Ban the cancer of fake encounters
Fake encounters must be condemned in a democracy
If we really love this country, if we want democracy to survive and if we want the police/courts to be effective then we must banish the cancer of fake encounters by police which only serves the crime-police-politics nexus very well.
It’s a mockery of the criminal justice system which of course needs reforms.
Policemen concerned should be dismissed and jailed immediately, if an accused escapes or dies in their custody.
The government, judiciary and society must take serious note and must immediately legislate to make such mockery of the criminal justice system impossible.
Sufficient deterrent and judicial reform is required.
No, This is not about human rights at all.
No one can have sympathy with such criminals and terrorists either.
Justice to the policemen who were killed by this dreaded criminal would have been done only by unearthing the full nexus which is now impossible.
Fake encounters must be condemned in a democracy.
यह भी कहा जा रहा है कि विकास दुबे के घर से जैसे ही प्रमुख सचिव के नाम पर रजिस्टर्ड गाड़ियां मिलने की खबर बाहर आई, उसके तुरंत बाद घर तोड़ने के लिए जेसीबी पहुंच गई। घर को मलवे में तब्दील कर दिया गया। गाड़ियों को तोड़कर नष्ट कर दिया जाता है।
कुछ लोग इसको उपलब्धि बता रहे हैं कि देखिए, योगी जी किसी को छोड़ेंगे नहीं, पर इस उपलब्धि से वह 8 पुलिस वाले जिंदा हो जाएगे क्या, जो नेता-पुलिस गठजोड़ की राजनीति का शिकार हुए?
दरअसल ये खुश होने का नहीं, जागरूक होने का समय है? क्राइम स्पॉट पर मौजूद साक्ष्यों को जांच के लिए पुलिस कब्जे में लेती है, उनको नष्ट किया जाना कानून के खिलाफ है।
आखिर उस मलवे में क्या-क्या नष्ट किया गया? और कयों? यह सवाल अदालत में पुलिस से जरूर पूछा जाना चाहिए! सीसीटीवी फुटेज? वहाँ मौजूद हथियारों का जखीरा? उसके घर किस-किस का आना जाना था? यह सब मलवे में दबा दिया गया?
जो गाड़ियां नष्ट की गईं, वह गाड़ियां विकास दुबे के नाम पर थीं या फिर वह भी सचिवालय के आस-पास की थीं? विकास दुबे के घर से कितने हथियार मिले? वे सब हथियार किस किस्म के थे? जिस घर से वह अपनी दबंगई चलाता था, वहां बहुत कुछ छिपा हो सकता था!
आखिर सारी जांच प्रक्रिया पूरी होने तक इंतजार क्यों नहीं किया जा सकता था? प्राथमिकता विकास दुबे और उसके गैंग को पकड़कर अदालत के सामने खड़ा करने की होनी चाहिए थी, ताकि पुलिस का मनोबल बढ़ता और उसका आत्मविश्वास वापस आ सकता, जबकि प्राथमिकता उसकी क्रूर हत्या करके पुलिसिया बदला लेने को दी गई?
विकास दुबे के घर और महंगी कारों का जेसीबी लगाकर इस तरह तहस-नहस किया जाना, जैसै गन उठाकर 8 पुलिस वालों को इन गाड़ियोंने ने ही मारा हो! विकास दुबे गैंग के 8 लोगों में से 6 का एनकांउटर में मारा जाना, क्या कहानी कहता है?
ऐसी कई बातें हैं जो न सिर्फ पुलिस कार्रवाई पर पूरा संदेह पैदा करती हैं, बल्कि सहजता से किसी के भी गले नहीं उतर रही हैं। पर चूंकि राजनीतिक दलों ने यह मिथक खड़ा कर दिया है कि “जनता की याददाश्त कमजोर होती है, कुछ दिन बाद वह सब भूल जाएगी”, मगर अब सोशल मीडिया के दौर में उन्हें अपना यह मुगालता छोड़ना या बदलना पड़ेगा!
खुशखबरी
आज कोरोना की छुट्टी है।
आज मीडिया सिर्फ “विकास” पर व्यस्त है।
शायद भारत के इतिहास ये पहली ऐसा बार हुआ है कि सब राजनीतिक दल ये दावा कर रहे हैं कि “विकास” से हमारा दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।




