संपादकीय: मोदी सरकार का सकारात्मक संदेश

मोदी सरकार का आंतरिक सिस्टम काम कर रहा है। जहां एक तरफ हाल के कई मुद्दों पर सरकार, मंत्री, पार्टी, नेता-प्रवक्ता के स्तर पर गहरी चुप्पी व्यापक जनमानस में गंभीर चिंता पैदा कर रही थी, वहीं दूसरी तरफ सरकार ने अपने एक मंत्री के निजी स्टाफ को तत्काल बाहर करके एक गहरा संदेश दिया है। भूपेंद्र यादव—एक बड़े नेता हैं और पब्लिक परसेप्शन में उनकी छवि भी साफ-सुथरी रही है। हाल ही में उनके निजी स्टाफ के चार अधिकारी अचानक ही ट्रांसफर कर दिए गए—ये ऐसा घटनाक्रम था, जो मोदी सरकार में अभूतपूर्व है। वैसे उनके मंत्रालय के काम के बारे में कोई नकारात्मक बात भी नहीं सुनाई दी थी।

सब कयास लगा रहे हैं कि आंतरिक स्कैनिंग में इनके निजी स्टाफ का कंडक्ट सही नहीं पाया गया, इसीलिए पीएमओ के निर्देश पर यह कदम उठाया गया। हम इस प्रकरण को बहुत सकारात्मक देखते हैं। प्रशासन में हमेशा करेक्टिव एक्शन लेने चाहिए, करेक्शन होते रहने चाहिए, और शीर्ष पर फीडबैक मैकेनिज्म मजबूत होना चाहिए। हमारा हमेशा मानना रहा है कि गलत काम का मूल्य—प्रशासनिक अधिकारी नहीं—बल्कि राजनैतिक नेतृत्व चुकाता है—चाहे वह कितना ही ईमानदार क्यों न हो! स्मरण रहे कि प्रशासनिक अधिकारियों की लॉयल्टी सदैव अपने कैडर के प्रति रहती है और ‘अपने अधिकारों’ के प्रति ही होती है, नेता तो आते-जाते रहते हैं। अंग्रेज परस्त भारतीय नौकरशाही की इस मानसिकता से नेतागण अवश्य परिचित होंगे!

मोदी जी से इस देश की जनता का यही आह्वान है कि अपने मंत्रालयों को “खान मार्केट गैंग” के चंगुल से छुड़वाएँ। आपके 360 डिग्री में अधिकांश वही लोग आ रहे हैं जिनकी स्लेट इसीलिए साफ है कि उस पर कुछ लिखा ही नहीं गया पूरे करियर में, क्योंकि उन्होंने कोई निर्णय ही नहीं लिया अपने पूरे करियर में। दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग आए हैं जो पूरे करियर में विवादास्पद रहे, जिनकी छवि हमेशा दागदार रही है पूरे करियर में! आज जब इतना रिकॉर्ड निवेश और परिवर्तन हो रहा है, आपको प्रशासनिक नेतृत्व में वे अधिकारी चाहिए जिन्होंने निर्णय लेने का प्रयास किया, जिन्होंने बड़ी समस्याओं से जूझने की हिम्मत दिखाई। जैसा कि एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा—“choose the leader who is battle scarred, not one who never ventured out.”

मोदी जी, आपने रेल में अभूतपूर्व स्तर पर निवेश किया। समझदार नेतृत्व इस निवेश से रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था, रेल की औसत गति, सरकार के लाभार्थी को कुछ लाभ भी मिला—रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में भी कुछ सुधार हुआ, लेकिन उतना नहीं जितना कि हो सकता था। ट्रांसफॉर्मेशन के नाम पर—जब रिकॉर्ड निवेश था—उस समय पूरी रेल की सर्विसेज में भूचाल ला दिया गया और फिर पहले से खराब स्थिति में लाकर छोड़ दिया गया।

राजनैतिक जर्नलिज्म ने हमें वे परिस्थितियां समझाईं, उनका अनुभव कराया, जो आपके मस्तिष्क पटल पर भी होंगी—आपका वोटर कौन है, वो जो हर घर नल, हर घर शौचालय, हर घर बिजली, हर गरीब के सिर पर छत के लाभार्थी हैं—तो क्यों नहीं ऐसे काम हों जिनसे भारत की सामरिक शक्ति बढ़े, आर्थिक प्रगति हो, और साथ ही वोटर लॉयल्टी भी हो—ये सभी उपलब्धियां एक साथ मिलें—मोदी जी के इसी तथ्य को ध्यान में रखकर और उसे “#ModiSense” कहकर हमने कई आर्टिकल लिखे—

5 June 2024: “Railgate-4: ‘मोदी-सेंस’ पर भारी पड़ा ‘सुधीर-सेंस’ का परिणाम!

27 Feb 2024: “Railway: Looking through Wrong End of the Telescope

15 January 2024: “Itch to Transform – Time to Summon Courage to Take Decisions that are Needed

रेलवे में हाल ही में हुए लेवल 16 के कुछ प्रमोशन में कुछेक बहुत चिंताजनक हैं, जैसा हमने वर्तमान रेलमंत्री जी को भी बताया—और पूर्व रेलमंत्री को भी बताया था—जिसकी अनदेखी-अनसुनी के परिणामस्वरूप ही उनके दोनों निजी स्टाफ को अंततः व्यवस्था से बाहर निकाला गया था। ऐसे कुछ चयन सिस्टम में लगी सेंध और दीमक दोनों को उजागर करते हैं। हालाँकि ऐसी मानवीय प्रवृत्तियां अथवा कोताहियां किसी से भी, किसी भी स्तर पर हो सकती हैं—इससे इनकार नहीं—तथापि पर्यावरण मंत्रालय में हुई सर्जिकल स्ट्राइक बहुत उम्मीद पैदा करती है कि मोदी सरकार ‘मिड-कोर्स करेक्शन’ से पीछे नहीं हटेगी!

हमारा यही कहना और मानना है, कि लाभार्थी सरकारी बाबू नहीं हो सकते—और न ही होने चाहिए—क्योंकि वे हर प्रकार से पहले ही लाभार्थी हैं—लाभार्थी अंतिम पायदान पर खड़ा भारतीय नागरिक है, और मात्र वही होना भी चाहिए। बस, एक जागरूक नागरिक के नाते यही हमारी भी उम्मीद है।

— सुरेश त्रिपाठी