रेल में वर्दी का समानांतर अवैध साम्राज्य: वेंटिलेटर पर रेल व्यवस्था

अवैध वेंडरों का खौफ: भारतीय रेल में रक्षक ही बने भक्षक

असीमित अधिकार, बेलगाम वर्दी: पतन की ओर भारतीय रेल

अवैध उगाही और खाकी का तांडव: दम तोड़ती रेल व्यवस्था

आगरा/भोपाल: भारतीय रेल में यात्रियों की सुरक्षा और सुगम यात्रा का जिम्मा संभालने वाला रेलवे सुरक्षा बल (#RPF) अब खुद रेल प्रणाली और यात्रियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में सामने आए दो बेहद गंभीर मामलों ने यह साबित कर दिया है कि आरपीएफ के कुछ तत्वों ने रेल परिसर में एक भयावह ‘समानांतर अवैध साम्राज्य’ स्थापित कर लिया है, जहां नियम-कानून नहीं, बल्कि खाकी की धौंस और उगाही का खेल खुलेआम चलता है। आगरा कैंट स्टेशन पर ऑन-ड्यूटी डिप्टी स्टेशन अधीक्षक के साथ आरपीएफ जवानों द्वारा की गई बर्बरता और चलती ट्रेन में अनधिकृत वेंडरों द्वारा वैध पैंट्री स्टाफ पर जानलेवा हमले की भयावह घटनाएँ, रेल प्रशासन और पूरी तरह पंगु हो चुके सिस्टम तथा शीर्ष अधिकारियों के नकारेपन की गवाही दे रही हैं।

ताजा और बेहद शर्मनाक मामला 12 जुलाई 2026 को आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर सामने आया, जहां लुधियाना से हीराकुंड एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 20808) में यात्रा कर रही एक महिला यात्री रंजीता राव प्लेटफॉर्म पर पेठा खरीदने उतरीं और ट्रेन चल दी। अपना बच्चा ट्रेन में अकेला छूट जाने से घबराई महिला की गुहार पर ऑन-ड्यूटी डिप्टी स्टेशन अधीक्षक नरेंद्र सिंह चाहर ने मानवता और कर्तव्य का परिचय देते हुए गार्ड को तुरंत वाकी-टाकी पर संदेश देकर ट्रेन को आधिकारिक तौर पर रुकवाया। लेकिन इस मानवीय कार्य को अवैध ‘चेन पुलिंग’ (#ACP) समझने की जिद पर अड़े आरपीएफ कर्मियों ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। आरपीएफ के सिपाहियों ने न केवल पीड़ित महिला यात्री से जबरन एक हजार रुपये ऐंठ लिए चेन पुलिंग के कथित अपराध में दंड के तौर पर और उसका मोबाइल भी छीन लिया, बल्कि जब डिप्टी स्टेशन अधीक्षक ने स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया, तो आरपीएफ कर्मी बेहद शर्मनाक रूप से हिंसक हो उठे। आरपीएफ स्टाफ ने यात्रियों के सामने ऑन-ड्यूटी स्टेशन मास्टर की कॉलर पकड़ी, गाली-गलौज के साथ पहले चेंबर में मारपीट की और फिर उन्हें एक खतरनाक अपराधी की तरह प्लेटफार्म पर पीटते और घसीटते हुए बर्बरतापूर्वक चौकी ले गए, और जान से मारने की धमकी भी दी।

https://twitter.com/railwhispers/status/2076242071296655722?s=46

यह घटना इसलिए भी अधिक भयावह और चिंताजनक है, क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम अथवा आरपीएफ के तांडव के दौरान रेलवे के ऑपरेटिंग, कमर्शियल, मैकेनिकल और एसएंडटी जैसे विभागों का कोई भी स्टाफ आरपीएफ के आतंक के आगे अपने सहकर्मी को बचाने की हिम्मत नहीं जुटा सका और सभी मूकदर्शक बने रहे। हालांकि, वीडियो वायरल होने और चौतरफा थू-थू के बाद रेल प्रशासन ने आनन-फानन में जांच समिति गठित कर एएसआई मेघराज, एएसआई बालकिशन, कांस्टेबल बदन सिंह और कांस्टेबल जितेंद्र कुमार को निलंबित कर दिया, लेकिन यह कार्रवाई महज एक लीपापोती है। असल प्रश्न उस व्यवस्था पर है जिसने वर्दी को इतना निरंकुश बना दिया है कि वह अपने ही विभाग के वरिष्ठ सिविल अधिकारियों को सरेआम पीटने से नहीं हिचक रही है।

डीआरएम/आगरा मंडल का ट्विट

वर्दी के इसी कथित संरक्षण और समानांतर तंत्र का दूसरा डरावना चेहरा 10 जुलाई 2026 को ट्रेन संख्या 19490 गोरखपुर-अहमदाबाद एक्सप्रेस में देखने को मिला। विदिशा और निशातपुरा (संत हिरदाराम नगर) के बीच जितेंद्र सिंह उर्फ ‘चाचा’ नाम के एक अनधिकृत वेंडर ने पैंट्री कार के वैध लाइसेंसधारी (अंबुज होटल रियल स्टेट) के चार कर्मचारियों पर चाकू से ताबड़तोड़ जानलेवा हमला कर दिया, जिसमें शर्मा नाम का पैंट्री कार मैनेजर गंभीर रूप से घायल हो गया। यह घटना स्पष्ट करती है कि रेलवे और आईआरसीटीसी के अधिकृत वेंडर्स आज कितने असुरक्षित और दयनीय हालात में काम कर रहे हैं। रेलवे में यह खुली सच्चाई है कि लगभग 50 प्रतिशत कैटरिंग मार्केट पर आरपीएफ के संरक्षण में पलने वाले अवैध वेंडरों का कब्जा है। ये अवैध वेंडर आरपीएफ के कथित संरक्षण में ट्रेनों में लूट-मार और गुंडागर्दी करते हैं, जबकि बदनामी और वित्तीय नुकसान रेलवे तथा आईआरसीटीसी को झेलना पड़ता है।

इन दोनों घटनाओं के तार सीधे तौर पर हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा ‘जनविश्वास अधिनियम’ के तहत आरपीएफ को दिए गए असीमित अधिकारों से जुड़ते हैं। इस नए नियम के तहत आरपीएफ निरीक्षकों को रेल परिसरों और ट्रेनों में सीधे पेनल्टी लगाने, किसी को भी चेक करने और टिकट पूछने तक का अधिकार दे दिया गया है, जबकि लोकतांत्रिक और प्रशासनिक सिद्धांतों के तहत वर्दीधारी बल को हमेशा सिविलियन अथॉरिटी (जैसे टीटीई या स्टेशन मास्टर) के मातहत रखा जाना चाहिए। इन असीमित शक्तियों के कारण आरपीएफ के भीतर जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो गई है और वे एक निरंकुश बल में तब्दील होते जा रहे हैं। रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव को यह समझना होगा कि अगर रेलवे के शीर्ष कॉन्ट्रैक्ट नेतृत्व के मातहत इस वर्दीशाही और आरपीएफ के समानांतर साम्राज्य की जड़ का इलाज तुरंत नहीं किया गया, तो भारतीय रेल इस अराजक माहौल में अगले 10 साल भी सम्मानजनक ढ़ंग से नहीं चल पाएगी और इसका पूर्ण रूप से प्रशासनिक पतन निश्चित है।