दक्षता का संकट: ट्रैफिक सर्विस के लिए स्वयं को साबित करने का अवसर, भाग-2
हमारे 13 अप्रैल के लेख, “Crisis of Competency: Time for Traffic Service to Redeem Itself” पर बहुत सारी प्रतिक्रियाएँ आईं।
कई कांट्रेक्टर ने भी ये साझा किया कि उन्हें कैसे पहले तो L-1 बनकर कांट्रैक्ट लेना होता है, फिर काम कब होगा—इसकी अनिश्चितता बनी रहती है। उनका ये स्पष्ट कहना है कि यदि ब्लॉक देने में अनिश्चितता खत्म हो जाए, तो पूरे देश में काम की क्वालिटी में बहुत सुधार होगा। ऐसा ही कई अधिकारियों ने कहा—एक TRD के अधिकारी ने ये कहा कि S&T से ज्यादा उन्हें इसकी परेशानी होती है—स्मरण रहे कि हमने अपने लेख में इंजीनियरिंग और S&T का उल्लेख किया था।
वहीं ट्रैफिक विभाग के कुछ अधिकारी इस आर्टिकल से नाराज लगे। लेकिन उनके मैसेज में ये झलका कि वे ये मानते हैं कि केवल वही रेल के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए चिंतित हैं, और कोई नहीं। इसी मानसिकता को हमने ठीक नहीं माना है। सभी विभागों का औचित्य है और सबका अपना काम है—यदि ट्रैफिक की यही बात मान ली जाए कि केवल वे ही रेल के “ब्रेड विनर” (कमाऊ पूत) हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किस पर जाएगी कि सभी कमोडिटी का रेल कोएफिशिएंट (मार्केट शेयर) गिरता जा रहा है? यदि बल्क कमोडिटी निकाल दें, तो कौन सा ट्रैफिक ये ब्रेड विनर वापस ला पाए हैं? कौन से और कितने लोको, कोच, वैगन की खरीद की फाइल ट्रैफिक के बिना निकलती है? एक इंच लाइन नहीं डल सकती ट्रैफिक की मर्जी के बिना। यदि इतना पॉवर एंजॉय करना है, तो जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
इंजीनियरिंग विभागों में बड़ी समस्याएं हैं, लेकिन पूरी रेल, ब्रिज, ओएचई और सिग्नल की व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी वे अपने कंधों पर उठाते हैं, वे कभी बचकाने बहाने नहीं बनाते—यदि पॉवर ली है, तो जिम्मेदारी का बोझ भी उठाते हैं—किसी सिविल इंजीनियर को फील्ड में (धूप में) जाने से ना-नुकुर करते हमने नहीं देखा।
ट्रैफिक का कंट्रोल ऑफिस आज बड़ी समस्या बन चुका है—न इससे ट्रेन चल पा रही है, न ही इससे ब्लॉक दिए जा रहे हैं। परेशानी ये है कि यह ट्रैफिक कंट्रोलर का कैडर एक “साइलो” बन गया है, जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है। रेल यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने—जो AI में काम कर चुका है—का मानना है कि सेक्शन कंट्रोल अब कंप्यूटर के हाथ में होना चाहिए। जब भी मालगाड़ी लोड होती है, उसका गंतव्य #FOIS में दर्ज हो जाता है, कंप्यूटर द्वारा सबसे छोटे, सबसे कम समय वाले मार्ग का चुनाव कंप्यूटर आसानी से कर सकता है। रोलिंग ब्लॉक प्रोग्राम का डेटा लेकर, ये सीधा निर्णय है, कि आज या आने वाले हफ्ते में मालगाड़ी कैसे चलाई जाए। आज ऑपरेटिंग का अंध-मैनेजमेंट इतना नियंत्रण के बाहर है कि कोई भी मालगाड़ी को बुक करने वाला यह नहीं जानता कि उसका माल कब पहुँचेगा! जब ट्रक से भेजने का समान दिल्ली से बुक होता है, तो ये प्लान होता है कि कौन सा मार्ग सस्ता और तेज गति वाला होगा। मालगाड़ियों की 10 किमी प्रति घंटे से कम की गति इसीलिए है कि गाड़ी कई-कई दिन खड़ी रहती है माल के साथ। तब कहाँ चली जाती है ब्रेड विनर की मानसिकता?
मंत्री जी, सबसे बड़ा रिफॉर्म “रेल वन” ऐप नहीं, कंट्रोल ऑफिस को कंप्यूटर से चलाना ही सबसे बड़ा रिफॉर्म होगा। आपको कंट्रोल ऑफिस ऑटोमेशन का ज्ञान दिया जाएगा, लेकिन आप इनसे ये पूछिये कि क्यों बड़े-बड़े मठाधीश उर्फ #PCOM ये नहीं बता सकते कि कोई मालगाड़ी कितने हफ्तों में क से ख स्टेशन पहुंचेगी! हमने एक पुराने अधिकारी से बेबाक बातचीत की। उनसे कंट्रोलर की सारी गतिविधियाँ लीं, और उसका AI द्वारा विश्लेषण किया। तो यह स्पष्ट हुआ कि छोटे जोन और डिवीजन से इंटरचेंज की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। पूरा ट्रैफिक कैडर केवल गाली-गलौज पर चल रहा है—कई नॉन-ट्रैफिक कैडर के वरिष्ठ अधिकारी और ट्रैफिक के जूनियर अधिकारी और सुपरवाइजरों का भी यही कहना है। एक पुराने ट्रैफिक सुपरवाइजर ने बताया कि इंजीनियरिंग विभागों के अधिकारी इतना प्रेशर लेते हुए भी अमूमन गाली-गलौज नहीं करते, लेकिन वहीं बिना चीखे-चिल्लाए ट्रैफिक में कुछ नहीं हो पाता।
उनका ये भी कहना था कि जब आपका नेटवर्क बना है, अनुरक्षण भी निश्चित है, तो क्यों न सेक्शन कंट्रोल कंप्यूटर को पूरी तरह सौंप दिया जाए। इनका ये भी कहना था—हमने इसका उल्लेख इस लेख के पहले भाग में भी किया था—कि कैसे सभी विभागों ने कंप्यूटर टेक्नीक का पूरा प्रयोग किया है और ट्रैफिक #FOIS को लेकर दशकों से बैठा है। उन्होंने ही हमें बताया था कि कैसे मुंबई सबअर्बन में अधुनीत ट्रेन डिस्पैच प्रणाली को ट्रैफिक ने चलने नहीं दिया और उसको केवल पैसेंजर इनफॉर्मेशन सिस्टम तक समेट दिया, जबकि इसी सिस्टम पर यूरोप के कई रेल नेटवर्क सफलतापूर्वक चलते हैं। इस बात का हमारे तथाकथित “ब्रेड विनर” क्या जवाब देंगे?
आज रेल यातायात छोटे-छोटे लोडरों के हाथ में है। कच्चा माल, सीमेंट, कोयला इत्यादि को ढ़ोने में रेल के ट्रैफिक विभाग का बहुत कम योगदान है—ये पूरा काम लोडर करवाते हैं, क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। ट्रैफिक को गेटकीपर की भूमिका निभानी है, लेकिन इस सर्विस के दंभ और अहंकार के चलते रेल का लोडिंग शेयर हास्यास्पद रूप से गिरता जा रहा है। पहले इस बात का फायदा मिल जाता था कि बिजलीघर का कोयला दूर से आता था, केंद्र सरकार ने इस दूरी को बहुत कम कर दिया। रेल के इन नौनिहालों के पास इसका कोई उत्तर नहीं था, क्योंकि सोचने की जरूरत होती तो रोज कंट्रोल ऑफिसों में मच्छी बाजार की तरह छीना-झपटी और लड़ाई-झगड़ा नहीं होता।
लेकिन ट्रैफिक विभाग यह बहुत अच्छे से जानता है कि यदि सही मायने में कंप्यूटरीकरण हो गया, तो किसे रेक देनी है या किसकी मालगाड़ी को साइड में खड़ा करना है, या किस गाड़ी को आगे चलाना है—यह मनमर्जी नहीं हो पाएगी। वहीं सारे इंजीनियरिंग विभाग हाथ जोड़कर तब ट्रैफिक के सामने भी नहीं खड़े होंगे। आज के समय में सामंतवादी सोच, अहंकार से रेल जैसी व्यापक परिवहन सेवा देने वाली संस्था नहीं चल सकती!

