Most of us have not read all the books written by Babasaheb Bhimrao Ambedkar

Congress who always deliberately underplayed and subdued the role of Babasaheb to promote only Gandhi-Nehru

“उस व्यक्ति पर कभी भरोसा मत करो, जो तुमसे दूसरों की चुगली करता हो !”

विपक्ष द्वारा बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत कराए गए दिल्ली दंगों के बाद अब उसी खूब सुविचारित रणनीति के तहत इन दंगों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराने की राजनीति शुरू हो गई है। मोदी सरकार अपनी उदारता के चलते एक तरफ जहां लगातार क्षेत्रीय और जाति-वर्ग आधारित पार्टियों की राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का शिकार होकर अपने परंपरागत वोट से हाथ धोती चली जा रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके द्वारा देश हित में किए जा रहे निर्णयों को विपक्ष देश विरोधी साबित करने में बाजी मार ले जाता नजर आ रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही बाबा साहेब अंबेडकर को सर्वोच्च महापुरुष का दर्जा देते अपने सभी संबोधनों में स्वयं को और भाजपा को भी सबसे बड़ा दलित हितैषी होने का दावा करते दिखाई देते हैं, परंतु प्रदर्शनकारियों के एक हाथ में संविधान की किताब और दूसरे हाथ में बाबा साहेब के फोटो-कटआउट्स थमाकर विपक्ष ने मोदी सरकार की तमाम देश हितैषी योजनाओं पर पानी फेरने में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी है। इसमें यदि एनडीए में शामिल कुछ जातीय पार्टियों का भी विपक्ष को छुपा समर्थन हासिल हो, तो कोई बड़ी बात नहीं है।

भाजपा और खासतौर पर मोदी-शाह की बढ़ती लोकप्रियता से कांग्रेस, सोनिया, ममता, मुलायम, मायावती, ओवैसी, वामपंथी इत्यादि सहित सभी विपक्षी पार्टियां बुरी तरह बौखलाई हुई हैं। इसके लिए उनके द्वारा मोदी-शाह को रोकने के लिए मुस्लिम-दलित का कार्ड बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है। दलित वर्ग को इस बुरी तरह से गुमराह किया गया है कि वह बाबा साहेब अंबेडकर के समस्त आदर्शों को दरकिनार करके इस धारा में बहा चला जा रहा है। इस चक्रवात में उसको अपने दुरूह भविष्य का भी भान नहीं रह गया है।

Unfortunately most of us have not read all the literatue and the books written by Baba Saheb Ambedkar but fall pray to the writing and narratives of the people (hard core leftist, muslim leaguee converted as leftist intellectual after partition and of course congressi who always deliberately underplayed and subdued the role of baba saheb to promote only Gandhi-Nehru (mainly), and Indira.

I have read almost all his literature and I rate Babasaheb above Gandhi. He was deliberately projected by above group as caste leader or leader of Dalits only, so that Nehru-Gandhi could be projected/injected in the minds of Indian as only National leader.

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के राष्ट्र के प्रति योगदान को योजनाबद्ध तरीके से ऐसे छोटा किया गया कि उनके सामने के बौने लोग बहुत-बहुत बड़े नजर आए और बाबा साहब बौने।

बाबा साहेब दिल से एक बहुत बड़े राष्ट्रवादी थे। सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि आज अधिसंख्य लोग अब यह सोचने लगे हैं कि देश का कितना बड़ा सौभाग्य होता, यदि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की जोड़ी आजादी के बाद इस देश की कमान संभालती, लेकिन दुर्भाग्य से इस देश को गांधी-नेहरू की जोड़ी मिली।

एक बात और, चूंकि हम सभी इसी शिक्षा व्यवस्था की देन हैं, तो जैसा हम सभी का सोच बनाना था, वैसा ही ‘कॉलोनियल राइटर्स’ से लेकर सत्तर सालों तक लीगियों, वामियों, कांगियों को पढ़-पढ़कर इस देश के बच्चों का सोच वास्तविक राष्ट्र नायकों के विषय में वैसा ही बनता गया जैसा वे बनाना चाहते थे।

दलित समाज के लोग भी बिना पढ़े, बिना सोचे-समझे सिर्फ भावनात्मक आधार पर बाबा साहेब का समर्थन करते हैं, जिसके चलते अधिकांश लोग उन्हीं बुद्धि-पिशाचों के जाल में फंस जाते हैं, जिसका बाबा साहेब आजीवन निग्रह करते रहे और बचते रहे तथा जो लोग बाबा साहेब को अपनी शैतानी शातिरता से अपने ही लक्ष्य की पूर्ति के लिए एक वर्ग विशेष के नेता से ज्यादा उनकी छवि बनने नहीं दिया।

लेकिन अगर गौर से देखेंगे, तो आप-हम सब यह मानेंगे कि कांग्रेस के जाने के बाद 2014 से पूरे देश मे बाबा साहेब को उनकी समग्रता में देखने और समझने का दौर भी शुरू हुआ है और इसको मोदी सरकार ने बढ़ावा देना शुरू किया है, जिससे नेहरू-गांधी की छाया से दबे लोग इस देश के असली महानायकों को देखने-समझने और उनके प्रति कृतज्ञ होने का ऋण तो अदा कर ही रहे हैं, बल्कि अब उनके प्रति अपना कर्तव्य भी पूरा कर रहे हैं।

उन्हीं के लोग इस पर ये भी बोल सकते हैं कि मोदी यह सब राजनीति के लिए ये कर रहे हैं, लेकिन वहीं ये लोग यह नहीं पूछेंगे कि इससे पहले कांग्रेस, ममता, डीएमके, सीपीआई, सीपीएम आदि पार्टियों ने ही पॉलिटिक्स के लिए भी ये क्यों नहीं कर लिया था? !वर्ष 2014 से पहले जेएनयू, एएमयू, जादवपुर, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश और अवार्ड वापसी गैंग, वामपंथी विरोधों तथा मुसलमानों के आंदोलनों में बाबा साहेब के कटआउट और जय भीम का नारा कहां था? यह भी एक सोचने वाली बात है!

अब जब बहुसंख्यक वर्ग (हिंदू) पढ़कर दूसरा पक्ष देख रहा है और सच्चे राष्ट्रनायकों को लेकर जागृति आ रही है, तब ये राष्ट्र विरोधी (जो या तो सिर्फ कांग्रेसी, नेहरूवादी, इंदिरावादी, सोनियावादी हैं, या सिर्फ मार्क्सवादी, माओवादी, लेनिनवादी या सिर्फ मुस्लिम, अथवा फिर ख़ालिस अवसरवादी, संकीर्ण और क्षेत्रीय राजनीति करने वाले हैं) अपने पूज्यों का फोटो और नारा छोड़कर बाबा साहेब अंबेडकर का फोटो और नारा लेकर घूम रहे हैं।

ऐसे में इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि ये सभी अपने पूज्य भगवान नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, मार्क्स, लेनिन, माओ, ममता, जिन्ना, मुलायम, मायावती का फोटो भी बाबा साहेब के साथ प्रदर्शन में – साथ में क्यों नहीं लाते?

ये सब ऐसा इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इनको पता है कि इनके अपने-अपने पूज्यों की पोलपट्टी लोगों के सामने खुल चुकी है और उससे उन्हें अब दुबारा भुनाने का मौका नहीं मिलेगा। तब ये शैतान, प्रतीक के रूप में महानायकों का, तिरंगे का, देशभक्ति गीतों/प्रतीकों का प्रयोग कर रहें हैं और मेरे हिसाब से इस सरकार को इस ‘साइलेंट ट्रांसफार्मेशन’ का श्रेय जाता है। अब देखना यह है कि ये बहरूपिये जीतते हैं, या महानायकों की संतानें इसमें बाजी मारती हैं।

बाबा साहेब पर 2015 में ‘पांचजन्य’ ने देश के लोगों के सामने बाबा साहेब के व्यक्तित्व और कृतित्व को सही ढंग से लाने की मुहिम शुरू करने का आवाहन करते हुए तब कई संस्करण निकाले थे।

अगर मोदी सरकार को पॉलिटिक्स ही करनी होती, तो 2014 में सत्ता में आते-आते ही महानायकों को राष्ट्र के पटल पर सही परिप्रेक्ष्य में रखने का अभियान शुरू नहीं करती, जबकि उनकी सरकार पूर्ण बहुमत से आई थी। यदि इस सरकार को वोट पॉलिटिक्स से ही काम करना होता, तो वह इसे 2017-18 से शुरू करती और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को किसी भी दबाव के आगे न झुकते हुए कभी नहीं पलटती!

आज जब मैं लोगों से बात करता हूं, तो मुझे इस बात की खुशी होती है कि अब अधिकांश लोग सच्चे राष्ट्रनायकों को समझने लगे हैं और अब उनमें पहले जैसी अज्ञानता नहीं रह गई है। बहुत से लोग इसी चक्कर में पढ़ भी रहें है और यही सपना शायद हमारे सच्चे राष्ट्रनायकों का भी था कि उनकी संततियां प्रज्ञावान बनें, न कि भेड़चाल में चलने वाली, और इतनी बुद्धि रखें कि जिससे कोई उनका प्रयोग राष्ट्र की बरबादी में न कर सके, जिसे बड़े बलिदानों के बाद उन्होंने हमें दिया है।

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