सोशल मीडिया के जाल में उलझा शीर्ष रेल प्रबंधन: सिस्टम की रीढ़ टूटी, भय के वातावरण में काम कर रहे अधिकारी और कर्मचारी
मंत्रालय और रेलवे बोर्ड जैसी सर्वोच्च संस्थाओं का गठन इसलिए किया गया था, ताकि देश की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल की पूरी व्यवस्था एक सुदृढ़ और स्थापित सिस्टम के तहत संचालित हो सके। शीर्ष नेतृत्व का मूल दायित्व इस व्यवस्था को मजबूत करना, संस्थागत प्रक्रियाओं पर भरोसा बनाए रखना और कमियों को दूर करने के लिए निरंतर और व्यावहारिक प्रयास करना होता है। परंतु, वर्तमान समय में परिस्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज रेलवे बोर्ड के सर्वोच्च पदों पर बैठे शीर्ष अधिकारी नीतिगत फैसलों और दूरगामी सुधारों के बजाय सोशल मीडिया की सनसनी और ट्वीट्स के आधार पर तंत्र को चला रहे हैं। जब नीति-नियंता ही सोशल मीडिया के दबाव के आगे घुटने टेक दें, तो पूरा सिस्टम चरमराने लगता है। यही कारण है कि आज रेल भवन से लेकर जोनल और डिवीजनल मुख्यालयों तक हर विभाग में हड़कंप और असमंजस का वातावरण व्याप्त है। जो मामले बोर्ड के एक डायरेक्टर स्तर पर सुलझ जाने चाहिए थे, उन पर चेयरमैन रेलवे बोर्ड (सीआरबी) स्तर का ध्यान केंद्रित होना यह दर्शाता है कि शीर्ष प्रबंधन अपना मूल ट्रैक छोड़ चुका है।
भारतीय रेल ही नहीं, बल्कि देश के तमाम सरकारी महकमे अब तक अपने मजबूत और स्थापित सिस्टम के बल पर ही सफलता से चलते रहे हैं। नियम यह कहता है कि यदि व्यवस्था में कोई कमी या खामी नजर आए, तो उसकी तह तक जाना चाहिए, जमीनी स्तर पर काम कर रहे अधिकारियों और कर्मचारियों से संवाद कर समस्या के वास्तविक कारणों को समझना चाहिए और फिर एक व्यावहारिक समाधान लागू करना चाहिए। इसके विपरीत, आज की कार्यशैली यह हो गई है कि पहले सोशल मीडिया के जरिए समस्या सुनी जाती है, वहीं से उसकी सतही समझ बनाई जाती है और फिर बिना किसी फील्ड स्टडी या व्यावहारिक आकलन के, जो भी मन में आता है उसे पूरे सिस्टम पर थोप दिया जाता है। जमीनी हकीकत से कटे हुए इन्हीं अदूरदर्शी फैसलों का नतीजा है कि आज देश को चारबाग, बालासोर और कोटा जैसी भीषण और दर्दनाक रेल दुर्घटनाएं देखनी पड़ रही हैं।
अतीत में रेलवे का पूरा सिस्टम बेहद सुस्पष्ट और पदानुक्रम (#Hierarchy) के अनुसार काम करता था। इस पूरे तंत्र की असली आधारशिला और मजबूत कड़ी धरातल पर काम करने वाला सुपरवाइजर होता था। सुपरवाइजर के ऊपर डिवीजनल अधिकारी (डीआरएम आदि), उनके ऊपर जोनल मुख्यालय के अधिकारी (जीएम और पीएचओडी) और सबसे अंत में नीति निर्धारण के लिए रेलवे बोर्ड के शीर्ष अधिकारी आते थे। उस दौर में किसी भी विभाग को अपने आंतरिक सिस्टम और कर्मचारियों की क्षमता पर पूरा भरोसा होता था। यदि कोई तकनीकी विफलता या ‘फेलियर’ होता भी था, तो उच्च स्तर के अधिकारी बेहद गंभीरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसका अध्ययन कर निर्णय लेते थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि जब भी किसी व्यावहारिक समस्या का स्थायी समाधान खोजना होता था, तो वे वातानुकूलित कमरों में बैठने के बजाय फील्ड में तैनात सुपरवाइजरों और इंजीनियरों से राय मशविरा करते थे। उसी जमीनी फीडबैक के आधार पर नियम और नीतियां बनती थीं, जिससे समस्याओं का व्यावहारिक और सटीक हल निकलता था।
आज की तारीख में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। विभागों में अब सिस्टम के अनुसार काम होना लगभग बंद हो चुका है। पूरा महकमा तकनीकी और ढ़ांचागत सुधारों को भूलकर केवल एक ‘शिकायत निवारण केंद्र’ (Complaint Resolver) बनकर रह गया है। हर जोन के जनरल मैनेजर (#GM), डिवीजनों के मंडल रेल प्रबंधक (#DRM) और सार्वजनिक उपक्रमों (#PSU) के सीएमडी दिनभर अपने दफ्तरों में बैठकर सोशल मीडिया पेज खंगालते रहते हैं। उनके भीतर हर समय यह भय बना रहता है कि कहीं उनके क्षेत्र से संबंधित कोई नकारात्मक ट्वीट या शिकायत वायरल न हो जाए। यह पूरी कसरत केवल इसलिए की जाती है, ताकि रेलवे बोर्ड से फोन आने पर वे तुरंत यह सफाई दे सकें कि इस मामले पर क्या कार्रवाई की गई है। अधिकारियों में यह डर घर कर गया है कि यदि उन्होंने तुरंत जवाब नहीं दिया, तो रेलवे बोर्ड उन्हें नाकारा और अक्षम मानकर उनके करियर और प्रतिष्ठा को दांव पर लगा देगा।
विभिन्न जोनल महाप्रबंधक (GM) स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों का दबे स्वर में कहना है कि शिकायतों और सोशल मीडिया को मैनेज करने पर इतना अत्यधिक ध्यान केंद्रित होने के कारण रेलवे के नियमित, सुरक्षात्मक और बुनियादी काम पूरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। सुबह से लेकर रात तक, जीएम से लेकर नीचे के गैंगमैन और कीमैन तक का स्टाफ एक अनजाने खौफ, दहशत और मानसिक तनाव के माहौल में जीने को मजबूर है। अधिकारियों का मनोबल और आत्मविश्वास इस कदर गिर चुका है कि उन्हें हर पल यह डर सताता है कि सोशल मीडिया पर सक्रिय किसी भी गैर-जिम्मेदार तत्व या अनर्गल शिकायत के चलते उनकी सालों की मेहनत और नौकरी कब चली जाए-पता नहीं। किसी भी मजबूत और सुरक्षित रेल प्रणाली को चलाने के लिए दीर्घकालिक योजना (Long Term Planning) और नियमित रखरखाव (Routine Maintenance) सबसे जरूरी स्तंभ होते हैं, लेकिन वर्तमान माहौल में ये दोनों ही प्राथमिकताएं पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं।
एक समय था जब चेयरमैन रेलवे बोर्ड (#CRB) और रेलमंत्री पूरे रेल परिवार के लिए एक अभिभावक (Father Figure) की भूमिका में होते थे। उनके प्रति मातहतों के दिल में सम्मान और आदर की भावना होती थी, कोई खौफ या आतंक नहीं। यदि किसी मोर्चे पर कोई गलती हो भी जाती थी, तो शीर्ष नेतृत्व का लहजा सुधारात्मक और प्रेरणादायी होता था, जो कर्मचारियों को दोगुनी ऊर्जा, ईमानदारी और निष्ठा से काम करने के लिए प्रेरित करता था। इसके विपरीत, आज अधिकारी वर्ग के बीच सीआरबी के पद की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच व्याप्त आक्रोश को देखते हुए, आज इस सर्वोच्च पद का मतलब केवल डांट-फटकार, सार्वजनिक बेइज्जती, प्रताड़ना और प्रशासनिक तिकड़मबाजी बनकर रह गया है। संभवतः इसीलिए रेल अधिकारियों/कर्मचारियों ने उन्हें अब ‘काक्रोच ऑफ रेलवे बोर्ड (सीआरबी) की संज्ञा दी है।
जानकारों और रेलवे के भीतर काम करने वाले अधिकारियों का मानना है कि वर्तमान नेतृत्व के पास न तो समस्याओं का कोई ठोस और वैज्ञानिक समाधान है और न ही वे वास्तव में संकटों को हल करना चाहते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य “खुद पद पर टिके रहना और दूसरों को न चैन से रहने देना, न जीने देना” प्रतीत होता है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय रेल को ‘कंज्यूमर’ की श्रेणी में डाल दिया गया है और शीर्ष नेतृत्व ने अब तक इसकी सुधि भी नहीं ली है। उन्होंने कहा कि सरकार और उच्च अधिकारियों के सामने संकटों और समाधानों की एक ऐसी ‘मरीचिका’ (#Mirage) पेश की जा रही है, जिसका वास्तविक धरातल से कोई लेना-देना नहीं है, और यह सब केवल अपने सेवा विस्तार (#Extension) को सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है। डरा-धमकाकर, दबाव बनाकर और ओछी बातों की आड़ में अव्यावहारिक और उलटे-सीधे निर्देश जारी करना ही आज रेलवे के शीर्ष नेतृत्व की मुख्य विशेषता बन चुकी है।
कई जोनों के जीएम और रेलवे के अधीन आने वाले सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) के सीएमडी का अब स्पष्ट रूप से मानना है कि इस तरह के दमघोंटू और तनावपूर्ण माहौल में काम करना दिन-प्रतिदिन असंभव होता जा रहा है। उनका कहना है कि यदि वास्तव में भारतीय रेल के कार्य-वातावरण को सुरक्षित और सकारात्मक बनाना है, तो अधिकारियों और कर्मचारियों पर केवल बैठकों और समीक्षाओं का बोझ लादने के बजाय, उन्हें अपने मूल काम को ठीक से करने देने के लिए पर्याप्त समय और स्वायत्तता देनी होगी। इसके साथ ही, शीर्ष प्रबंधन, रेलमंत्री को कर्मचारियों के स्वास्थ्य, उनके मानसिक तनाव और पारिवारिक दायित्वों का भी मानवीय दृष्टिकोण से ध्यान रखना होगा, क्योंकि एक तनावग्रस्त और डरा हुआ कर्मचारी कभी भी सुरक्षित रेल संचालन सुनिश्चित नहीं कर सकता।
आज के नेतृत्व अर्थात सेल्फ-सेंटर्ड सीआरबी से रेलवे के भीतर किसी को कोई सकारात्मक उम्मीद तो पहले ही नहीं थी। उनके साथ पहले काम कर चुके अधिकारियों का कहना है कि वे काम के नाम पर केवल समय बिताने और कागजी औपचारिकताएं पूरी करने के विशेषज्ञ हैं। वे ‘सुपर एक्टिव विद सुपर इनइफेक्टिव रिजल्ट्स’ (अत्यधिक सक्रिय लेकिन पूरी तरह बेअसर परिणाम) के फॉर्मूले पर काम करते रहे हैं, और आज भी उनकी इस तिकड़मी कार्य-शैली में कोई बदलाव नहीं आया है। आज चारबाग और कोटा जैसी घटनाएं अपवाद नहीं हैं; रेलवे में हर दिन ऐसी कई छोटी-बड़ी घटनाएं और तकनीकी खामियां सामने आ रही हैं जो बेहद डरावनी हैं और आने वाले किसी बड़े संकट की ओर इशारा कर रही हैं। परंतु, दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन गंभीर सुरक्षा चूकों को दबा दिया जाता है। छोटी और अनावश्यक चीजों को सोशल मीडिया पर आवश्यकता से अधिक उछालकर और उन्हें महत्व देकर, इन बड़ी नाकामियों को देश के परिदृश्य से छिपाने का खेल खेला जा रहा है।
प्रशासनिक और तकनीकी रूप से सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले इंजीनियरिंग विभाग सहित अन्य सभी विभागों के सुपरवाइजरों से लेकर विभाग प्रमुखों (#PHOD) तक इस समय गहरे मानसिक संकट (दिवालियापन) और लाचारी से गुजर रहे हैं। फील्ड में वे जिन वास्तविक और बुनियादी चुनौतियों—जैसे ट्रैक का रखरखाव, उपकरणों की कमी और फेलियर, जनशक्ति (मानव संसाधन) का संकट इत्यादि—का सामना कर रहे हैं, उनका कोई भी व्यावहारिक समाधान रेलवे बोर्ड के पास नहीं है। बोर्ड न तो उनकी समस्याओं को सुनने के लिए तैयार है, और न ही उन्हें समझने की कोशिश करता है। इसके बजाय, शीर्ष प्रबंधन तमाम तरह के खोखले तर्कों, आंकड़ों की बाजीगरी, फर्जी गूगल शीट्स भरने और निरर्थक बैठकों के जाल में सबको उलझाए रखता है, जिससे रेलवे का मूल ढ़ांचा अंदर ही अंदर खोखला होता जा रहा है।

