Trackman on Patrolling Duty in Winter Season

#Trackmaintainer are #Superman of #IndianRailways

उत्तर भारत सहित देश के ज्यादातर हिस्सों में सर्दियों का मौसम शुरू हो चुका है। ठंड के समय भारतीय रेल में एक पेट्रोलमैन या ट्रैकमैन से 16 से 20 किमी. तक पेट्रोलिंग कराई जाती है।

इस संदर्भ में आज कुछ रोचक तथ्यों की जानकारी शेयर करता हूं-

मान लेते हैं कि यह दूरी कम से कम 16 किमी. है। 16 किमी. रेलवे ट्रैक पर पैदल चलकर एक ट्रैकमैन को रेल लाइन (ट्रैक) की गस्त (पेट्रोलिंग) करनी होती है।

अब यह देखें कि असल में ये दूरी कितनी होती है और इसे तय करने के लिए ट्रैकमैन के चलने की गति कितनी होनी चाहिए?

16 किमी. पर सबने ध्यान दिया होगा। रेलवे ट्रैक के किनारे खंभे (ओएचई मास्ट) गड़े होते हैं और एक ओएचई मास्ट से दूसरे ओएचई मास्ट तक की दूरी कम से कम 72 मीटर होती है। तो 16 किमी. में ऐसे कितने पोल आएंगे?

16000÷70=222 ओएचई मास्ट
यानि 16 किमी. में कम से कम 222 खंभे होंगे।

इंजीनियरिंग विभाग के लगभग सभी कर्मचारियों को इस बात की जानकारी होगी कि एक खंभे से दूसरे खंभे के बीच कम से कम 120 पटिया (स्लीपर) लगे होते हैं। तो 222 खंभों के बीच कुल कितने ‘पटिया’ यानि स्लीपर लगे होंगे?

220×120=26,400 कुल स्लीपर

यानि कुल 16 किमी. में रेलवे ट्रैक पर कम से कम 26,400 स्लीपर लगे होते हैं। इन बिछे हुए स्लीपर की आपस में दूरी एक आम आदमी के लगभग ‘एक कदम’ के बराबर होती है।

अब यदि कोई ट्रैकमैन ‘एक कदम – एक सेकेंड’ की गति से रेलवे ट्रैक पर चलता है, तो 26,400 स्लीपर पार करने के लिए न्यूनतम कुल 26,400 कदम चलना पड़ेगा, यानि ‘एक कदम-एक सेकेंड’ की गति से चलने पर उसे 16 किमी. चलने के लिए कम से कम 26,400 सेकेंड लगेंगे।

26400 सेकेंड का मतलब हुआ-
26400÷60=440 मिनट
440m÷60= 7.33 घंटा

यानि एक ट्रैकमैन बिना रुके चले, तब उसे यह 16 किमी. की दूरी चलने में कम से कम 7.30 घंटे लगेंगे, जबकि इस दौरान उसे ट्रैक पर नजर आने वाली खामियों को भी ठीक करते चलना होता है और ट्रैक पर आने-जाने वाली गाड़ियों का ध्यान रखकर अपनी व्यक्तिगत संरक्षा और सुरक्षा का भी ख्याल रखना पड़ता है।

मान लें कि पेट्रोलिंग के दौरान रात भर में एक लाइन पर कम से कम 20 गाड़ियां निकलती हैं। ऐसे में दो लाइन पर कुल 40 गाड़ियां हो जाती हैं।

दूर से आती हुई गाड़ी को देखकर पेट्रोलमैन ट्रैक से बाहर हटकर गाड़ी के पास होने तक इंतजार करता है और इस दौरान वह सीटी बजाकर, बोर्ड दिखाकर और टार्च जलाकर लोको पायलट एवं गार्ड के साथ सिग्नल एक्सचेंज करता है।

यह सब करने और एक गाड़ी को पास करने में उसके कम से कम 3 मिनट लग जाते हैं। ऐसे में 40 ट्रेनों को पास करने में कम से कम 40×3=120 मिनट लगेगा। मतलब दो घंटे और लगेंगे।

अब देखें, पहले के 7.30+2=9.30 घंटे। यानि 9 घंटा 30 मिनट बिना रुके, बिना आराम किए एक ट्रैकमैन को बिजी ट्रैक पर अपनी सुरक्षा और संरक्षा को ध्यान में रखकर चलना होता है।

पेट्रोलिंग के दौरान बुक एक्सचेंज करने और गेटमैन एवं स्टेशन मास्टर से हस्ताक्षर करवाने में कई बार आधा घंटा भी लग जाता है। ऐसे में एक ट्रैकमैन को 16 किमी. की दूरी तय करने में कम से कम कुल 11 घंटे लग जाते हैं, वह भी बिना रुके और बिना आराम किए चलते रहने पर!

अब विडंबना यह है कि 11 घंटे के इस सतत काम को ट्रैकमैनों से 8 घंटे में पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है और वह भी पूरी संरक्षा-सुरक्षा के साथ रेलवे को दुर्घटनाओं से भी बचाने को कहा जा रहा है, स्वयं को भी बचाओ, तथा दंड से भी बचो।

सच में यदि देखा जाए तो ट्रैकमैन ‘आम आदमी’ नहीं हो सकता, वह तो कोई ‘सुपरमैन’ ही हो सकता है!!