पश्चिम मध्य रेलवे के ₹125 करोड़ के टेंडर पर बड़ा प्रश्नचिह्न
25 बिडर मैदान में, लेकिन वित्तीय बोली में केवल 5 — क्या तकनीकी जांच के नाम पर प्रतिस्पर्धा खत्म की गई?
जब 25 बिडर में से केवल 5 की बोली खुलती है, तो प्रश्न केवल टेंडर का नहीं, पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का होता है!
पश्चिम मध्य रेलवे, कोटा मंडल के अंतर्गत लगभग ₹125.84 करोड़ की अनुमानित लागत से प्रस्तावित कोटा–मथुरा रेलखंड में तीन रोड ओवर ब्रिज (#ROB) के निर्माण के लिए जारी टेंडर नं. GSU-KOTA-09-2025 अब गंभीर विवादों के केंद्र में है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इस टेंडर प्रक्रिया में 25 ठेकेदारों एवं कंपनियों (#Bidders) ने भाग लिया, लेकिन अंतिम वित्तीय बोली (#Financial Bid) में केवल 5 फर्मों को ही शामिल किया गया। यह तथ्य अपने आप में अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है और पश्चिम मध्य रेलवे की टेंडर मूल्यांकन प्रक्रिया की पारदर्शिता एवं निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि 25 फर्मों ने टेंडर में भाग लिया था, तो शेष 20 फर्मों को किस आधार पर बाहर किया गया? क्या सभी के साथ समान मानदंड अपनाए गए? क्या तकनीकी मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ था, या कुछ चुनिंदा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रतिस्पर्धा को सीमित किया गया? इन प्रश्नों का उत्तर केवल स्वतंत्र जांच से ही सामने आ सकता है।
ठेकेदारों के बीच लंबे समय से यह चर्चा रही है कि पश्चिम मध्य रेलवे के कुछ उच्च मूल्य वाले टेंडरों में बार-बार एक समान पैटर्न दिखाई देता है, जहां बड़ी संख्या में भाग लेने वाले बिडर्स को तकनीकी आधारों पर बाहर कर दिया जाता है, और अंततः सीमित संख्या में फर्मों के बीच ही वित्तीय प्रतिस्पर्धा कराई जाती है। यदि ऐसा है, तो यह केवल इसी एक टेंडर का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक खरीद प्रणाली की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर विषय है।

यह मामला करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन से जुड़ा हुआ है। इसलिए आवश्यक है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (#CVC), रेलवे विजिलेंस तथा रेलवे बोर्ड इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच कराएं। टेंडर समिति की कार्यवाही, तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट, अस्वीकृत बोलियों के कारण, फाइल नोटिंग, अनुमोदन प्रक्रिया तथा #IREPS के डिजिटल रिकॉर्ड को तत्काल सुरक्षित किया जाए और जांच के दायरे में लाया जाए।
साथ ही, पिछले पांच वर्षों में पश्चिम मध्य रेलवे द्वारा जारी उच्च मूल्य के निर्माण टेंडरों की भी समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं यह एक अलग घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित पैटर्न तो नहीं है। यदि जांच में सब कुछ नियमों के अनुरूप पाया जाता है, तो इससे पश्चिम मध्य रेलवे की ही विश्वसनीयता मजबूत होगी। लेकिन यदि किसी प्रकार की अनियमितता, पक्षपात, प्रभाव या मिलीभगत सामने आती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित फर्मों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

रेलमंत्री, रेलवे बोर्ड एवं केंद्रीय सतर्कता आयोग से मांग है कि वे इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करें और पश्चिम मध्य रेलवे की टेंडर प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए जाएं। जनता, ईमानदार ठेकेदार और करदाता यह जानने का अधिकार रखते हैं कि आखिर 25 प्रतिभागियों में से केवल 5 को ही अंतिम वित्तीय प्रतिस्पर्धा तक पहुंचने का अवसर क्यों मिला?
जनता जानना चाहती है: “क्या पश्चिम मध्य रेलवे में तकनीकी मूल्यांकन पारदर्शिता का माध्यम है या प्रतिस्पर्धा को सीमित करने का उपकरण?”
रेलवे ठेकेदारों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत होती जा रही है कि कुछ मामलों में पहले अत्यधिक बड़े मूल्य के टेंडर जारी किए जाते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाती है। इसके बाद तकनीकी मूल्यांकन की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में प्रतिभागियों को बाहर कर दिया जाता है और अंततः चुनिंदा फर्मों के बीच ही वित्तीय प्रतिस्पर्धा रह जाती है। आलोचकों का कहना है कि यदि किसी व्यवस्था में पहले प्रतिस्पर्धा को सीमित किया जाए, फिर चुनिंदा प्रतिभागियों का चयन हो, उसके बाद वही समूह बार-बार लाभान्वित होता दिखाई दे, तो ऐसी स्थिति पूरी प्रणाली की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करती है। यही कारण है कि ठेकेदार संगठन मांग कर रहे हैं कि पश्चिम मध्य रेलवे के उच्च मूल्य वाले टेंडरों की स्वतंत्र जांच कर यह सुनिश्चित किया जाए कि कहीं “बड़े टेंडर – सीमित प्रतिस्पर्धा – चुनिंदा चयन – बंद व्यवस्था” जैसी कोई प्रवृत्ति तो विकसित नहीं हो रही, जो अंततः भ्रष्टाचार और पक्षपात की आशंकाओं को जन्म देती है।
जानकारों और ठेकेदारों का यह भी मानना है कि पश्चिम मध्य रेलवे की टेंडर समितियों को केवल तकनीकी पात्रता तक सीमित न रहकर बोली दरों (Quoted Rates) के व्यापक रुझानों का भी विश्लेषण करना चाहिए। भारतीय रेल के #GCC-2022 लागू होने के बाद 5% से अधिक कम (Below) दरों पर बोली लगाने वाले ठेकेदारों पर अतिरिक्त वित्तीय सुरक्षा (Additional Performance Guarantee/Double BG) का प्रावधान लागू किया गया है, जिसका उद्देश्य अव्यावहारिक और असंतुलित बोली को हतोत्साहित करना था।
इसके बावजूद बड़े मूल्य के टेंडरों में लगातार अत्यधिक कम दरों पर बोली प्राप्त होना और कुछ मामलों में सीमित प्रतिस्पर्धा के बीच ही वित्तीय मूल्यांकन होना गंभीर समीक्षा का विषय है। टेंडर समिति को यह भी जांचना चाहिए कि ₹200 करोड़, ₹250 करोड़ या उससे अधिक मूल्य के समान प्रकृति के कार्यों में प्राप्त दरों की तुलना वर्तमान टेंडर से कैसे होती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्रतिस्पर्धी बाजार दरें वास्तव में क्या हैं और कहीं सीमित प्रतिस्पर्धा के कारण दरों पर प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा। सार्वजनिक धन से जुड़े इतने बड़े कार्यों में केवल न्यूनतम दर (L1) ही नहीं, बल्कि दरों की युक्तिसंगतता, प्रतिस्पर्धा की वास्तविक स्थिति और GCC-2022 के प्रावधानों के प्रभाव का भी गहन परीक्षण आवश्यक है।
“रेलवे कॉन्ट्रैक्टर संगठन का कहना है कि यदि 25 प्रतिभागियों में से केवल 5 की वित्तीय बोली खोली जाती है, तो यह केवल एक टेंडर का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी टेंडर प्रणाली की विश्वसनीयता का प्रश्न है, जिसकी स्वतंत्र सीवीसी जांच अब समय की मांग बन चुकी है।” इसके साथ ही, CVC जांच • रेलवे विजिलेंस जांच • पिछले टेंडरों का ऑडिट • टेंडर समितियों की भूमिका की जांच • और सभी अस्वीकृत बोलियों के वास्तविक कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए!

