डीजल-एलपीजी संकट, रुके हुए भुगतान और अधूरे कामों के बीच नए टेंडर क्यों? पहले जवाबदेही तय करे रेलवे, NHAI और राज्य एजेंसियां!
जब बाजार में डीजल और एलपीजी की भारी कमी है, निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, और भारतीय रेल में पिछले 15-20 दिनों से भुगतान रुका हुआ बताया जा रहा है, तब रेलवे, NHAI और अन्य विभिन्न राज्य एजेंसियों द्वारा नए टेंडर जारी किया जाना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और संसाधनों के अव्यवस्थित उपयोग का विषय बनता जा रहा है।
जनहित में यह मांग तेज हो रही है कि सभी संबंधित विभाग तत्काल प्रभाव से नए टेंडर जारी करना रोकें और पहले से आवंटित, लंबित एवं अधूरे कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराएं। कहा जा रहा है कि जब पुराने कार्य ही ईंधन संकट, भुगतान रुकने और साइट संचालन की कठिनाईयों के कारण प्रभावित हैं, तब नए कार्यों का बोझ डालना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि इससे सार्वजनिक धन, प्रशासनिक क्षमता और परियोजना प्रबंधन—तीनों पर अनावश्यक दबाव पड़ेगा। इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि लगातार टेंडर जारी करने के पीछे सरकारी बाबुओं की कमीशनखोरी की मंशा भी हो सकती है।
निर्माण क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि डीजल की कमी के कारण मशीनरी, जनरेटर, ट्रांसपोर्ट और साइट संचालन प्रभावित हो रहे हैं, जबकि एलपीजी की कमी से श्रमिक शिविरों और कार्यस्थलों पर बुनियादी व्यवस्थाएं बाधित हो रही हैं। ऐसे हालात में नए टेंडर जारी करना जमीनी सच्चाई से कटे हुए निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।
यह मुद्दा उठाने वालों ने स्पष्ट किया है कि यह मामला किसी व्यक्तिगत स्वार्थ, निजी हित या लाभ अथवा किसी एक ठेकेदार/एजेंसी के हित का नहीं है, बल्कि व्यापक जनहित, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक परियोजनाओं के वास्तविक एवं समयबद्ध क्रियान्वयन से जुड़ा हुआ है। प्रश्न यह है कि जब पुरानी परियोजनाएं ही संसाधनों के अभाव और भुगतान रुकने के कारण अटकी पड़ी हैं, तब नई निविदाएं किस आधार पर और किस तर्क से निकाली जा रही हैं?
जनहित में यह भी मांग की जा रही है कि यदि किसी विभाग द्वारा वर्तमान परिस्थितियों में कोई नया टेंडर जारी या कार्य आवंटित किया जाता है, तो उसके पीछे स्पष्ट, लिखित, ठोस और सार्वजनिक रूप से न्यायसंगत कारण दर्ज किए जाएं, ताकि बाद में किसी प्रकार की मनमानी, वित्तीय अव्यवस्था या प्रशासनिक लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी की स्थिति उत्पन्न न हो।
विशेष रूप से निम्न मांगें उठाई गई हैं—
- नए टेंडर तत्काल प्रभाव से रोके जाएं,
- पुराने एवं लंबित कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराया जाए,
- रुके हुए भुगतान तत्काल जारी किए जाएं,
- डीजल एवं एलपीजी की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए,
- हर नई निविदा के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
जानकारों का कहना है कि यदि वर्तमान संकट के बावजूद बिना तैयारी के नए कार्य जारी किए जाते रहे, तो इससे परियोजनाओं की लागत में वृद्धि, कार्यों में अनावश्यक देरी, सार्वजनिक धन की बर्बादी और आम जनता पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा। ऐसे में अब आवश्यकता केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि नीतिगत अनुशासन, वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जिम्मेदारी की भी है।
उनका यह कहना था कि जनहित में उठी यह मांगें पूरी तरह से सार्वजनिक संसाधनों के संरक्षण, अधूरे कार्यों की समयबद्ध पूर्ति और जवाबदेह शासन व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हैं, न कि किसी निजी अथवा व्यक्तिगत हित से प्रेरित।

