Railway: “Rules of the game cannot be changed after the game has started”
सेंट्रल रेलवे AME/AWM चयन: विसंगतिपूर्ण वरिष्ठता से लेकर बोर्ड के आदेश तक—पैनल रिवीजन की ओर बढ़ता प्रशासनिक संकट!
सेंट्रल रेलवे AME/AWM चयन: वरिष्ठता निर्धारण और पात्रता मानदंडों में गंभीर विसंगतियाँ! नियमों की अनदेखी! बार-बार बदलती वरिष्ठता सूची और नीतिगत अस्थिरता!
अधिकृत आदेशों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी के आधार पर, सेंट्रल रेलवे में मैकेनिकल विभाग के अंतर्गत ग्रुप ‘बी’ (AME/AWM) के 70% चयन कोटा (वेकेंसी साइकिल 01.01.2025 – 31.12.2026) में प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर कई गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं। दस्तावेजों का गहन अध्ययन करने पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं:
पात्रता मानदंडों का उल्लंघन
नोटिफिकेशन (दिनांक 13.11.2024) के बिंदु संख्या 2 के अनुसार, उम्मीदवारों के पास 01.01.2025 तक पे-लेवल 6 या उससे ऊपर में 3 साल की नियमित (Non-fortuitous) सेवा होनी अनिवार्य थी।
- अवलोकन: इंटीग्रेटेड सीनियरटी लिस्ट (18.07.2025) में कई ऐसे नाम शामिल हैं जो इस शर्त को पूरा नहीं करते दिखते। उदाहरण के लिए—
- प्रदीपकुमार यादव (क्र. 224): इनकी पदोन्नति/ग्रेड में प्रवेश 18.11.2021 दिखाया गया है। 01.01.2025 तक इनकी सेवा 3 साल से कम है।
- कुलकर्णी अक्षय अविनाश (क्र. 227): इनकी पदोन्नति 07.03.2022 की है, जो स्पष्ट रूप से पात्रता तिथि (01.01.2025) से काफी बाद की है।
- त्रुटि: यदि इन उम्मीदवारों को मुख्य सूची या साक्षात्कार के लिए चुना गया है, तो यह सीधे तौर पर नोटिफिकेशन के प्रावधानों का उल्लंघन है।
वरिष्ठता सूची में बार-बार बदलाव
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, सीनियरटी लिस्ट में सेंट्रल रेलवे द्वारा कम से कम चार बार महत्वपूर्ण बदलाव किए गए:
- प्रथम सूची (18.07.2025): प्रोविजनल लिस्ट जारी की गई।
- द्वितीय सूची (12.08.2025): आपत्तियों के बाद संशोधित सूची। इसमें चीफ लोको इंस्पेक्टर (#CLI) को ‘रनिंग स्टाफ’ मानकर सीनियरटी तय की गई।
- तृतीय सूची (17.09.2025): रेलवे बोर्ड के नए निर्देशों के बाद फिर से बदलाव।
- चतुर्थ बदलाव (18.09.2025 – Corrigendum): एक और शुद्धिपत्र जारी किया गया (जैसे रुस्तम सिंह के मामले में पदोन्नति की तारीख में सुधार)।
लाभ और हानि
- रनिंग स्टाफ (CLI/LP): जब ग्रेड 5500 (लेवल 6) को लेवल 7 के बराबर माना गया, तो भारी संख्या में रनिंग स्टाफ सीनियरटी में ऊपर आ गया।
- स्टेशनरी स्टाफ (SSE/JE): बार-बार नीति बदलने से स्टेशनरी कैडर (जैसे SSE) के कर्मचारी ‘जोन ऑफ कंसीडरेशन’ से बाहर हो गए, जिससे उनके करियर की प्रगति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
नीतिगत बदलाव और कानूनी पेचदगियां
चयन प्रक्रिया के दौरान रेलवे बोर्ड ने पात्रता और सीनियरटी के मानदंडों में बदलाव किए, जो प्रशासनिक कानून के “Rules of the game cannot be changed after the game has started” सिद्धांत के विपरीत है।
- असंगति: 12.09.2025 को रेलवे बोर्ड द्वारा जारी पत्र (दस्तावेज में संदर्भित) ने ऐन वक्त पर समीकरण बदल दिए। इससे पहले 2015 के पत्रों का हवाला देकर सीनियरटी तय की जा रही थी।
- परिणाम: इन नीतिगत बदलावों और एकरूपता की कमी के कारण रेलवे को विभिन्न न्यायाधिकरणों (#CAT) और उच्च न्यायालयों में मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। कर्मचारियों में इस बात को लेकर गहरा असंतोष है कि सीनियरटी को ‘तदर्थ’ (Ad-hoc) नीतियों के आधार पर बार-बार बदला गया।
नियमों की अनदेखी और अस्थिर नीतियों के बीच ग्रुप ‘बी’ चयन
सेंट्रल रेलवे की AME/AWM चयन प्रक्रिया प्रशासनिक अदूरदर्शिता का ज्वलंत उदाहरण बनती जा रही है। नोटिफिकेशन में स्पष्ट रूप से 3 साल की सेवा की शर्त (कट-ऑफ 01.01.2025) होने के बावजूद, सीनियरटी लिस्ट में ऐसे उम्मीदवारों का नाम होना—जिनकी पात्रता अवधि पूरी नहीं है—प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
सबसे विवादास्पद मुद्दा सीएलआई और रनिंग स्टाफ की सीनियरटी का रहा है। प्रशासन ने कभी इन्हें स्टेशनरी स्टाफ के समकक्ष माना, तो कभी रनिंग स्टाफ के लाभ दिए। जुलाई 2025 से सितंबर 2025 के बीच मात्र दो महीनों में चार बार सीनियरटी लिस्ट बदलना यह दर्शाता है कि रेलवे बोर्ड के पास इस कैडर के लिए कोई स्थिर नीति नहीं है। अंतिम समय (18.09.25) तक शुद्धिपत्र जारी करना और 19.09.2025 को नई लिस्ट निकालकर 28.09.2025 को साक्षात्कार आयोजित करना, उम्मीदवारों को तैयारी और आपत्ति दर्ज करने का पर्याप्त समय नहीं देता।
यह ‘नीतिगत अस्थिरता’ न केवल योग्य उम्मीदवारों का नुकसान कर रही है, उनका करियर चौपट कर रही है, बल्कि भविष्य में पूरी चयन प्रक्रिया को अदालती कार्यवाही के कारण रद्द होने के जोखिम में डाल रही है। सेंट्रल रेलवे को चाहिए कि वह नोटिफिकेशन के मूल सिद्धांतों (दिनांक 13.11.2024) और एक पारदर्शी एकीकृत नीति का पालन करे, ताकि विवादों को कम किया जा सके।
रेलवे बोर्ड का आदेश 09.04.2026: आधे-अधूरे कार्यान्वित पैनलों के पुनरीक्षण की अनिवार्यता
रेलवे बोर्ड द्वारा 09.04.2026 को जारी आदेश—जो संभवतः वरिष्ठता और पात्रता मानदंडों, विशेषकर सीएलआई और स्टेशनरी स्टाफ के विवादों पर आधारित है—की व्याख्या और “आधे-अधूरे कार्यान्वित (Partially Implemented)” पैनलों पर इसके प्रभाव का विश्लेषण:
प्रशासनिक सिद्धांत: ‘पैनल’ बनाम ‘नियुक्ति’
रेलवे कानून और सेवा नियमों (Establishment Rules) के अनुसार, केवल पैनल में नाम आ जाने से किसी कर्मचारी को पदोन्नति का अधिकार (#VestedRight) नहीं मिल जाता। जब तक नियुक्ति (#Appointment) का आदेश जारी न हो और कर्मचारी पदभार ग्रहण न कर ले, तब तक पैनल एक ‘प्रस्ताव’ मात्र है।
9 अप्रैल 2026 के आदेश का निहितार्थ
यदि रेलवे बोर्ड का नया आदेश पिछली विसंगतियों—जैसे वरिष्ठता गणना में त्रुटि—को सुधारने के लिए जारी किया गया है, तो इसके दो मुख्य प्रभाव होते हैं:
- पूर्णतः कार्यान्वित पैनल (Fully Implemented): जिन लोगों ने जॉइन कर लिया है, उनकी वरिष्ठता को आमतौर पर ‘सेविंग क्लॉज’ के तहत सुरक्षित रखा जाता है, जब तक कि कोर्ट ने विशेष रूप से उन्हें हटाने का आदेश न दिया हो।
- आधे-अधूरे कार्यान्वित पैनल (Partially Implemented): यदि पैनल के आधार पर कुछ नियुक्तियां बाकी हैं, तो 9 अप्रैल का आदेश एक “Checkpost” की तरह काम करेगा। प्रशासन उन शेष नामों को तब तक आगे नहीं बढ़ा सकता जब तक यह सुनिश्चित न हो जाए कि वे नए आदेश (09.04.2026) की कसौटी पर खरे उतरते हैं।
क्या पैनल रिवाइज किया जाना चाहिए?
जी हाँ, निश्चित रूप से पैनल रिवाइज किया जाना चाहिए। जानकारों की यह धारणा काफी हद तक सही है कि आधे-अधूरे पैनलों को रिवाइज—या कम से कम रिव्यू—किया जाना अनिवार्य हो जाता है। इसके पुख्ता कारण हैं:
- अनुच्छेद 14 का उल्लंघन (Article 14 – Equality): यदि एक ही चयन प्रक्रिया (Selection Cycle) में आधे लोगों को पुराने (गलत) नियमों से पदोन्नति मिले और शेष को नए नियमों का लाभ न मिले—या नुकसान हो—तो यह “समानता के अधिकार” का हनन है। इससे भविष्य में और भी ज्यादा कोर्ट केस होंगे।
- निरंतरता का सिद्धांत (Principle of Continuity): चयन प्रक्रिया एक “सतत प्रक्रिया” है। जब तक अंतिम व्यक्ति नियुक्त नहीं होता, प्रक्रिया ‘पूर्ण’ नहीं मानी जाती। यदि बीच में नीति बदलती है—खासकर यदि वह नीति सुधारात्मक/करेक्टिव है—तो वह शेष बचे हुए पैनल पर लागू होगी।
- कानूनी पेचीदगी (Legal Liability): यदि 9 अप्रैल का आदेश रेलवे बोर्ड ने किसी कोर्ट के फैसले (जैसे कैट या हाईकोर्ट) के अनुपालन में जारी किया है, तो प्रशासन ‘गलत’ पैनल को आगे बढ़ाकर “कोर्ट की अवमानना” का जोखिम नहीं उठाएगा।
विशेषज्ञों की पुख्ता राय
उपरोक्त वस्तुस्थिति और उपलब्ध आदेशों के आधार पर विशेषज्ञों की पुख्ता राय यह है कि—
- रिवीजन अपरिहार्य है: 9 अप्रैल 2026 के आदेश के बाद, वे सभी पैनल जो पूरी तरह से क्लोज (Closed) नहीं हुए हैं, उन्हें “अस्थाई स्थगन (#Abeyance)” में रखा जाना चाहिए। प्रशासन को नए आदेश के आलोक में वरिष्ठता सूची (#SeniorityList) का मिलान करना होगा।
- दोषपूर्ण चयन का सुधार: यदि सेंट्रल रेलवे के AME/AWM चयन में 3 साल की सेवा की शर्त (01.01.2025 वाली) का उल्लंघन हुआ है, और 9 अप्रैल का आदेश इसी तरह की विसंगतियों को ठीक करता है, तो “आधे-अधूरे” पैनल को रिवाइज करना केवल विकल्प नहीं, बल्कि प्रशासन की कानूनी बाध्यता है।
- अगला कदम: यदि प्रशासन इस स्पष्टता की कमी का लाभ उठाकर पुराने पैनल को ही चुपचाप लागू करने की कोशिश करता है, तो प्रभावित उम्मीदवारों को तुरंत इस आदेश (09.04.2026) का हवाला देते हुए “अभ्यावेदन” (Representation) देना चाहिए और स्पष्टीकरण मांगना चाहिए।
निष्कर्ष: 9 अप्रैल 2026 का आदेश यदि मौन है, तो स्व-विवेक के अनुसार इसका अर्थ “यथास्थिति” बनाए रखना नहीं, बल्कि “सुधार की आवश्यकता” है। आधे-अधूरे पैनल को उसी रूप में लागू करना प्रशासनिक रूप से ‘आत्मघाती’ साबित होगा, क्योंकि वह कानूनी रूप से टिक नहीं पाएगा। उसे रिवाइज (Recast) करना ही प्रशासन के लिए सबसे सुरक्षित और न्यायसंगत रास्ता है।

