जीएम के वश में नहीं है पीएफए ???

#Railwhispers द्वारा भ्रष्टाचार के मुद्दों को बार-बार उठाने के कारण कुंभकर्णी नींद से रेल व्यवस्था थोड़ी बहुत हिलती-डुलती तो है, मगर पुख्ता कदम नहीं उठाया जाता है। सीबीआई रेड और एफआईआर में स्पष्ट रूप से नामज़द किए जाने के लगभग 50 दिन बाद पीएफए/ईसीआर द्वारा दागी कर्मचारियों का स्थानांतरण आदेश जारी किया जाता है—वह भी जीएम के हस्तक्षेप के बाद। बिल पासिंग अधिकारी के ट्रांसफर में और 15 दिन क्यों लग जाते हैं, इसका वास्तविक कारण क्या हो सकता है, यह तो ईसीआर के पीएफए ही बता सकते हैं।

इसमें खास बात ये है कि बिल पासिंग अधिकारी हाल ही में उस सेक्शन में पदस्थापित हुआ था। ठीक उससे पहले उस सेक्शन में पदस्थ लोगों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई। मामले से जुड़े लोगों का मानना है कि इसमें पीएफए के स्वजातीय अधिकारी का नाम आ रहा था, इसलिए मात्र एक ही अधिकारी का ट्रांसफर हुआ।

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एसएजी लेवल के अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि पीएफए की बिरादरी के दो अधिकारी निर्माण विभाग महेंद्रूघाट, पटना में कार्यरत हैं, उनमें से एक पहले से कार्यरत था, दूसरे को वर्तमान पीएफए ने दानापुर से पटना भेजा था। वहाँ से उन्होंने एक स्वजातीय सेक्शन ऑफिसर को ऑन प्रमोशन ऑफिसर बनाकर दानापुर भेज दिया।

अधिकारियों का कहना है कि अपनी सप्लाई चेन को मजबूत बनाए रखने के लिए जाति के झंडाबरदार और घोर जातिवादी पीएफए/ईसीआर, हाजीपुर में जूनियर स्केल के कई अधिकारियों को दरकिनार कर अपनी बिरादरी के अधिकारियों को पटना और दानापुर में सेटल करने में लगे हुए हैं। जबकि हाजीपुर मुख्यालय में कार्यरत कई जूनियर अधिकारी लंबे समय से फील्ड/डिवीजन में काम करने की प्रतीक्षा में हैं, मगर उन्हें अवसर नहीं दिया जा रहा है।

नाम उजागर न करने की शर्त पर अधिकारियों का कहना है कि ईसीआर के वर्तमान पीएफए यहाँ के पुराने और शातिर खिलाड़ी रह चुके हैं। जब-जब उन्हें ऑन-प्रमोशन बाहर भेजा गया, तब-तब कुछ ही समय बाद वह पुनः ईसीआर में पोस्टिंग लेने में सफल रहे।

उन्होंने बताया कि वह लगभग 20-22 साल से ईसीआर में ही पोस्टेड हैं। इनकी अपनी एक मजबूत सप्लाई चेन है, जिसको तोड़ पाना रेलवे बोर्ड के सहयोग के बिना जीएम के लिए मुश्किल है। हालाँकि जीएम/ईसीआर बहुत हद तक इस पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन शातिर पीएफए अपनी सप्लाई चेन को मैनेज कर ले रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि रेलवे बोर्ड की ऐसी क्या मजबूरी है कि हर बार प्रमोशन के बाद इसका ईसीआर से बाहर ट्रांसफर होता है और ये फिर वापस ईसीआर में ही आ जाता है! क्या कारण है कि रेलवे बोर्ड ऐसे अधिकारी को ईसीआर में ही पदस्थ रखने के लिए बाध्य है? अगर कोई सीनियर अधिकारी—खासतौर पर एकाउंट्स अधिकारी—ईसीआर में जाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो ईसीआर जोन को समाप्त कर इसके सभी डिवीजनों को पूर्ववत पुराने जोनों में मर्ज कर दिया जाना चाहिए।