नगण्य फील्ड अनुभव और दिशाहीन नीतियां: रेलवे की संरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न
पूर्व रेलवे की वर्तमान महाप्रबंधक नॉन-फ्रंटलाइन सर्विस से हैं। हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमें किसी अधिकारी या कैडर विशेष के प्रति कोई दुराभाव नहीं है! पूर्व रेलवे का संरक्षा प्रदर्शन (सेफ्टी परफॉर्मेंस) बेहद चिंताजनक रहा है। इसके एक डीआरएम को बदलने पर बड़ा विवाद हुआ था। इससे पहले वाले महाप्रबंधक स्टोर्स विभाग से थे, जिनके कार्यकाल में पूर्व रेलवे की संरक्षा व्यवस्था रसातल में पहुँच गई थी। अब यहाँ एकाउंट्स की अधिकारी जीएम हैं। वह पूरी मेहनत कर रही हैं, परंतु पिछले सालों में बिगड़ी व्यवस्था को पटरी पर लाने में शायद ही वह सफल हो पाएँ।
जब आपने जीवन में कभी फुटप्लेटिंग नहीं की, मानसून में अपने वॉचमैन के साथ समय नहीं बिताया, ब्रीच (जलभराव या ट्रैक धंसने की घटना) को अटेंड नहीं किया, ब्रेकडाउन में अपने स्टाफ के साथ रातभर काम नहीं किया, पिट में अपने टेक्निशियन के साथ नहीं गए, टावर वैगन के डेक पर नहीं चढ़े, ईएसएम (#ESM) को ट्रबलशूट करने में मदद नहीं की, पॉइंट एडजस्टमेंट की चुनौतियों को नहीं देखा, चलती गाड़ी में ट्रबलशूटिंग नहीं की, और अपने ट्रैक पर कटे हुए किसी स्टाफ के परिवार को गले नहीं लगाया—तो आप मातहतों को क्या प्रेरणा देंगे?
पूर्व रेलवे से प्राप्त जानकारी बताती है कि 19 सितंबर को सीआरबी (#CRB) की सेफ्टी मीटिंग बेहद डराने वाली थी। पूर्व और पूर्व मध्य रेलवे में पिछले कुछ महीनों के दौरान चार मेमू (#MEMU) ट्रेनों में आग लग चुकी है। जिस स्तर की बातचीत पूर्व और पूर्व मध्य रेल के पीसीएमई (#PCME) तथा सीआरबी कर रहे थे, उसका निम्न स्तर वास्तव में डराने वाला था। यह ऑफिस ऑर्डर 58/2016 की गूँज है।
दूसरी ओर, राष्ट्रीय मीडिया में आने वाली सूचनाएँ बताती हैं कि मैकेनिकल विभाग ‘साम्राज्य विस्तार’ की मानसिकता के चलते अपना मुख्य काम पूरी तरह भूल गया है। एलएचबी (#LHB) कोचों में लग रही जंग आज एक बहुत बड़ी चिंता का कारण बन गई है। इसके साथ ही, चलती ट्रेन का पार्टिंग (विभाजित) होना, ब्रेक खराब होना, ओबीएचएस (#OBHS) द्वारा सफाई की व्यवस्था का पूरी तरह चरमराना, और मैकेनाइज्ड लांड्री पर हजारों करोड़ खर्च होने के बावजूद उसकी लचर परफॉर्मेंस को ट्विटर पर आसानी से देखा जा सकता है।
कोढ़ में खाज की स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब महाप्रबंधक और मंडल रेल प्रबंधक जैसे शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी फील्ड से पूरी तरह कटे होते हैं।
3 सितंबर को मंत्री जी ने पूरी भारतीय रेल की सभी पॉइंट मशीनों की टेस्टिंग का निर्देश दिया, क्योंकि मात्र पंद्रह दिनों के भीतर बालासोर श्रेणी की दो गंभीर घटनाएँ घट चुकी थीं। इसके बाद डीआरएम और जीएम को कड़े निर्देश जारी किए गए। लेकिन, 14 सितंबर को प्राथमिकता बदलकर ईएनएचएम (#EnHM) यानी सफाई और स्वच्छता 6.0 ड्राइव हो गई। फिर कुछ ही दिनों में यह बदलकर पानी की गुणवत्ता की जाँच बन गई। इसका सीधा मतलब है कि मात्र पंद्रह दिनों के भीतर तीन अलग-अलग प्राथमिकताएँ तय कर दी गईं! (15 सितंबर 2026, “Railway Officers Are Confused”
ईएनएचएम मैकेनिकल विभाग की सबसे बड़ी विफलता है, यही कारण है कि अपनी खाल बचाने के लिए इसके अधिकारी सीधे सीआरबी से चिट्ठी लिखवाते हैं। लोग अपना सिर खुजलाने को मजबूर हैं कि आखिर रेलवे बोर्ड वास्तव में चाहता क्या है? सीआरबी अपने संबंधित बोर्ड मेंबर या मुख्यालय के संबंधित पीएचओडी (#PHOD) से संवाद क्यों नहीं करते? क्या उन्हें किसी जूनियर अधिकारी से बात करना अधिक सुविधाजनक लगता है?
19 सितंबर की मीटिंग में तो गजब ही हो गया। कोटा और जबलपुर के डीआरएम द्वारा सिविल इंजीनियरिंग पर सीआरबी साहब के समक्ष समानांतर रिसर्च प्रस्तुत की जा रही थी, जिसकी जानकारी मेंबर इन्फ्रास्ट्रक्चर तक को नहीं थी! सीआरबी आरडीएसओ (#RDSO) पर जमकर बरसे और यहाँ तक कह दिया कि एपीएआर (APAR) रंग दी जाएंगी। साहब शायद यह भूल गए कि आरडीएसओ में पोस्टिंग उन्हीं के स्तर से होती है, और इसीलिए आज इस संस्थान का बुरा हाल किसी से छिपा हुआ नहीं है। इस विषय पर हमने पहले भी लिखा था — “Approved by RDSO | Part VI: A Policy Built on Confusion About What RDSO Is For” सितंबर 18, 2026.
ऐसे में मुख्य प्रश्न यह उठता है कि: प्राथमिकता केवल एक होनी चाहिए—और वह है संरक्षा (सेफ्टी)! पानी की टेस्टिंग से जुड़े कार्य उसी से संबंधित विभाग को करने दिए जाएँ। ईएनएचएम का काम केवल ईएनएचएम ही करे। रेलवे बोर्ड की समानांतर व्यवस्थाएँ पूरे सिस्टम को अंदर से कमजोर कर रही हैं। आरडीएसओ की वर्तमान पोस्टिंग और कार्यप्रणाली ऐसी हो चुकी है कि हाल ही में कई शाखाओं और डायरेक्टोरेट की चर्चाओं में यह बात सामने आई कि फील्ड स्तर पर आ रही कई गंभीर विफलताएँ—जो सीधे बोर्ड स्तर पर डिस्कस हो रही हैं—उनकी आरडीएसओ के संबंधित डायरेक्टोरेट को हवा तक नहीं होती। यदि पदस्थापन के निर्णय केवल अधिकारियों की सुख-सुविधा को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे, न कि रेलवे के हित में, तो परिणाम यही भुगतने पड़ेंगे।
निष्कर्ष : भारतीय रेल देश की जीवन रेखा है, जहाँ संरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता यात्रियों के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ है। वर्तमान परिदृश्य यह रेखांकित करता है कि जब शीर्ष प्रशासनिक पदों पर फील्ड अनुभवों से परे केवल औपचारिक और कागजी निर्णय थोपे जाते हैं, तब व्यवस्था का मूल उद्देश्य भटक जाता है। नीतिगत विरोधाभास, प्राथमिकताओं का बार-बार बदलना और तकनीकी संस्थानों की स्वायत्तता और कार्यक्षमता में गिरावट इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि सिस्टम को तत्काल सुधारात्मक रिफॉर्म की आवश्यकता है। रेलवे की साख और यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखने के लिए यह अनिवार्य है कि प्रशासनिक नियुक्तियों में फील्ड अनुभव को प्राथमिकता दी जाए, बोर्ड स्तर पर संकीर्ण और समानांतर व्यवस्थाओं को समाप्त किया जाए, तथा जवाबदेही तय की जाए। यदि समय रहते इन गहरी खामियों को दूर नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह कुप्रबंधन भारतीय रेल के बुनियादी ढ़ाँचे और जनसुरक्षा के लिए एक लाइलाज संकट बन सकता है।

