दो रेल इंजीनियरों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत: वास्तविक तकनीकी सुधारों और जवाबदेही की तुलना में प्रस्तुतियों एवं छवि प्रबंधन पर अधिक जोर

पश्चिम मध्य रेलवे, इंजीनियरिंग विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न—हाल की घटनाओं ने संरक्षा-सुरक्षा प्रबंधन एवं तकनीकी निगरानी की वास्तविक स्थिति उजागर की

पश्चिम मध्य रेलवे (#WCR) के कोटा मंडल में गुरुवार, 28 मई 2026 को रात 20:10 बजे यह घटना हुई। नागदा जंक्शन-कोटा जंक्शन रेल खंड पर कंवलपुरा और दरा स्टेशनों के बीच (डाउन लाइन, किमी नं. 865/32-34) पर बॉक्स पुशिंग के दौरान अचानक मिट्टी ढ़ह गई।

पुल संख्या 148 पर ‘बॉक्स पुशिंग’ का काम चल रहा था। यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें ट्रैक के नीचे—बिना रेल यातायात रोके—कंक्रीट के बॉक्स (अंडरपास या सबवे बनाने के लिए) धकेले जाते हैं। इस प्रक्रिया में भारी खुदाई और मिट्टी की कटाई शामिल होती है। इस घटना में कोई डिरेलमेंट नहीं हुआ। रेलवे ट्रैक सुरक्षित रहा और ट्रेनों के पटरी से उतरने जैसी कोई स्थिति नहीं बनी।

Box pushing under track

दो कर्मचारियों की मौत—यह इस घटना का सबसे दुखद पहलू है। काम की निगरानी कर रहे दो रेल कर्मचारी—एक सीनियर सेक्शन इंजीनियर (#SSE) संजय झा और एक जूनियर इंजीनियर (ट्रेनी) प्रभात—अचानक ढ़ही मिट्टी के नीचे दब गए। जेसीबी मशीनों की मदद से तुरंत मिट्टी हटाने का काम शुरू किया गया, लेकिन मलबे से निकाले जाने तक दोनों कर्मचारियों की मौके पर ही मौत हो चुकी थी।

दुर्घटना का प्राथमिक कारण अभी स्पष्ट नहीं है। घटना की जांच जारी है और घटना के वास्तविक कारणों की प्रतीक्षा है। हालांकि, रात के समय बॉक्स पुशिंग जैसे संवेदनशील कार्य के दौरान मिट्टी की बॉन्डिंग (पकड़) कमजोर होना या उचित सुरक्षा सपोर्ट (Shoring/Strutting) की कमी इसके संभावित कारण हो सकते हैं। यह मुख्य रूप से एक गंभीर कार्यस्थल सुरक्षा दुर्घटना है। इस घटना में रेलवे ने अपने दो तकनीकी कर्मचारियों को खो दिया। विस्तृत जांच के बाद ही मिट्टी ढ़हने के सटीक कारणों का पता चल पाएगा।

पश्चिम मध्य रेलवे के अंतर्गत इंजीनियरिंग विभाग में हाल ही में हुई कई गंभीर घटनाओं ने रेलवे संरक्षा-सुरक्षा, तकनीकी निगरानी, फील्ड निरीक्षण व्यवस्था तथा प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर व्यापक चिंता उत्पन्न कर दी है। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या इंजीनियरिंग विभाग में संरक्षा-सुरक्षा को वास्तव में सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप में लागू किया जा रहा है अथवा यह महत्वपूर्ण विषय केवल समीक्षा बैठकों एवं औपचारिक प्रस्तुतियों की शो-बाजी तक सीमित होकर रह गया है।

पश्चिम मध्य रेलवे में लगातार सामने आ रही तकनीकी विफलताओं, एसेट फेल्योर एवं निर्माण कार्यों से जुड़ी घटनाओं ने विभागीय कार्यसंस्कृति तथा वरिष्ठ स्तर की निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। रेलवे से जुड़े अनेक तकनीकी विशेषज्ञों एवं वरिष्ठ सुपरवाइजरों-कर्मचारियों का मानना है कि जबलपुर जोन में इंजीनियरिंग विभाग का ध्यान वास्तविक फील्ड मॉनिटरिंग एवं निवारक सुरक्षा व्यवस्था की तुलना में प्रशासनिक औपचारिकताओं पर अधिक केंद्रित होता दिखाई दे रहा है।

ब्यौहारी स्टेशन पर ट्रैक मशीन कोच में आग

12 अप्रैल 2026 को जबलपुर मंडल के ब्यौहारी रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रैक मशीन कोच में आग लगने की गंभीर घटना हुई। उपलब्ध जानकारी एवं तकनीकी संकेतों से यह स्पष्ट होता है कि कोच के भीतर किए जा रहे कार्यों, विद्युत उपकरणों के उपयोग तथा सुरक्षा मानकों के अनुपालन की निगरानी में गंभीर कमियाँ मौजूद थीं, तथापि उन्हें छिपाया गया और उन पर लीपापोती कर गोपनीयता बरती गई।

उक्त घटना के बाद यह अपेक्षा की जा रही थी कि आग लगने के मूल तकनीकी कारणों की विस्तृत एवं निष्पक्ष जांच कर वास्तविक कमियों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाएगा। किन्तु ऐसा महसूस किया गया कि कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी पहलुओं एवं प्रणालीगत कमियों को अपेक्षित गंभीरता से सामने नहीं लाया गया, जबकि अपेक्षाकृत सामान्य कारणों को अधिक महत्व दिया गया। परिणामस्वरूप, वास्तविक जवाबदेही एवं प्रणालीगत सुधार की दिशा में अपेक्षित स्पष्टता दिखाई नहीं दी।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि इस गंभीर घटना से सबक लेते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु अब तक कोई प्रभावी एवं दृश्यमान सुधारात्मक व्यवस्था दिखाई नहीं देती। फील्ड स्तर पर ठोस सुरक्षा सुधारों की तुलना में औपचारिक कागजी कार्यवाही एवं खानापूर्ति अधिक दिखाई देने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।

स्लैक गेज—टैम्पिंग मशीन पटरी से उतरी

ट्रैक मशीन कोच में आग की घटना के अगले ही दिन, 13 अप्रैल 2026 को पॉइंट्स एवं क्रॉसिंग पर स्लैक गेज की स्थिति के कारण एक टैम्पिंग मशीन पटरी से उतर गई। रेलवे सुरक्षा मानकों के अनुसार पॉइंट्स एवं क्रॉसिंग—ट्रैक का अत्यंत संवेदनशील हिस्सा माना जाता है, जहाँ निरीक्षण एवं अनुरक्षण में छोटी सी कमी भी गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।

यह घटना सीधे तौर पर ट्रैक अनुरक्षण व्यवस्था, निरीक्षण प्रणाली तथा इंजीनियरिंग निगरानी की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

इस मामले में सबसे चिंताजनक तथ्य यह रहा कि इतनी महत्वपूर्ण घटना को रेलवे बोर्ड स्तर तक रिपोर्ट भी नहीं किया गया। इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि कई मामलों में वास्तविक तकनीकी समस्याओं एवं संरक्षा-सुरक्षा संबंधी कमियों को उच्च स्तर तक पारदर्शी रूप से पहुँचाने-रिपोर्ट करने के बजाय विभागीय स्तर पर ही सीमित रखने अथवा दबाने का प्रयास किया जाता है। यह तथ्य अब सभी जोनल रेलों में एक सामान्य प्रक्रिया बन चुका है।

तकनीकी विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि इस प्रकार की घटनाओं की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष समीक्षा समय रहते की जाए तथा जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय हो, तो भविष्य में बड़ी दुर्घटनाओं की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

एसेट फेल्योर—कमजोर इंजीनियरिंग निगरानी?

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या इंजीनियरिंग निगरानी कमजोर पड़ रही है? पिछले कुछ समय में इंजीनियरिंग एसेट्स से संबंधित विभिन्न प्रकार की तकनीकी विफलताएँ लगातार सामने आती रही हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि निवारक अनुरक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण तथा नियमित फील्ड निरीक्षण की प्रणाली अपेक्षित प्रभावशीलता के साथ कार्य नहीं कर रही है। इससे इंजीनियरिंग निगरानी के लगातार कमजोर पड़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।

रेल कर्मचारियों एवं तकनीकी जानकारों के बीच यह भावना तेजी से उभर रही है कि कई मामलों में घटनाओं के मूल कारणों की कठोर तकनीकी समीक्षा करने के बजाय उन्हें सीमित प्रशासनिक मुद्दा मानकर आगे बढ़ा दिया जाता है। परिणामस्वरूप, वास्तविक सुधारात्मक प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है तथा वही कमियाँ भविष्य में पुनः सामने आती हैं।

तकनीकी विशेषज्ञों और जानकारों का मानना है कि यदि छोटी-छोटी तकनीकी चेतावनियों एवं एसेट फेल्योर को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह भविष्य में किसी बड़े रेल हादसे की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है।

दरा घाटी में RUB निर्माण कार्य—दो इंजीनियरों की मृत्यु

गुरुवार, 28 मई 2026 को दरा घाटी क्षेत्र में बॉक्स पुशिंग पद्धति से किए जा रहे रोड अंडर ब्रिज (#RUB) के निर्माण कार्य के दौरान मिट्टी धंसने से दो रेलवे इंजीनियरों की असमय दुखद मृत्यु हो गई। यह घटना अत्यंत गंभीर एवं असामान्य प्रकृति की मानी जा रही है, क्योंकि इस प्रकार के कार्यों में विस्तृत भू-तकनीकी अध्ययन, स्लोप स्टेबिलिटी विश्लेषण तथा सुरक्षित खुदाई व्यवस्था अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

घटना ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं:

  • क्या स्लोप स्टेबिलिटी विश्लेषण पर्याप्त रूप से किया गया था?
  • क्या खुदाई के दौरान निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन हुआ?
  • क्या साइट पर पर्याप्त तकनीकी निगरानी उपलब्ध थी?
  • क्या वरिष्ठ इंजीनियरिंग अधिकारियों द्वारा नियमित फील्ड निरीक्षण किया जा रहा था?
  • क्या जोखिम विश्लेषण एवं सुरक्षा योजना का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित किया गया था?

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की दुर्घटना केवल स्थानीय स्तर की त्रुटि नहीं मानी जा सकती, बल्कि यह परियोजना प्रबंधन, फील्ड मॉनिटरिंग एवं सुरक्षा संस्कृति की व्यापक समीक्षा की मांग करती है।

संरक्षा-सुरक्षा पर दावे बनाम जमीनी वास्तविकता

हालाँकि पश्चिम मध्य रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग द्वारा समय-समय पर संरक्षा-सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया जाता रहा है। यह वैसे ही एक डायलॉग बनकर रह गया है जैसे नेताओं और विश्व सुंदरियों द्वारा पावर्टी लाइन के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए काम करने की बात कहना, मगर बाद में यह वास्तव में किया नहीं जाता। हाल में घटी इन घटनाओं ने फील्ड स्तर पर संरक्षा-सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को लेकर गंभीर प्रश्न पैदा कर दिए हैं।

रेल कर्मचारियों एवं तकनीकी विशेषज्ञों के बीच यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि पश्चिम मध्य रेलवे का इंजीनियरिंग विभाग गंभीर घटनाओं एवं तकनीकी विफलताओं के बावजूद वास्तविक सुधारों की तुलना में संरक्षा-सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन अधिक करता दिखाई देता है।

  • जिम्मेदार अधिकारियों पर अपेक्षित कठोर कार्रवाई कम दिखाई देती है,
  • जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय नहीं होती,
  • सुरक्षा समीक्षा कई बार औपचारिकता तक सीमित रह जाती है,
  • वरिष्ठ अधिकारियों की फील्ड पर उपस्थिति एवं प्रत्यक्ष निगरानी पर्याप्त नहीं दिखाई देती।

इससे यह संदेश जाता है कि वास्तविक तकनीकी सुधारों एवं जवाबदेही की तुलना में प्रशासनिक प्रस्तुतियों एवं छवि प्रबंधन पर अधिक बल दिया जा रहा है। भारतीय रेल की वर्तमान में यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।