PHODs की निरंकुशता—CR, WR, NER, NCR, SER!

गाड़ी को पटरी पर रखना जब प्राथमिकता नहीं रही, तो क्या अंतर पड़ता है, फिर काहे का डीआरएम और कौन उसका ब्रांच अधिकारी!

#Railwhispers ने कई वर्षों से अधिकारियों से मिली इनपुट-फीडबैक के आधार पर रेल के उच्च पदों पर पदोन्नतियों (प्रमोशंस) में आई अपारदर्शिता पर खुलकर चिंता जताई है। तथाकथित #IRMS के लेवल 16, 17 में अराजकता रेल के हर कार्यालय में देखने को मिल रही है। किसी को भी एक्सटेंशन (सेवा विस्तार) दे देना, किसी को भी महाप्रबंधक, और किसी को भी बोर्ड मेंबर बना देना मानो रेल में खेल हो गया। निकम्मे-अक्षम गर्दभों की तो निकल पड़ी और कर्मठ-सक्षम अश्व साइड-लाइन हो गए।

Ep137: #PHODs की निरंकुशता और #GMs की किंकर्तव्यविमूढ़ता!

हमने यह भी लिखा था कि लेवल-15 पर विभाग प्रमुख (#PHOD) अब किसी की नहीं सुन रहे और निरंकुश हो गए हैं। “रेल सेवा” मात्र क्लब की पार्टियों, उद्घाटन समारोहों और स्टेशन डेवलपमेंट तक सिमट गई है। निरंतर हो रहे ट्रैक्शन डिस्ट्रीब्यूशन (#TRD) के फेलियर, S&T के फेलियर और डिरेलमेंट—ये बताते हैं कि उद्घाटन और कार्यक्रमों में व्यस्त रेलवे के डिवीजन दैनंदिन काम नहीं कर पा रहे हैं। पूरी ओपन लाइन मानो रेलवे का कंस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट लगने लगी है। यदि रेल सुरक्षित चल भी रही है, तो समय से नहीं चल पा रही! यह ट्वीट देखें-

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#PHODs की निरंकुश कार्यशैली के बारे में इतने फीडबैक आ रहे हैं कि उन्हें एकसाथ समेटना काफी मुश्किल हो रहा है।

बात पश्चिम रेलवे की !

पश्चिम रेलवे एक पुराना स्थापित जोन है। यहाँ इलेक्ट्रिकल के एक PHOD हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं। रिटायरमेंट से मात्र दस दिन पहले 20 अगस्त को वह अहमदाबाद कंस्ट्रक्शन में एक ऐसे JAG अधिकारी की पोस्टिंग कर गए, जिसने अपने अल्प सेवाकाल में छुट्टियाँ अधिक ली हैं, और ड्यूटी कम की है। दिवाली/छठ के समय बिलों के भुगतान रोक दिए—जब कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो हमने एक ट्वीट किया-

पता चला कि इस अधिकारी को जिस अधिकारी के स्थान पर लाया गया—वह एक साल से भी कम समय तक उक्त पद पर रहा। ये कैसा न्याय है, ये कैसा प्रशासन है कि एक अधिकारी को एक साल से भी कम समय में स्थानांतरित कर दिया?

सेवानिवृत्त PHOD महोदय और उनकी मैडम के शौक और स्वभाव सबको ज्ञात थे, इसीलिए पूरा विभाग उनके भोग-विलास में सेवारत था। क्या इसी सेवाभाव और इसी अपेक्षा में पुराना #DyCEE छोटा पड़ गया था? यह बात खुलकर हो रही थी कि मनचाही पोस्टिंग की एक तय ‘प्रक्रिया’ बन गई है, और जिसे उसके स्थान पर लाया गया, उसने पूरा सिस्टम बैठा दिया।

जीएम अमूमन अपने विभाग प्रमुख की बात मान लेते हैं, यदि विभाग प्रमुख कोई तर्क दे दे, तब तो जीएम उसे निश्चित रूप से मानते हैं। वैसे भी IRMS लेवल 16 की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है—केवल भय और भौकाल बचा रह गया है, और उस पर भी कब तक व्यवस्था चल पाएगी, यह सोचने वाली बात है।

पिछले कुछ सालों में पश्चिम रेलवे भ्रष्टाचार में आकंठ डूब गई है। भारतीय रेल के इस अग्रणी जोन की इस दुरावस्था के लिए रेल भवन ही जिम्मेदार है। बड़ौदा-अहमदाबाद की कहानी कई बार लिखी जा चुकी है। चूँकि बात गुजरात की है, तो माननीय प्रधानमंत्री जी का नाम लेकर यहाँ अधिकतर मंत्री जी के विश्वासपात्र ही पदस्थ होते रहे हैं, जिनके कार्य और कार्य-व्यवहार—दोनों ही देश के प्रधानसेवक से पूरी तरह उलट हैं।

बात पूर्वोत्तर रेलवे की !

यह रेल हमेशा से भ्रष्टाचार में डूबी रही है। यहाँ के रेलवे रिक्रुटमेंट (#RRB) और कार्मिक विभाग के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। मैकेनिकल, स्टोर्स, इलेक्ट्रिकल और कंस्ट्रक्शन विभाग की चर्चाएँ समय-समय पर होती रही हैं।

बात अब NER-मैकेनिकल के PHOD की !

क्रम संख्या 03 के आदेश को देखिए—ये ‘Independent Branch Officer’ के रूप में कार्यरत रहते हुए मंडल रेल प्रबंधक/लखनऊ को रिपोर्ट करेंगे।

इस आदेश का मुख्य कारण यह है कि प्रमुख मुख्य यांत्रिक अभियंता (#PCME) ने कार्यभार ग्रहण करते ही तीनों मंडलों—लखनऊ, बनारस, इज्जतनगर—के ब्रांच ऑफिसर (#SrDME) बदल दिए। दोनों मंडलों में तो ब्रांच ऑफिसर इनके हिसाब से फिट लग रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि लखनऊ मंडल से वे संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि पहले इन्होंने एस. पी. श्रीवास्तव, SrDME/LJN को हटाया, फिर रोहित त्रिपाठी, SrDME बनकर आए, और अब उनकी जगह नीलेश सिंह की SrDME/LJN के पद पर पोस्टिंग कर दिया।

प्रश्न ये है कि क्या वर्तमान SrDME/LJN—विभाग प्रमुख के कहे अनुसार नहीं चल रहे हैं? आखिर छह महीने के अंदर तीन वरिष्ठ मंडल यांत्रिक अभियंता (#SrDME)—वह भी लखनऊ मंडल जैसे महत्वपूर्ण एरिया में—क्यों बदल दिए गए? फिर क्यों न संदेह हो नीयत पर कि विभाग प्रमुख के नियंत्रण में उनका ही विभाग नहीं है?

मैकेनिकल ब्रांच के कई अधिकारी और कर्मचारी नाम न उजागर करने के शर्त पर स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि जो पश्चिम रेलवे—इलेक्ट्रिकल के हाल ही में सेवानिवृत्त विभाग प्रमुख चाह रहे थे—कुछ वैसी ही अपेक्षा पूर्वोत्तर रेलवे (#NERailway) के वर्तमान मैकेनिकल के विभाग प्रमुख की भी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार एक नॉन-रेलवे व्यक्ति का नाम बार-बार लिया जा रहा है। दबे स्वरों में यह कहा जा रहा है कि ब्रांच ऑफिसर को ‘प्रक्रिया’ समझाने का प्रयास किया जा रहा है। अब उपरोक्त आदेश को ही देखिए कि लखनऊ मंडल के ब्रांच ऑफिसर (SrDME/LJN नीलेश सिंह का पावर छीनकर गोरखपुर के SrCDO को “Independent Branch Officer” का आदेश निकाल दिया गया।

जानकारों का मानना है कि ऐसे आदेशों को दोनों ही तरह से जस्टिफाई किया जा सकता है। लेकिन चूँकि उत्तरदायित्व मंडल रेल प्रबंधक (#DRM) का रहता है, तो यदि वह टेंडर की पॉवर लखनऊ में रखना चाहते हैं, तो उसमें क्या गलत है? हालाँकि लखनऊ में ज्यादा अच्छे वेंडर आते हैं, यहाँ की कार्यशैली गोरखपुर की अपेक्षा निश्चित रूप से बेहतर है।

सूत्रों से पता चला है कि SrDME/ LJN का पावर छीनकर गोरखपुर के SrCDO को इसलिए दिया गया है कि टेंडर अवॉर्ड करने का सारा काम गोरखपुर में ले लिया जाए, जिससे टेंडर प्रक्रिया में सीधा दखल किया जा सके। रेल में भ्रष्टाचार का यह नया आयाम है, जिसमें विभाग प्रमुख सीधे मंडल के अधिकारों पर कब्जा करना चाहते हैं।

खबर यह भी है कि PCME अब तीसरे SrDME/LJN को भी हटाना चाहते हैं और अपने मनमाफिक अधिकारी को पोस्ट करना चाहते हैं!

वैसे एक तरह से ठीक ही है, गाड़ी को पटरी पर रखना जब प्राथमिकता नहीं रही, तो क्या अंतर पड़ता है, फिर काहे का डीआरएम और कौन उसका ब्रांच अधिकारी! क्रमशः

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी