वंदे भारत का ‘वेंडर-लॉकिंग’ संकट: आधुनिकता की दौड़ में बेबस भारतीय रेल?

कैडर मर्जर से तकनीकी भटकाव तक—वंदे भारत में बढ़ती ‘ब्रेक बाइंडिंग’ और डिरेलमेंट का इनसाइड विश्लेषण

प्राइवेट वेंडर्स के आगे सरेंडर? वंदे भारत के मेंटेनेंस फेल्योर का पूरा सच

वंदे भारत या वेंडर भारत? ₹500-600 करोड़ के पब्लिक फंड से बने मेंटेनेंस डिपो और खोखली होती आत्मनिर्भरता

ऑफिस ऑर्डर 58/2016–वो प्रशासनिक ब्लंडर, जिसने रेलवे की कोर इंजीनियरिंग को पंगु बना दिया

विशेषज्ञता का अंत—वंदे भारत को ठीक करने में नाकाम हो रहा है रेलवे का ग्राउंड स्टाफ

लोकोलेस वंदे भारत को असली लोको से खींचना पड़ा, इसके पीछे का बड़ा प्रशासनिक खेल!

कंपनियों को ‘छप्परफाड़’ मुनाफा, रेलवे की साख मिट्टी में! आखिर जिम्मेदार कौन?

रेलवे बोर्ड के ऑफिस ऑर्डर नंबर 58/2016 और उसके बाद के नीतिगत फैसलों (जैसे भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा – IRMS का गठन) ने भारतीय रेल के पारंपरिक इंजीनियरिंग ढ़ांचे को पूरी तरह बदल कर रख दिया। मैकेनिकल विभाग के भटकाव और तकनीकी रख-रखाव कैरेज एंड वैगन (C&W) में आ रही गिरावट को समझने के लिए अब इस प्रशासनिक फेरबदल का गहरा विश्लेषण आवश्यक हो गया है।

यहाँ इसका सिलसिलेवार तकनीकी और प्रशासनिक विश्लेषण दिया गया है:

1. ऑफिस ऑर्डर 58/2016 और विभागों का विलय

इस आदेश के जरिए रेलवे बोर्ड ने शीर्ष स्तर पर विभागों का पुनर्गठन शुरू किया था, जिसका अंतिम रूप इंडियन रेलवे मैनेजमेंट सर्विस (#IRMS) के रूप में सामने आया।

पहले की व्यवस्था में मैकेनिकल (#IRSME), इलेक्ट्रिकल (#IRSEE), और ट्रैफिक (#IRTS) जैसे विभागों के अपने समर्पित कैडर होते थे। हर अधिकारी अपने विभाग की बारीकियों, पटरियों, बोगियों और इंजनों की तकनीकी समस्याओं का विशेषज्ञ (Specialist) होता था।

इस ऑफिस ऑर्डर और बाद के निर्णयों के तहत विभागों की ‘विभागीय दीवारें’ (विभागवाद) तोड़ने अथवा बदलाव के नाम पर अधिकारियों का विलय कर दिया गया। इसके तहत मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल के कई कामों को मिला दिया गया—जैसे रोलिंग स्टॉक को एक ही अंब्रेला के नीचे लाना।

इसका नुकसान यह हुआ कि विशेषज्ञता (Specialization) का अंत हो गया। एक मैकेनिकल इंजीनियर जो पारंपरिक रूप से बोगी डिजाइन, सस्पेंशन और ब्रेकिंग सिस्टम का एक्सपर्ट था, उसे इलेक्ट्रिकल या सामान्य प्रशासन (एडमिनिस्ट्रेशन) के काम सौंप दिए गए। परिणाम यह हुआ कि तकनीकी निर्णय लेने वाले शीर्ष पदों पर ऐसे लोग बैठ गए जिन्हें जमीनी मैकेनिकल इंजीनियरिंग का गहरा अनुभव नहीं था।

2. डिस्ट्रिब्यूटेड पावर और मैकेनिकल विभाग का भटकाव

पारंपरिक ट्रेनें (जैसे राजधानी या मेल/एक्सप्रेस) लोकोमोटिव-हाल्ड (Locomotive-hauled) होती हैं—आगे इंजन (इलेक्ट्रिकल विभाग) और पीछे कोच (मैकेनिक/C&W विभाग)।

लेकिन वंदे भारत एक ट्रेनसेट (डिस्ट्रब्यूटेड पावर सिस्टम) है, जिसमें हर दूसरे-तीसरे कोच के नीचे मोटर और ब्रेक मैकेनिज्म लगा होता है। यह मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स (मैकेट्रॉनिक्स) का एक जटिल मिश्रण है।

यहां भटकाव यह हुआ कि रेलवे ने ट्रेनें तो आधुनिक खरीद लीं, लेकिन जमीनी स्तर पर मैकेनिकल (C&W) स्टाफ को उस स्तर की इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर की ट्रेनिंग ही नहीं दी।

अधिकारों का टकराव भी हुआ। ट्रेनसेट में खराबी आने पर मैकेनिकल विभाग इसे इलेक्ट्रिकल/सॉफ्टवेयर की गलती बताता है और इलेक्ट्रिकल विभाग इसे मैकेनिकल (ब्रेक/बोगी) की गलती। ऑफिस ऑर्डर 58/2016 के बाद जो ‘एकता’ आनी चाहिए थी, उसकी जगह जमीनी स्तर पर भ्रम (कन्फ्यूजन) पैदा हो गया।

3. ग्राउंड स्टाफ की लाचारी और आउटसोर्सिंग

हर बड़े स्टेशन या डिपो में रेलवे के पास कैरेज एंड वैगन (C&W) के तकनीशियन होते हैं, जो पारंपरिक ट्रेनों में ‘प्राइमरी मेंटेनेंस’ करते हैं। 500-600 करोड़ रुपये के पब्लिक फंड से बने वंदे भारत के नए मेंटेनेंस डिपो में इन स्थानीय तकनीशियनों की भूमिका को लगभग खत्म कर दिया गया है।

वेंडर लॉकिंग का प्रावधान होने से वंदे भारत के प्रोपल्शन, ब्रेक और सॉफ्टवेयर का कॉन्ट्रैक्ट निजी कंपनियों (जैसे मेधा, एल्सटॉम, सीमेंस) के पास है। प्रावधान के अनुसार, वारंटी और मेंटेनेंस क्लॉज के कारण रेलवे का अपना स्टाफ इन ट्रेनों के कल-पुर्जों को हाथ नहीं लगा सकता।

इसका परिणाम यह हुआ कि जब पुणे जैसी घटना में ट्रेन डिरेल होती है, तो स्थानीय रेलवे स्टाफ मूकदर्शक बन जाता है, क्योंकि उनके पास न तो उस प्रीमियम बोगी को उठाने के लिए विशिष्ट ‘री-रेलिंग टूल्स’ होते हैं और न ही अनुमति। उन्हें कंपनी के इंजीनियरों का इंतजार करना पड़ता है, जिससे ट्रेनें घंटों फंसी रहती हैं।

4. ब्रेक बाइंडिंग और आग लगने की तकनीकी वजह

प्राप्त इनपुट में उल्लेख है कि ब्रेक या तो लगते नहीं या इतनी जोर से लगते हैं कि आग पकड़ लेते हैं। तकनीकी भाषा में इसे ‘ब्रेक बाइंडिंग’ (Break Binding) कहते हैं।

वंदे भारत का ब्रेकिंग सिस्टम अन्य ट्रेनों से अलग है। इसमें ‘रीजनरेटिव ब्रेकिंग’ (जो बिजली वापस ग्रिड में भेजती है) और ‘इलेक्ट्रो-न्यूमैटिक ब्रेकिंग’ (हवा के दबाव से लगने वाले ब्रेक) का सिंक्रोनाइजेशन होता है।

यहां रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन (#RDSO) की नाकामी सामने आती है। आरडीएसओ—रेलवे की शीर्ष तकनीकी संस्था है। विभागों के विलय और प्रशासनिक भटकाव के कारण आरडीएसओ का ध्यान नई तकनीकों के कठोर परीक्षण से हट गया। वेंडर्स द्वारा सप्लाई किए जा रहे ब्रेक पैड्स और सॉफ्टवेयर कैलिब्रेशन की कड़े तरीके से क्वालिटी चेकिंग नहीं हो पा रही है। जब सॉफ्टवेयर ब्रेक डिस्क को पूरी तरह से रिलीज करने का कमांड नहीं दे पाता, तो तेज गति में ब्रेक पैड रगड़ते रहते हैं और घर्षण (फ्रिक्शन) के कारण आग लग जाती है।

अंततः निष्कर्ष यह निकलता है कि ऑफिस ऑर्डर नंबर 58/2016 और कैडर मर्जर का जो मुख्य उद्देश्य था—रेलवे में ‘टीम वर्क’ बढ़ाना—वह जमीनी स्तर पर “जवाबदेही की कमी” में बदल गया है। जब तक रेलवे अपने कोर मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल कैडर्स को फिर से विशिष्ट (स्पेशलाइज्ड) ट्रेनिंग नहीं देगा और निजी कंपनियों पर से ‘अंधभक्ति’ (निर्भरता) कम नहीं करेगा, तब तक वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेनों का बुनियादी रख-रखाव पटरी पर नहीं आ पाएगा।