सतीश कुमार को पुनः बधाई—चाकरी एक साल और बढ़ गई!
उनके पहले कॉन्ट्रैक्ट अपॉइंटमेंट पर हमने 28 अगस्त, 2024 को लिखा था: “पार्ट-टाइम मंत्री, ठेके पर चेयरमैन !”
दूसरे कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन पर हमने 28 अगस्त, 2025 को लिखा: “कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन का स्वागत है, पर टूटे मनोबल से रेल नहीं चल सकती, मोदी जी!”
Ep113: सतीश कुमार के कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन के निहितार्थ!
पिछले 11 सालों में सतीश कुमार छठवें अफसर हैं, जिन्हें कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन मिला है। इस दौरान आईआरएमएस आया और गया, बोर्ड मेंबरों की संख्या बढ़ी और घट गई, दो साल सभी भर्तियाँ बंद हुईं, इंजीनियरों की भर्ती चार साल बंद रही, अपारदर्शी तरीके से पैनल बने, एम्पैनेलमेंट के हास्यास्पद तरीके से अपने ही मंत्रालय में अप्लाई करना, फिर स्क्रीनिंग करना, डिले करना, अपील लेना! माई-बाप कल्चर के इन उत्कृष्ट उदाहरणों की सौगात खान मार्केट गैंग (#KMG) की एक खास जमात ने भारत को दी है।
रेल की मूलभूत समस्याओं के बारे में किसी ने नहीं सोचा, लेकिन डिवीजनों और जोनों की संख्या बढ़ा दी, मल्टी-ट्रैकिंग करके रेलवे बोर्ड चिट्ठी लिखकर पूछ रहा है-कि भाई, सेक्शन की औसत स्पीड पाँच किमी प्रति घंटे से क्यों नहीं बढ़ रही! दूसरी तरफ मालगाड़ियों की औसत स्पीड घटाकर भी डिरेलमेंट जैसी दुर्घटनाएँ थम नहीं रहीं।
इस उठा-पटक में डिवीजन को कंस्ट्रक्शन का काम दे दिया गया। दो डीआरएम—सीबीआई द्वारा अरेस्ट हुए। भारतीय रेल की छवि की बड़ी छीछालेदर हुई। तथापि टॉप लीडरशिप को कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कई विभाग प्रमुख (पीएचओडी) सीबीआई द्वारा धरे गए, फिर भी लीडरशिप के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। कई बहुत बड़ी दुर्घटनाएँ हुईं। सीआरबी की मासिक वीडियो कांफ्रेंसिंग (वीसी) अब किसी सेंट्रल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट का वाइवा लगने लगी हैं।
सतीश कुमार हो सकता है एक-दो और एक्सटेंशन ले लें-अब किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वेतन सबको मिलना ही है। लेकिन देश के लिए सीआरबी के कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन का ये निर्णय बहुत शोचनीय स्थिति पैदा कर देता है। यदि अधिकारियों के सामने प्रगति का पथ बंद हो गया, तो उनकी कोई एस्पिरेशन नहीं बचती, क्यों अपने सबसे अच्छे विचार और आईडिया पर काम करने की जहमत उठाई जाए? आप बताइए, हम कागज बना देंगे। क्या अब इसी भावना से रेल चलेगी?
सतीश कुमार के लिए ये कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन—व्यक्तिगत तौर पर आर्थिक लाभ का विषय हो सकता है—सरकार उन्हें कोई अन्य पद देकर बंगला, गाड़ी और पैसों का लाभ दे सकती है—लेकिन अपने टॉप लीडरशिप पिरामिड को ऐसे लगातार एक्सटेंशन दे-देकर बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं है।
सतीश कुमार ने अपना जीवन इसी रेल की नौकरी पर बनाया-सँवारा है—यदि उन्हें इस संगठन से प्रेम है, या वह इसके प्रति आदर का भाव रखते हैं—तो उन्हें इस कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन को स्वीकारना नहीं चाहिए, क्योंकि यह उनकी और पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यही विचार लगभग सभी रेल अधिकारियों का भी है।
उन्होंने महाभारत के एक उदाहरण के माध्यम से सतीश कुमार को स्मरण कराया है कि “भीष्म पितामह के जीवन का एक ही पाप था कि उन्होंने द्रौपदी के चीरहरण के समय क्रोध नहीं किया, और जटायु के जीवन का एक ही पुण्य था कि उन्होंने माता सीता के हरण के समय क्रोध किया। समय आने पर दोनों की मृत्यु हुई। लेकिन एक को तीखे बाणों की शैय्या मिली और दूसरे को प्रभु श्री राम की स्नेहिल गोद!”
याद रखें मोदी जी, रुके पानी को न तो आप पी सकते हैं, और न ही सड़ांध अथवा दुर्गंध के कारण उसके पास खड़े हो पाएंगे। एक्सटेंशन की पालिसी कुछ ऐसा ही कर रही है, क्योंकि इससे अब दुर्गंध आने लगी है। इसके दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं।
28 अगस्त, 2024 को हमने लिखा था: “पार्ट-टाइम मंत्री, ठेके पर चेयरमैन!” इस आर्टिकल में हमने लिखा था: “Hon’ble Prime Minister Narendra Modi ji, Indian Railways has largest pool of talented and motivated Group ‘A’ officers under one Ministry. Still you choose to grant extension to officers who have no quality, credibility, competency or standing? Why is true information and feedback not reaching your office?”
मोदी जी, स्मरण रहे कि भले ही सरकार आपकी है, मगर सिस्टम आज भी केएमजी का ही चल रहा है। रेल मंत्रालय—जो सदैव प्रमुख मंत्रालय हुआ करता था—को आपने दोयम दर्जे का मंत्रालय बना दिया। पिछले ग्यारह सालों में आप न तो इसे फुल टाइम मंत्री दे पाए, और न ही फुल टाइम चेयरमैन! देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहे कुल निवेश का लगभग एक चौथाई निवेश रेल में हुआ है, मगर जहाँ देश की जीडीपी बढ़कर 7.8% हो गई है, वहीं रेल का इंफ्रास्ट्रक्चर इन ग्यारह सालों में मात्र 1.7% ही बढ़ पाया है, जबकि यह राष्ट्रीय औसत के अनुपात में बढ़ना चाहिए था। तो प्रश्न यह उठता है कि आपका लाखों करोड़ का निवेश कहाँ गया?
मोदी जी, यह प्रश्न आगे चलकर समस्याएँ पैदा कर सकता है। यह इसलिए हो रहा है, क्योंकि सिस्टम आपके नहीं, केएमजी के हाथ में है, जिसके चलते लांग स्टे ऐट वन प्लेस, लांग-लांग टाइम हाउस रिटेंशन और सीआरएस रिपोर्ट्स को पब्लिक डोमेन से बाहर करना इत्यादि, रेल की ब्यूरोक्रेसी ने अपने लाभ के लिए कुछ ऐसे खड्ड बना लिए हैं, जिनसे भ्रष्टाचार, मनमानी, जोड़-तोड़ की भयावह दुर्गंध उठ रही है, और इसे न तो आप नियंत्रित कर पा रहे हैं, न ही आपके रेलमंत्री को इसकी कोई परवाह है। परिणाम सामने है—आपका लाखों करोड़ का निवेश इन्हीं खड्डों में जा रहा है! कॉन्ट्रैक्ट सीआरबी कुछ भी कंट्रोल करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि वह भी इसी सिस्टम का हिस्सा है।

