रेलवे में रिकॉर्ड निवेश के बावजूद सुरक्षा राम भरोसे? मुंबई ट्रैक वॉशआउट—मध्य रेल के ट्रैक मेंटेनेंस पर लगा प्रशनचिन्ह

इतना भारी-भरकम और ऐतिहासिक निवेश करने के बाद भी धरातल पर भारतीय रेल की संरक्षा-सुरक्षा और दशा जस की तस दयनीय क्यों बनी हुई है?

आखिरकार करोड़ों-अरबों रुपये के भारी-भरकम निवेश के बाद भी रेलवे में डिरेलमेंट क्यों नहीं रुक रहे हैं? क्यों निर्माण कार्यों की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है? और मालगाड़ियों की औसत गति में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है?

दिल्ली/मुंबई: भारतीय रेल में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढ़ांचे के सुधार और केंद्र सरकार के लाखों-करोड़ों रुपये के बजटीय निवेश के बावजूद धरातल पर यात्रियों की संरक्षा-सुरक्षा और परिचालन की स्थिति एक अत्यंत चिंताजनक मोड़ पर पहुंच चुकी है। रेलवे बोर्ड में मेंबर इंफ्रास्ट्रक्चर (#MInfra) और मेंबर ऑपरेशंस एंड बिजनेस डेवलपमेंट (#MOBD) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी पदों को अब पूरी तरह से उनके विशिष्ट कैडर के लिए आरक्षित कर दिया गया है, जिसने ट्रैफिक कैडर समेत अन्य विभागों के बीच संतुलन और समन्वय की पुरानी चुनौतियों को फिर से साधने का प्रयास किया गया है। तथापि इस प्रशासनिक फेरबदल और आपसी खींचतान के बीच देश की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल और उसमें यात्रा करने वाले लाखों-करोड़ों यात्रियों की संरक्षा-सुरक्षा पूरी तरह दांव पर लगी हुई है, जिसकी गवाही हाल ही में मध्य रेलवे के अंतर्गत सामने आईं कुछ गंभीर ढ़ांचागत विफलताएं दे रही हैं।

बुधवार, 24 जून को मुंबई में पहली ही बारिश ने मध्य रेलवे के सुरक्षा दावों और मानसून की तैयारियों की पोल खोलकर रख दी, जब नवी मुंबई के तुर्भे और कोपरखैरने स्टेशनों के बीच ट्रांस-हार्बर लाइन पर रेलवे ट्रैक का पूरा फॉर्मेशन (आधार) ही पानी के तेज बहाव में बह गया। इस गंभीर हादसे का मुख्य कारण यह बताया गया कि बृहन्मुंबई नगर निगम (#BMC) ने ट्रैक के ठीक बगल में एक गहरा गड्ढा खोदा हुआ था, जिसके चलते बारिश का पानी बेहद तेज धार के साथ उस गड्ढे में गिरा और मिट्टी के भारी कटाव के कारण उस जगह का रेलवे ट्रैक हवा में लटक गया। मुंबई सबर्बन रेल नेटवर्क के इतिहास में पटरियों पर पानी भरने या जलजमाव की घटनाएं तो कई बार देखी गई हैं, लेकिन वर्ष 2005 की ऐतिहासिक बाढ़ विभीषिका के बाद यह पहली बार हुआ है जब सुरक्षा की ऐसी घोर अनदेखी के कारण पटरी के नीचे का पूरा बेस ही बह गया।

यह बेहद हैरान करने वाला और गंभीर तथ्य है कि ट्रैक वॉशआउट की यह ऐतिहासिक विफलता मध्य रेलवे के अधिकार क्षेत्र में घटित हुई, जो कि रेलवे बोर्ड के वर्तमान मेंबर इंफ्रास्ट्रक्चर साहब की वास्तविक कर्मभूमि रही है। वह इस विशिष्ट जोन में सीनियर डीईएन (#SrDEN), #सेक्रेटरी/जीएम, #डीआरएम/भुसावल और सीएओ/कंस्ट्रक्शन (#CAO/C) जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं, तथापि उनके इतने लंबे अनुभव के बावजूद आज मध्य रेल का इंजीनियरिंग विभाग और इसके ट्रैक मेंटेनेंस की बदहाली एक बड़ा सिरदर्द बन चुकी है।

पुणे में देश की प्रतिष्ठित वंदे भारत एक्सप्रेस का जो हाल ही में पहला डिरेलमेंट (पटरी से उतरना) दर्ज हुआ था, वह भी इसी मध्य रेल में हुआ और उसके लिए भी मुख्य रूप से इंजीनियरिंग विभाग को ही दोषी माना गया है। हालांकि, इस व्यवस्थागत विफलता के लिए केवल इंजीनियरिंग विभाग ही नहीं, बल्कि मध्य रेलवे का ऑपरेटिंग विभाग और पिछले एक दशक में यहाँ तैनात रहे सभी मंडल रेल प्रबंधक (#DRM) भी बराबर के जिम्मेदार रहे हैं, जबकि भारतीय रेल के विभिन्न यार्डों में लगातार हो रहे डिरेलमेंट बुनियादी ढ़ांचे में गहरे तक समाए पुराने पापों और पापियों की यादें ताजा कर रहे हैं। यहां मध्य रेल का विशेष उल्लेख केवल इसीलिए किया जा रहा है, क्योंकि इंजीनियरिंग विभाग के आज के सर्वोच्च पैट्रन यानि मेंबर इंफ्रा साहब की यह सबसे प्रमुख कार्यस्थली रही है।

फील्ड की वास्तविकता की गंभीरता को देखते हुए रेलमंत्री अभी गत सप्ताह ही पुणे के दौरे पर थे, जहां उन्होंने यार्ड रिमॉडलिंग और ट्रैक मेंटेनेंस पर पूरा फोकस करने का सख्त निर्देश मध्य रेल के अधिकारियों को दिया था। दशकों से रेलवे के यार्डों के नव-निर्माण और नवीनीकरण की घोर उपेक्षा की गई और किसी ने भी इस पर फोकस नहीं किया, जिसके कारण आज रेलवे की भावी परिचालन आवश्यकताओं को संभालना मुश्किल हो रहा है।

इसके साथ ही, राजनैतिक नेतृत्व को इस बात की भी पूरी भनक है कि रेल अधिकारियों का फोकस रेल के वास्तविक काम और यात्रियों की सुरक्षा पर कम, और निजी कमाई तथा निर्माण कार्यों के जरिए अनुचित लाभ कमाने पर अधिक केंद्रित रहता है। यही कारण है कि महत्वपूर्ण निर्माण परियोजनाओं में लगातार देरी हो रही है, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता के साथ खुलेआम समझौते हो रहे हैं, निजी कंपनियों को उपकृत करने के लिए बड़े-बड़े टेंडर निकाले जाते हैं और अधिकारियों के रिटायरमेंट के आखिरी पांच-छह महीनों में थोक भाव में टेंडर-ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल खेला जाता है, जिसकी पूरी भनक मंत्री जी को बखूबी है।

आज स्थिति यह आ गई है कि देश का करदाता और रेल यात्री प्रधानमंत्री और रेलमंत्री से यह तीखा प्रश्न पूछने पर मजबूर है कि आखिरकार करोड़ों-अरबों रुपये के भारी निवेश के बाद भी रेलवे में डिरेलमेंट क्यों नहीं रुक रहे हैं? क्यों निर्माण कार्यों की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है? और मालगाड़ियों की औसत गति में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है? राजनैतिक नेतृत्व को यह कड़े प्रश्न रेल अधिकारियों से इसलिए भी पूछने की आवश्यकता है, क्योंकि उनके द्वारा शीर्ष पदों के लिए चयनित अधिकारी बहुत बड़े फेलियर (असफलता) साबित हुए हैं।

रेलवे के उच्च पदों और बड़े प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व केवल उन अधिकारियों को सौंपा गया जो हमेशा ‘बहाव के साथ’ चले और जिन्होंने अपने पूरे करियर में किसी भी ऐसी बड़ी चुनौती या जटिल समस्या के समाधान को अपने जीवन का ऑब्जेक्टिव (उद्देश्य) नहीं बनाया जिसमें फेलियर या रिस्क की थोड़ी भी गुंजाइश रही हो। ये सभी अधिकारी केवल जोखिम से बचने वाले ‘सेफ’ खिलाड़ी रहे हैं और यदि किसी भी रेलवे पीएसयू के बोर्ड को उठाकर देखा जाए, तो वहां अधिकतर ऐसे ही लोगों की भरमार मिलेगी।

और तो और, विसंगति की हद यह है कि जिन्होंने विद्युत अधिकारी होकर भी अपने पूरे कार्यकाल में विद्युत कर्षण (#ElectricTraction) पर पांच मिनट भी कभी काम नहीं किया, उन्हें देश के बड़े मेट्रो कॉरपोरेशन का ‘डायरेक्टर’ बना दिया गया, जहां रोजाना करोड़ों यात्री पूरी तरह से विद्युत कर्षण चालित ट्रेनों पर निर्भर होकर यात्रा करते हैं। यही नहीं, जिन अधिकारियों के डीआरएम कार्यकाल के दौरान बड़े पैमाने पर विभागीय परीक्षाओं में धांधली, भारी गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के संगीन मामले सामने आए, उन्हें दंडित करने के बजाय ‘चॉइस पोस्टिंग’ (मनपसंद नियुक्ति) से पुरस्कृत किया गया और अब उन्हें बिना कुछ किए केंद्र में एडिशनल सेक्रेटरी (अपर सचिव) का दर्जा भी मिल गया, जिसने इस पूरी चयन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

देश की जनता आज सीधे प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहती है कि आपने रेलवे के कायाकल्प के लिए जो लाखों-करोड़ों रुपये की भारी-भरकम राशि आवंटित की, क्या वह इसलिए थी कि अधिकारी ‘ऑफिशियल प्रोग्राम’ का बहाना बनाकर सरकारी खर्चे पर अपनी पत्नियों के साथ विदेशों के सैर-सपाटे पर जाएं, जैसा कि वर्तमान चेयरमैन रेलवे बोर्ड (CRB) साहब अभी सपत्नी दक्षिण कोरिया के दौरे पर गए हुए हैं। क्या यह भारी निवेश इसलिए किया गया था कि कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) पर नियुक्त एक अधिकारी रेलवे बोर्ड के सभी तकनीकी मेंबर्स को पूरी तरह से निष्क्रिय और दरकिनार (#Defunct) करके केवल अपनी व्यक्तिगत हनक चलाए और पूरे रेल सिस्टम को बैठा दे!

प्रधानमंत्री जी को स्वयं संज्ञान लेकर यह देखना चाहिए कि रेलवे के ऐतिहासिक और गौरवशाली स्टाफ कॉलेज (वडोदरा) को बंद करवाने के बाद से रेल की बुनियादी समस्याओं पर कितना काम हुआ है। आज स्थिति यह है कि रेलवे के डीआरएम और जीएम की पारंपरिक और उच्च स्तरीय ट्रेनिंग व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो चुकी है और आपके सभी वरिष्ठ अधिकारी अब किराए के टीचरों से मैनेजमेंट पढ़ रहे हैं, क्योंकि स्टाफ कॉलेज बंद हो चुका है। अब समय आ गया है जब यह कड़ा प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि इस अपैक्स अकादमी और स्टाफ कॉलेज को बंद करवाने से भारतीय रेल को आखिर क्या वास्तविक लाभ मिला, क्योंकि आज तक इसका कोई स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं किया गया। आखिर किसके इशारे पर और किन अधिकारियों के निहित स्वार्थों के चलते भारतीय रेल के इस सर्वोच्च प्रशिक्षण संस्थान को बंद करवाया गया, इसके पीछे क्या कारण थे, यह सबके सामने आने ही चाहिए।

आज ये प्रश्न केवल इसीलिए अनुत्तरित नहीं रह पा रहे हैं कि रेल मंत्रालय का शीर्ष नेतृत्व कथित तौर पर जातिगत पूर्वाग्रहों और पक्षपात के चलते शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ाकर केवल अपने हितसाधन में लगा हुआ है, बल्कि ये प्रश्न उस बेचारी रेल व्यवस्था के अस्तित्व के लिए पूछे जा रहे हैं जिसे भीतर से पूरी तरह कमजोर कर दिया गया है, जबकि उसका शीर्ष नेतृत्व केवल सैर-सपाटे में, राजनीतिक हित साधने में और अपने बायो-डेटा को चमकाने में व्यस्त है; और यही काम रेलवे के बाकी चयनित अधिकारी भी अपने-अपने स्तर पर कर रहे हैं। यह रेल के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है!

अंततः, इंडियन रेलवे मैनेजमेंट सर्विस (#IRMS) को बिना सोचे-समझे थोपने और ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ जैसे कॉरपोरेट प्रपंचों के जरिए रेल व्यवस्था में जो भारी दुर्व्यवस्था पैदा की गई है, उसके जिम्मेदार लोगों को कम से कम चिन्हित करना अब अनिवार्य हो गया है, अन्यथा आने वाली पीढ़ी के सभी अधिकारियों को हमेशा यही चाटुकारिता और जोखिम से बचना ही सफलता का एकमात्र पैमाना लगता रहेगा।

जहां तक बात वर्तमान मेंबर इंफ्रास्ट्रक्चर की है, तो उन्हें अपनी वरिष्ठता और पहुंच के बल पर प्रमोशन तो मिल गया है, और हो सकता है कि कल उन्हें रेलवे में बाकी बचा सीआरबी (#CRB) का एक और सर्वोच्च प्रमोशन भी मिल जाए, लेकिन उनकी खुद की जो कर्मभूमि रही है, वहां की इस वर्तमान दुर्दशा और यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़ का दायित्व आखिर कौन लेगा और यह किसका उत्तरदायित्व है!

देश के तमाम ईमानदार करदाताओं की तरफ से अब राजनैतिक नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वयं इन रेल अधिकारियों से सीधे और तीखे प्रश्न करने होंगे कि इतना भारी-भरकम और ऐतिहासिक निवेश करने के बाद भी धरातल पर भारतीय रेल की संरक्षा-सुरक्षा और दशा जस की तस दयनीय क्यों बनी हुई है?

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी