व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार पर ‘कमीशनखोरी का गणित’

क्या ठेकेदार केवल इन नेताओं और अधिकारियों की तिजोरियां भरने और उनके घर बड़े करने के लिए काम कर रहे हैं? -प्रवीण उंबरकर

यदि इस ‘परसेंटेज वाली व्यवस्था’ को तुरंत नहीं बदला गया, तो देश का बुनियादी ढ़ांचा कभी भी मजबूत और सुरक्षित नहीं हो पाएगा!

यवतमाल (महाराष्ट्र) के ठेकेदार संगठन के अध्यक्ष प्रवीण उंबरकर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। मराठी भाषा में दिए गए इस भाषण में उन्होंने सरकारी निर्माण कार्यों में फैले भ्रष्टाचार की परतों को खोलते हुए “कमीशनखोरी का गणित” समझाया है। उन्होंने समाज और व्यवस्था (सिस्टम) में गहरे तक समा चुके भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार करते हुए ठेकेदारों की तुलना देश की सीमा पर तैनात सैनिकों से की है। इस वीडियो के आधार पर तैयार की गई विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट निम्नवत् है:

यवतमाल (महाराष्ट्र): सरकारी टेंडरों और निर्माण कार्यों में नेताओं और अधिकारियों की ‘कमीशनखोरी’ अब किसी से छुपी नहीं है, लेकिन हाल ही में यवतमाल जिला ठेकेदार संगठन के अध्यक्ष प्रवीण उंबरकर ने एक सार्वजनिक मंच से इस कड़वी सच्चाई को आंकड़ों के साथ उजागर किया है। उंबरकर ने बताया कि एक ठेकेदार को काम शुरू करने से लेकर भुगतान पाने तक, व्यवस्था के हर स्तर पर भारी-भरकम रिश्वत और टैक्स चुकाना पड़ता है, जिससे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सीधे तौर पर प्रभावित होती है।

प्रवीण उंबरकर द्वारा बताया गया ‘कमीशन’ का पूरा गणित:

सार्वजनिक मंच से बोलते हुए प्रवीण उंबरकर ने सिलसिलेवार ढंग से बताया कि ₹100 के काम में से किस तरह पैसे अलग-अलग जगह बंट जाते हैं:

  • विधायक/स्थानीय नेता का हिस्सा: कोई भी सरकारी काम (टेंडर) हासिल करने के लिए सबसे पहले 10% कमीशन स्थानीय विधायक या नेताओं को देना पड़ता है।
  • जीएसटी (GST): काम मिलने के बाद सरकार को 18% जीएसटी चुकाना होता है।
  • सिक्योरिटी डिपॉजिट/अन्य कटौतियां: टेंडर प्रक्रिया और तकनीकी नियमों के तहत 6% राशि की सीधी कटौती (कट) होती है।
  • अधिकारियों/साहब लोगों का खर्च: सरकारी दफ्तरों में बैठे इंजीनियर्स और बड़े अधिकारियों की जेब गर्म करने के लिए 10% रिश्वत देनी पड़ती है।
  • भुगतान (Payment) निकालने का खर्च: काम पूरा होने के बाद सरकारी खजाने से अपना ही बिल पास करवाने के लिए फिर से 5% कमीशन देना अनिवार्य है।
  • ठेकेदार का मुनाफा: ठेकेदार अपने लिए हर काम में न्यूनतम 8% का प्रॉफिट (मुनाफा) रखता है।

कमीशन/नुकसान का कुल योग: 10% (विधायक) + 18% (GST) + 6% (कट) + 10% (अधिकारी) + 5% (बिल पासिंग) + 8% (मुनाफा) = 57%

“केवल 43% में कैसे होगा गुणवत्तापूर्ण निर्माण?”

उंबरकर ने उपस्थित जनता और प्रशासन से बेहद तार्किक और गंभीर प्रश्न पूछते हुए कहा: “अगर 100 रुपये में से 57 रुपये केवल टैक्स, कमीशन, रिश्वत और मुनाफे में ही चले जाएंगे, तो जमीन पर सड़क या नाली का निर्माण केवल 34% से 43% राशि में ही संभव हो पाएगा। इतने कम बजट में कोई भी ठेकेदार गुणवत्तापूर्ण काम कैसे दे सकता है? इसके बाद यही विधायक और नेता चिल्लाते हैं कि सड़कें खराब बनी हैं, नालियां टूट गई हैं। नेताओं को अपनी ये नाटकबाजी बंद करनी चाहिए।”

वक्तव्य के सबसे भावुक और प्रभावी अंश में प्रवीण उंबरकर ने ठेकेदारों की तुलना सीमा पर खड़े जवानों से की। उन्होंने कहा कि जिस तरह एक सैनिक देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर लड़ता है, ठीक उसी तरह एक ठेकेदार देश के विकास और बुनियादी ढ़ांचे (#Infrastructure) के निर्माण के लिए दिन-रात काम करता है।

उन्होंने तीखे लहजे में कहा: “हम ठेकेदार देश के लिए सड़कें बनाते हैं, बांध बनाते हैं, पुल और इमारतें खड़ी करते हैं, ताकि सर्वसामान्य जनता को सुविधाएं मिल सकें। हम समाज और देश के निर्माण में पूरी निष्ठा से अपना योगदान दे रहे हैं। लेकिन इस भ्रष्ट व्यवस्था ने हमारी स्थिति ऐसी कर दी है कि ठेकेदारों के लिए अपना काम करना अत्यंत कठिन हो गया है। उन्होंने मंच से जोर देकर कहा कि क्या हम ठेकेदार केवल इन नेताओं और अधिकारियों की तिजोरियां भरने और उनके घर बड़े करने के लिए काम कर रहे हैं?”

प्रवीण उंबरकर का यह वायरल वीडियो केवल एक व्यक्ति का आक्रोश नहीं है, बल्कि यह वर्तमान प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था में फैले संस्थागत भ्रष्टाचार (Institutional Corruption) का एक पुख्ता और जीवंत प्रमाण है। यह वीडियो साफ तौर पर दर्शाता है कि:

  1. गुणवत्ता से समझौता: जब आधे से अधिक पैसा काम शुरू होने से पहले ही रिश्वत में चला जाता है, तो निर्माण कार्यों में घटिया सामग्री का उपयोग होना तय है, जिससे जनता के जान-माल को खतरा पैदा होता है।
  2. जनता के पैसे की लूट: टैक्सपेयर्स की गाढ़ी कमाई का पैसा विकास कार्यों में लगने के बजाय भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की जेबों में जा रहा है।
  3. ईमानदार व्यापार का अंत: इस तरह की दमघोंटू व्यवस्था के कारण ईमानदार ठेकेदारों के लिए बाजार में टिके रहना असंभव होता जा रहा है।

यवतमाल जिला ठेकेदार संगठन के अध्यक्ष प्रवीण उंबरकर का यह बयान शासन, प्रशासन और भ्रष्टाचार विरोधी विभागों (#ACB) और जांच एजेंसियों के लिए एक खुली चेतावनी है कि यदि इस ‘परसेंटेज वाली व्यवस्था’ को तुरंत नहीं बदला गया, तो देश का बुनियादी ढ़ांचा कभी भी मजबूत और सुरक्षित नहीं हो पाएगा।