पॉलिसी करप्शन: रेलवे में ‘एम्पायर बिल्डिंग’ का खेल
भारतीय रेल में बार-बार होने वाले नीतिगत बदलाव (पॉलिसी चेंज) प्रशासनिक सुगमता के लिए नहीं, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार और कदाचार का मुख्य आधार बन चुके हैं। रेल विशेषज्ञ और अंदरूनी सूत्र इसे “पॉलिसी करप्शन” का नाम दे रहे हैं, जिसका सबसे बड़ा और ज्वलंत उदाहरण ‘पावर कार पॉलिसी’ के रूप में सामने आया है। इस संबंध में रेल जगत की प्रतिष्ठित मीडिया वेबसाइट Railwhispers.com द्वारा प्रकाशित खोजी श्रृंखला—विशेष रूप से मुख्य लेख, “Administrative Restructuring and Policy Shift in Power Car Operations”—ने रेल प्रशासन के शीर्ष स्तर पर बैठे गठजोड़—खान मार्केट गैंग (#KMG) और उसके कारण होने वाले भारी वित्तीय नुकसान को उजागर किया है।
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- July 1, 2026: “One Asset, One Manager? The रायता Reaches the Field”
- July 2, 2026: “Part-II: The Order That Bled, and the Letter That Was Pulled Back”
- July 3, 2026: “Part III: Who Pays, and What the Board Should Actually Do”
कागजी आधुनिकीकरण बनाम जमीनी हकीकत यह है कि आज रेल का खर्च पांच गुना बढ़ गया है। एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने सोर्स इंफॉर्मेशन के आधार पर उपरोक्त आर्टिकल ने इस तथाकथित नीतिगत बदलाव पर बेहद गंभीर प्रश्न उठाए हैं। अधिकारी का कहना है कि तथाकथित रीस्ट्रक्चरिंग के बाद भी जमीनी स्तर पर काम करने वाले लेबर (वर्कफोर्स) या उनकी तकनीकी योग्यता (क्वालिफिकेशन) में रत्ती भर भी बदलाव नहीं हुआ है। आज भी वही आउटसोर्स्ड लेबर ट्रेनों और डिपो में काम कर रहा है, लेकिन रेल प्रशासन उसी काम के लिए पहले की तुलना में आज पांच गुना से अधिक खर्च कर रहा है।
“जो काम पहले एक रुपये में होता था, उसके लिए आज सरकारी खजाने से पांच रुपये लुटाए जा रहे हैं। इसका असली लाभार्थी कौन है? इस भारी-भरकम खर्च के बावजूद धरातल पर स्थिति यह है कि न तो कॉन्ट्रैक्ट लेबर को समय पर वेतन मिल रहा है, न ही उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन दिया जा रहा हैं, और न ही काम की गुणवत्ता में कोई सुधार हुआ है।”
इस सबके पीछे ऑफिस ऑर्डर 58/2016 और सेंट्रलाइजेशन का बुना गया जाल है। विशेषज्ञों के अनुसार, रेल के कई सौ करोड़ रुपये के एनुअल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट्स (#AMC) का सेंट्रलाइज्ड (केंद्रीकरण) होना और कुछ चुनिंदा वेंडरों के हाथों में जाना कहीं न कहीं ऑफिस ऑर्डर 58/2016 की विकृतियों का ही परिणाम है। ट्रेनों में लगातार बढ़ती आग की घटनाएं, महीनों ठेका मजदूरों को वेतन नहीं मिलना और उनका काम बंद कर देना तथा खर्च में बेतहाशा बढ़ोतरी—यह दर्शाते हैं कि इस केंद्रीकरण से देश और रेल को केवल नुकसान ही हाथ लगा है।
चौंकाने वाली बात यह है कि मैकेनिकल विभाग के एक शीर्ष अधिकारी (जीएम स्तर), जिन्हें हाल ही में रेलमंत्री द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसा से सम्मानित किया गया था, उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले रेलवे बोर्ड (सीआरबी) को एक आधिकारिक पत्र लिखकर इस नेक्सस को और मजबूत करने की अनुशंसा कर दी। यह एक पुराना प्रशासनिक खेल है, जिसके तहत एक विभाग के ऊपर और नीचे अपने ही विभाग के लोगों को बैठा दिया जाता है, ताकि पूरा सिस्टम बाईपास हो सके और जवाबदेही शून्य हो जाए। इसके कारण रेलवे का एएमसी खर्च अब हजारों करोड़ रुपये पार कर चुका है, जो ‘एम्पायर बिल्डिंग’ (विभागीय साम्राज्य विस्तार) का सबसे बड़ा उदाहरण है।
सरकार की कोर कार्यों से भटकाव को रोकने और ‘साइलो’ तोड़ने की कोशिश भी नाकाम रही है। जानकारों का कहना है कि आज मैकेनिकल विभाग शौचालय की साफ-सफाई और अनुरक्षण, कोच की सफाई से लेकर वंदे भारत और ईएमयू (#EMU) जैसी ट्रेनों की सोफिस्टिकेटेड इलेक्ट्रॉनिक्स तक का सारा काम अपने नियंत्रण में लेने की महत्वाकांक्षा रखता है। लेकिन अपने मूल काम (Core Operations) से वह पूरी तरह भटक चुका है। नतीजा यह है कि आज देश में केवल मालगाड़ियां ही नहीं, बल्कि यात्री गाड़ियों के भी रोज ‘पार्टिंग’ (डिब्बों का अलग होना) के मामले सामने आ रहे हैं।
सफाई के नाम पर ‘EnHM डायरेक्टोरेट’ का गठन किया गया, इसके लिए एडिशनल मेंबर का पद सृजित हुआ, और हजारों करोड़ का बजट आवंटित हुआ; लेकिन धरातल पर वास्तविक-भौतिक स्थिति यह है कि ट्रैक, प्लेटफॉर्म और रेल परिसरों की सफाई व्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में सुधरने के बजाय और बदतर हो गई है। वर्तमान में #EnHM को अपना अस्तित्व बचाने के लिए ऑपरेटिंग, कमर्शियल, मेडिकल और सिविल विभागों की बैसाखी की आवश्यकता पड़ रही है। ये सभी विभाग सफाई में लगे हैं मगर फिर भी भौतिक स्थिति जस की तस है, और मलाई मैकेनिकल विभाग चाट रहा है। जिस सरकार ने विभागवाद की दीवारें यानि ‘साइलो’ (Silos) तोड़ने की कोशिश की थी, नीतिगत लूपहोल्स का फायदा उठाकर इन रेल अधिकारियों ने साइलो तोड़ने के नाम पर अपने बड़े-बड़े व्यक्तिगत और विभागीय साम्राज्य खड़े करके उसी सरकार की भली नीयत पर पानी फेर दिया।
जानकारों का कहना है कि तकनीकी विफलताएं तो बहुतायत में हो ही रही हैं और यात्रियों की सुरक्षा भी भगवान भरोसे ही है, तथापि रेल सुरक्षा को लेकर #Railwhispers की उपरोक्त रिपोर्ट में जो कई चौंकाने वाले तकनीकी खुलासे किए गए हैं, उन पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता है। उनका कहना है कि ट्विन पाइप ब्रेकिंग तकनीक पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी आज पूरे देश में यह व्यवस्था ज्यादातर ‘बाईपास’ पड़ी है, जिसके कारण मालगाड़ियों की औसत गति में भारी गिरावट आई है।
उन्होंने कहा कि ब्रेक बाइंडिंग और हॉट एक्सेल की घटनाएँ देश के हर रेल मंडल और सेक्शन में रोज हो रही हैं। यदि रेलमंत्री जी निष्पक्ष आंकड़े निकलवाएँगे, तो पता चलेगा कि फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम (FDSS) के लगातार चालू होने के पीछे ब्रेक पैड में लगने वाली आग है। उन्होंने बताया कि पेट्रोलियम और ऑयल ले जाने वाले #POL वैगनों में ब्रेक बाइंडिंग और हॉट एक्सेल के कारण हमेशा बड़े विस्फोट का डर बना रहता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने विदाई वेला में उच्च अधिकारियों द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों पर एक बड़ा नैतिक और प्रशासनिक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। प्रश्न यह उठता है कि कोई भी अधिकारी जो सीआरबी (#CRB), मेंबर या जीएम (#GM) जैसे सर्वोच्च पद से रिटायर हो रहा हो, वह अपने कार्यकाल के अंतिम दिन किसी दूसरे विभाग या कैडर के पदों को समाप्त करने की अनुशंसा करते हुए आधिकारिक पत्र कैसे लिख सकता है?
क्या उसका यह कृत्य सीधे तौर पर दुर्भावना और नीयत में खोट को साबित नहीं करता? जाते-जाते इन उच्च अधिकारियों (PHODs सहित) द्वारा जल्दबाजी में टेंडर फाइनल करने, ट्रांसफर-पोस्टिंग के आदेश जारी करने की क्या मजबूरी है? रेलमंत्री को इस पर तत्काल संज्ञान लेते हुए एक सख्त पॉलिसी गाइडलाइन बनवानी चाहिए, जो सेवानिवृत्ति के आखिरी महीनों में अधिकारियों के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों को तर्कसंगत और सीमित कर सके।
अधिकारियों के ऐसे निर्णयों का राजनीतिक नुकसान सत्तारूढ़ दल को भुगतना पड़ता है, अतः नीतिगत सुधार की नितांत आवश्यकता है। नीतिगत निर्णयों और एम्पायर बिल्डिंग के इस खेल में बिजली (इलेक्ट्रिकल) विभाग के अधिकारी भी अपने हितसाधन के लिए उतने ही जिम्मेदार रहे हैं। लेकिन अंतिम नुकसान देश का, सरकार का और आम जनता का हो रहा है। राजधानी जैसे प्रीमियम कोचों का डिजाइन ऐसा है कि एक छोटी सी चिंगारी दावानल में बदल सकती है, जबकि पूरा ध्यान केवल चुनिंदा प्रीमियम ट्रेनों और कुछ विशेष वेंडरों को फायदा पहुंचाने पर है।
रेलवे बोर्ड में इन आत्मघाती निर्णयों पर कोई सवाल पूछने वाला नहीं है। चुनाव और सामान्य दिनों में यात्रियों की मांग के बावजूद जनरल (GS) कोचों की संख्या बढ़ाने के बजाय कम की गई, जिसका सीधा राजनीतिक नुकसान अंततः केंद्र में सत्ताधारी पार्टी को भुगतना पड़ता है। प्रश्न यह है कि आखिर रेल सुरक्षा और व्यवस्था कब तक भाग्य के भरोसे चलेगी? अगर समय रहते इन सेंट्रलाइज्ड टेंडरिंग और त्रुटिपूर्ण ट्रांसफर/पोस्टिंग और रोटेशन नीतियों की उच्च स्तरीय समीक्षा नहीं की गई, तो देश की जीवन रेखा कही जाने वाली भारतीय रेल एक बड़े संकट में फंस सकती है।

