Politicisation of Technical Work-Minister Sir What is Your Take? Part-II
प्रधानमंत्री का संकल्प रेल के “डीप स्टेट” और “केएमजी” के सामने कमजोर क्यों पड़ गया?
26 अप्रैल, 2025 को हमने लिखा था, “Politicisation of Technical Work-Minister Sir What is Your Take?” इस आर्टिकल में हमने बताया था कि कैसे रेलमंत्री के कार्यकारी निदेशक/जन-शिकायत (#EDPG) ने स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड के प्रोग्राम बनाए हैं नए प्रकार की रेल फास्टनिंग के लिए! इसमें हमने ये भी लिखा था कि स्विट्जरलैंड वाली यात्रा मई में होगी। और हुआ भी कुछ ऐसा ही!
मंत्री जी के जनता की शिकायतों को देखने वाले अर्थात् पब्लिक ग्रीवंस देखने वाले ऑफिसर एक तकनीकी यात्रा पर निकल गए हैं। जिसे हमने यहाँ एक्स पर ट्वीट किया:
इस ट्वीट के बाद एक महत्वपूर्ण व्यक्ति का शिकायत भरा फोन आया और उन्होंने शिकायती स्वर में कहा कि “हम एक गलत नैरेटिव बना रहे हैं, मंत्री के EDPG—जिनका नाम विकास जैन है—वह बहुत उच्चकोटि के सिविल इंजीनियर हैं।” खैर, हमारा ये कहना है कि यदि वह वास्तव में उच्चकोटि के इंजीनियर हैं, तो फील्ड में जाकर पसीना क्यों नहीं बहा रहे? क्यों #RDSO में काम नहीं कर रहे? क्यों आरडीएसओ में बैठकर फाइलों पर साइन नहीं कर रहे? और निर्णय नहीं ले रहे? क्या इसलिए कि मंत्री सेल के अधिकारियों को कहीं साइन करने की जरूरत नहीं है? क्या इसलिए कि कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या इसलिए कि कोई उत्तरदायित्व नहीं है? क्या इसलिए कि कोई पूछने वाला नहीं है? एक अधिकारी ने जब मंत्री सेल के द्वारा एक परचेज स्पेसिफिकेशन को बदलने की बात फाइल पर लिख दी थी, तो वह मात्र चौबीस घंटे में दिल्ली से कोलकाता फेंक दिया गया।
तो कैसे उच्चकोटि के इंजीनियर हैं ये—जिसे फाइलों पर हस्ताक्षर करके निर्णय लेने में डर लगता है?
मंत्री जी कौन समझाए आपको कि रेल में कम्पीटेंट इंजीनियर्स की कोई कमी नहीं है—अपने हस्ताक्षर से इन्हें देशहित में निर्णय लेने में डर नहीं लगता—मगर जब आपके डीप स्टेट के ऐसे एक्टर—जो पूरी दबंगई से औद्योगिक स्तर का भ्रष्टाचार कर रेल भवन में ले आए जाते हैं—तब उन्हें अवश्य डर लगता है!
दूर क्यों जा रहे हैं, आपके ही सेल से निकले अधिकारी को देखें, जो बतौर डीआरएम/वड़ोदरा—विभागीय परीक्षाओं का सफल मॉनेटाइजेशन करवा आए और इसके लिए उन्हें पुनः उसी शहर, उसी आवास और उसी दफ्तर में आप वापस ले आए। यह संरक्षण देखकर देशहित में निर्णय लेने वाले ईमानदार समर्पित परिश्रमी अधिकारियों को वास्तव में डर लगता है!
ये कैसी मजबूरी है मंत्री जी आपकी? रेल के लगभग साढ़े बारह लाख कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ रेल में प्रतिदिन यात्रा करने वाले लगभग तीन करोड़ लोग आपसे जानना चाहते हैं!
आज विजिलेंस के वैपोनाइजेशन से ईमानदार अधिकारी सामने नहीं आना चाहते-वह क्यों आयें, जब पूरा जीवन आरामतलबी से निकल सकता है, पूरी सर्विस एक ही शहर में रह सकते हैं, ईमानदार मेहनती अधिकारियों पर धौंस जमा सकते हैं, तो फील्ड में पसीना क्यों बहाना?
रेल के मामले में प्रधानमंत्री का संकल्प रेल के “डीप स्टेट” और खान मार्केट गैंग (केएमजी) के सामने कमजोर क्यों पड़ गया? क्यों प्रॉपर रोटेशन आप सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं? जबकि आप मानते हैं कि प्रॉपर रोटेशन होने से रेल में अस्सी प्रतिशत भ्रष्टाचार कम हो सकता है!
मंत्री जी, हमने ये पहले भी लिखा था—इस डीप स्टेट और केएमजी के लिए—मोदी जी पहले प्रधानमंत्री और आप पहले रेलमंत्री नहीं हैं!
मंत्री जी, मंत्री सेल के अधिकारियों का रेल के तकनीकी कार्यों में-बिना हस्ताक्षर किए-दखल देना उचित नहीं है। पहले आपके #Advisor ने यह किया, और अब आपके #EDPG भी यही कर रहे हैं। यह रेल की संस्थागत व्यवस्था के लिए कतई ठीक नहीं है।
जनवरी 31, 2024: “Moral Hazard and Principal Agent Problem of Indian Railways!” इस आर्टिकल में हमने बताया था कि रेल की समस्याओं के मूल में “principal agent problem” है, इस अर्थशास्त्र के कॉन्सेप्ट को विकिपीडिया में कुछ ऐसे समझाया गया है:
“The principal–agent problem refers to the conflict in interests and priorities that arises when one person or entity (the ‘agent’) takes actions on behalf of another person or entity (the ‘principal’). The principal–agent problem typically arises where the two parties have different interests and asymmetric information (the agent having more information), such that the #principal cannot directly ensure that the #agent is always acting in the principal’s best interest, particularly when activities that are useful to the principal are costly to the agent, and where elements of what the agent does are costly for the principal to observe. There are various situations where the #ambitions and #goals of the principals and agents may diverge. For example, #politicians and the #government may want #public-administration to implement a #welfare-policy program but the #bureaucrats may have other interests as well such as rent-seeking.”
वहीं “achievement of agents” और “failure of principals” को हमने इस आर्टिकल में उकेरा था: फरवरी 07, 2024: “Indian Railways : The Principal Agent Conundrum”
“Moral Hazard” भी अर्थशास्त्र का एक कॉन्सेप्ट है, जो तब होता है जब निर्णय लेने वाला व्यक्ति उसके प्रभाव से प्रभावित नहीं होता। रेफरेंस: “Lack of incentive to guard against risk where one is protected from its consequences”
गलती “प्रिंसिपल एजेंट्स” के चुनाव की है, मंत्री जी, आप कैसे यह भूल गए कि सरकारी व्यवस्थाएँ मॉरल और एथिकल मापदंडों पर कॉर्पोरेट सेक्टर से कहीं ऊपर तौली जाती हैं। उनके सेक्रेटेरिएट का टेंडर स्पेसिफिकेशन और प्रोडक्ट स्पेसिफिकेशन में दखल देना ठीक नहीं। वहीं जिन अधिकारियों को उन्होंने अपने पास रखा—चाहे वह उनके एडवाइजर हों, या उनके कार्यकारी निदेशक—उनकी विश्वसनीयता रेल सिस्टम में कभी कुछ नहीं रही—वह केवल जुगाड़ू ही माने गए—उनसे लोग डरकर रहे, लेकिन सम्मान श्रीधरन, शुभ्रांशु, इंद्र घोष और अजीत सक्सेना जैसे अधिकारियों का रहा! मंत्री जी, आपके इर्द-गिर्द रहने वाले अधिकारी उनके अंश मात्र भी नहीं हैं।
नैरेटिव बनाने का आरोप
हाँ, हम नैरेटिव बना रहे हैं। लेकिन हम उस नैरेटिव को बना रहे हैं जिसे हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी जी ने उकेरा है-जहाँ #मोदीसेंस से प्रेरित कम पैसे में ज्यादा काम हो, जहाँ देश के अंतिम पायदान में खड़ा व्यक्ति भी रेल में ससम्मान यात्रा कर सके, जहाँ ईमानदारी को पुरस्कृत किया जाए, न कि भ्रष्टाचारी—ईमानदारों को करैक्टर सर्टिफिकेट दें। यदि मंत्री जी आपको लगता है कि जो डीप स्टेस्ट के अधिकारी—चाहे एडवाइजर हों, या ईडीपीजी हों, या ओएसडी हों—रेल के सबसे अच्छे अधिकारी हैं, तो हमें आपके प्रति केवल सहानुभूति का भाव आता है।
हमने 15 अक्टूबर 2022 में लिखा था: “क्या खराब रिजल्ट की कीमत केवल रेलमंत्री ही चुकाएंगे?”
हमने जितने विषय देश के सामने रखे-चाहे #IRMS का हो, इमोशनल इंटेलिजेंस का हो, महाप्रबंधक, मेंबर बनाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव हो, यह चेतावनी कि क्यों रेल की सेफ्टी गिर रही है, #DRM से गतिशक्ति के नाम पर दिए गए कंस्ट्रक्शन के कार्यों को अलग करने की आवश्यकता, रेल भर्ती में भ्रष्टाचार-और ऐसे ही अन्य तमाम विषय, ये सभी कालांतर में सरकार की किरकिरी बने, तभी हमने ये कहा कि “फजीहत करवाने की ये जिद कैसी?”
23 नवंबर 2023: “फजीहत !”
19 अप्रैल 2025: “फजीहत, पार्ट-II”
21 अप्रैल 2025: “लचर तंत्र और लाचार मंत्री”
05 मई 2025: “फजीहत, भाग-III”
रेल की चेयर पर बैठकर रेल के साथ बिजनेस कर रहे अधिकारियों का मामला हो, पॉलिसी करप्शन का मामला हो, या फिर महिला उद्यमी—जिसने एक पीसीई को रंगेहाथ सीबीआई से ट्रैप करवाकर वास्तव में मोदी जी के जीरो टॉलरेंस के कथन को चरितार्थ किया—के उत्पीड़न का मामला हो, ऐसे अनेक मामले पुख्ता सबूतों के साथ दिए गए, मगर धरातल पर क्या हुआ—कुछ नहीं—भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस और महिला सशक्तिकरण के नाम पर केवल ढ़पली बजाई जाती रही है!
भारतीय रेल की यदि किसी सेना से तुलना की जाए, तो इस पर शायद पाकिस्तानी सेना ही फिट बैठती है। भारतीय सेना और पाकिस्तानी सेना—दोनों एक ही थीं। लेकिन आजादी के बाद—और विशेष रूप से 1962 की हार के बाद—भारतीय सेना पूरी तरह प्रोफेशनल बनती चली गई। वहीं पाकिस्तान की सेना सामंतवाद और क्षेत्रवाद में फँसकर रह गई—आज अंतर साफ-साफ दिखता है। भारतीय रेल आज प्रान्तीय या म्यूनिसिपल सेवा बन गई है। रोटेशन के अभाव में बदबूदार पोखर बनकर रह गई है। लेकिन “प्रिंसिपल एजेंट्स” क्यों अपने “प्रिंसिपल” के उद्देश्यों को अपना बनाएँगे? रेल के नेतृत्व का चुनाव राजनीतिक नेतृत्व का है। भारतीय रेल की सबसे बड़ी विफलता #रोटेशन को प्रभावी न करने और छोटी-छोटी रेलों की जोनल इकाईयाँ स्थापित करने में निहित है।

