपयोग बंद किया गया? क्या साझा वाहन व्यवस्था लागू की गई? यदि नहीं, तो फिर ईंधन बचत का दावा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा। वास्तव में तो वाहन हायरिंग के मामले में ये रेल अधिकारी ही सरकार को चूना लगा रहे हैं। सबको पता है कि जिन वाहनों में पीली नंबर प्लेट लगी है, वे ही कमर्शियल वाहन की श्रेणी में आते हैं और सरकार को टैक्स भरते हैं, जबकि रेलवे में लगभग नब्बे प्रतिशत हायर की गई सफेद नंबर प्लेट वाली गाड़ियाँ चल रही हैं, जिनसे सरकार को कोई कमर्शियल टैक्स नहीं मिलता। यह एक बहुत बड़ा रैकेट रेलवे में लंबे अर्से से चल रहा है।
आज समय की मांग है कि रेलवे स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे। अधिकारियों और कर्मचारियों को कार पूलिंग अपनाने, साझा सरकारी वाहन उपयोग करने और शहरों में सार्वजनिक परिवहन जैसे मेट्रो या बस का अधिक उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जहां संभव हो, वहां इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग भी बढ़ाया जाना चाहिए। क्या यह वास्तव में संभव हो पाएगा? जहां नॉन-रोटेशन के चलते हर अधिकारी आरामतलब हो गया है, और सरकार रोटेशन कराने में स्वयं को असमर्थ पा रही हों, वहां गाड़ियों का दुरूपयोग रोक पाना क्या आसान होगा?
भारतीय रेल यदि वास्तव में ईंधन बचत और खर्च नियंत्रण को गंभीरता से लागू करे, तो हर साल करोड़ों रुपये की बचत संभव है। लेकिन इसके लिए पारदर्शिता आवश्यक है। रेल मंत्रालय को वाहन उपयोग, ईंधन खर्च, हायरिंग टेंडर और बचत के आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। इससे जनता का विश्वास बढ़ेगा और यह साबित होगा कि प्रधानमंत्री की बचत संबंधी अपील केवल भाषण नहीं, बल्कि धरातल पर लागू नीति है।

