कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन का स्वागत है, पर टूटे मनोबल से रेल नहीं चल सकती, मोदी जी !

दूसरे एक्सटेंशन पर सतीश कुमार को बधाई!

बतौर सीआरबी, सतीश कुमार के दूसरे एक्सटेंशन/कॉन्ट्रैक्ट पर वरिष्ठ रेल अधिकारियों की बहुत कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है!

वैसे ही रेलवे की लीडरशिप का खान मार्केटियों ने कबाड़ा कर रखा था, और जैसा हम लिखते रहे हैं, ‘उनका’ सिस्टम अभी भी खत्म नहीं हुआ है। डीआरएम के टेन्योर में गुजरात में औद्योगिक भ्रष्टाचार करने के बाद भी दिल्ली में पुनर्वास, वह भी रेलवे बोर्ड में इसी अधिकारी ने किया, जिनके ठेके पर बहाली के पीरियड को एक साल और बढ़ा दिया गया है। ये कैसे माना जाए कि ये जो खान मार्केटियों को संरक्षण दे रहे हैं, वह ‘खान मार्केट वायरस’ से प्रभावित नहीं?

एक सामान्य रेलकर्मी की प्रतिक्रिया

पहले अड़तालीस से पचास की उम्र में डीआरएम बन जाते थे और फिर शुरू होता था जीएम और बोर्ड मेंबर बनने का एक दशक का सफर। अब तो जीएम के लिए डीआरएम और बोर्ड मेंबर के लिए जीएम बनना बाध्यता ही नहीं रही। आज डीआरएम टेन्योर 54-55 की उम्र में खत्म हो रहा है—अर्थात्, डीआरएम की पोस्टिंग के बाद अधिकारी के पास बमुश्किल 6-7 साल की सर्विस बचती है। इतने कम कार्यकाल में रेल की टॉप 100 पोस्ट निपट जाएंगी।

ऐसे में किश्तों में दिए जा रहे यह एक्सटेंशन पूरे सिस्टम के निर्णय लेने वाले स्तर को बुरी तरह प्रभावित कर देते हैं। ठेके पर चलने वाले अधिकारी के पास विश्वसनीयता नहीं बच पाती-क्यों उनके जीएम और बोर्ड मेंबर उन पर विश्वास रखेंगे? या उनसे अपने सबसे अच्छे आईडिया शेयर करेंगे? क्यों उन्हें कोई कारगर सलाह देंगे? ये ठेके वाला अधिकारी उनसे जो कहेगा, वे उसे यथासंभव यथावत कर देंगे और चुप बैठेंगे, वह चलाए अपना सिस्टम, एक्सटेंशन-काँट्रेक्ट उसने स्वीकार किया है!

एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने 23 अगस्त को यह इनपुट भेजा था!

प्रधानमंत्री को रेल से खान मार्केट का वायरस निकालना पड़ेगा। रेल अधिकारियों में रेल के राजनैतिक नेतृत्व के प्रति सम्मान जरूरी है। मोदी जी को ये देखना पड़ेगा कि उनके ग्यारह साल में जितने एक्सटेंशन दिए गए, उनके कार्यकाल में सरकार को कहीं न कहीं शर्मिंदगी ही उठानी पड़ी है, और निर्णयों की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं रही।

हमने रेल के टॉप 100 अधिकारियों में कई अधिकारियों से फीडबैक लिया—किसी एक ने भी सरकार के इस निर्णय पर खुशी नहीं जताई है! बल्कि यह कहा कि सरकार की यह ऐतिहासिक भूल है और आने वाले समय में सरकार और सिस्टम, दोनों को इसका नुकसान भुगतना पड़ेगा!

क्योंकि, टूटे मनोबल से रेल नहीं चल सकती।

जब सतीश कुमार पहली बार सीआरबी बने थे—11 महीने का एक्सटेंशन/काँट्रैक्ट लेकर—तब 24 अगस्त 2024 को हमने लिखा था: पार्ट-टाइम मंत्री, ठेके पर चेयरमैन! मोदी जी, यह आर्टिकल आपके लिए पुनः प्रस्तुत है—एक बार पुनः पढ़ लें! बड़ी कृपा होगी इस देश पर, और आपके अपने इस अनौचित्यपूर्ण निर्णय पर!

मोदी जी, हालाँकि आपके इस निर्णय से व्यक्तिश: हमें कोई आपत्ति नहीं है, और न ही इससे हमारे ऊपर व्यक्तिगत तौर पर कोई प्रभाव पड़ता है, तथापि हम आपके इस अनौचित्यपूर्ण, अनावश्यक, निरर्थक और तर्कहीन निर्णय से कदापि सहमत नहीं हैं! क्योंकि आपके इस निर्णय से रेल का पूरे सिस्टम हतोत्साहित हुआ है, और रेल के समस्त कार्मिक वर्ग का मनोबल पूरी तरह से टूट गया है!