हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे !!!
कौन हैं वो लोग जो रोटेशन नहीं होने देते? कौन हैं जो इन्हें आश्रय और समर्थन दे रहे हैं?
जीरो टॉलरेंस का झुनझुना तो अब बजाना बंद ही कर दिया जाना चाहिए!
रेल के विजिलेंस विभाग पर भी ताला लगा दिया जाना चाहिए, जब पकड़ना सीबीआई को ही है, तो रेल ने क्यों ये पनौती पाली हुई है?
आदरणीय शरद जोशी की ये उक्ति खान मार्केट गैंग (#KMG) और ऑल इंडिया डेल्ही सर्विस (#AIDS) का सटीक चित्रण करती है। चाहे #ECR का कंस्ट्रक्शन हो, उसका एकाउंट्स हो, या #WR का पर्सनल डिपार्टमेंट हो, या #CR का ट्रैफिक या इलेक्ट्रिकल हो, या रेल भवन में भरे—कादर खान के अमर शब्दों से प्रेरित—भ्रष्टाचार की मिट्टी में पनपे हुए पाप के पौधे—संरक्षण यहाँ सबको है। यहाँ तक कि जिन्होंने चौड़े में वंदे भारत ट्रेन की डिजाइन टीम पर विजिलेंस केसों की मन भर ईंटें रख दी थीं, वह भी समृद्धि के नए-नए शिखर छू रहे हैं। और तो और, एक दुर्जन, जो अभी भी नौकरी में हैं, रेलमंत्री जी के ही पुराने एक मंत्रालय में वट वृक्ष बन गए हैं, और आगे ये रेल में क्या रेल का काम नहीं करेंगे, क्या फर्क पड़ता है कि किस काम के लिए इनकी भर्ती हुई थी।
जहाँ एक ओर त्रिमूर्ति के ये महानुभाव हैं, वहीं दूसरे इनके सीनियर उसी रेलवे बोर्ड में उसी पद पर रहकर अपनी बोर्ड की पोस्टिंग में दौड़ा दिए गए थे, ये होता है नेक्सस का जलवा! यदि ये भी उगाही तंत्र के भाग बन जाते तो क्या ही बात होती।
राष्ट्रीय बेइज्जती
“कौन हैं BSNL के डायरेक्टर विवेक बंजल, जिन्होंने प्रयागराज दौरे के लिए मांगे थे ‘शाही इंतजाम’? अंडरवियर की भी थी डिमांड” – इस खबर ने पूरे देश में पब्लिक सर्वेंट्स अर्थात सरकारी नौकरों का पानी उतार दिया था।

खैर, ये कोई नई बात नहीं, नया तो इसका बेशर्मी से खुले में प्रबंधन था। उससे भी बड़ी बात, कि जो सरकार 360 डिग्री रिव्यू के नाम पर सैकड़ों अधिकारियों को बाईपास कर देती है, तो उससे ऐसी गलती कैसे हुई? आम नागरिकों की आई प्रतिक्रिया के चलते इस अधिकारी का दौरा तो रद्द कर दिया गया, लेकिन “ये साहब आज भी नौकरी में हैं!” ऐसा प्रोटोकॉल एक दिन में नहीं बनता है। ये एक विशिष्ट कार्य संस्कृति को दर्शाता है। इसी के चलते जब भारत में टेलीकॉम में निजीकरण और निगमीकरण हुआ, तो आम जानता ने उसका समर्थन किया।
हाल ही में #CBI द्वारा धरे गए जो मध्य रेल के एक #HOD इसी कार्य संस्कृति के मंजे खिलाड़ी माने गए थे। उनका सेवा भाव सभी को भाता था। साहब के घर हुई पूजा में प्रबंध के साथ, सोने के सिक्के, चाँदी की मूर्ति रखवा दी गई, तो क्यों नहीं मेमसाहब—साहब के पीछे पड़ जाएंगी कि क्या नायाब पालतू अधिकारी है आपका पट्ठा! साहब के कुत्ते को कौन सा खाना पसंद है, बेबी को कौन सा आईपैड चाहिए, भैया को कौन सा गेमिंग कंसोल चाहिए—बस इतना ही तो पता करना है—और कितना खर्च हुआ? आईपैड, या आईफोन दो लाख तक एक्सेसरीज के साथ आ जाएगा, गेम कंसोल भी इससे ज्यादा कुछ नहीं, सोना तो खैर अभी महंगा हुआ है—पहले तो किलो भर पचास लाख के अंदर आ जाता था। बस इतना ही तो चाहिए। ‘मैनेजमेंट’ बस इतना ही है, बाकी सब तो किसी काम का नहीं। आज जिस भाव से स्टेशन डेवलपमेंट के काम हो रहे हैं, जैसा पैसा हर विभाग को मिल रहा है, उसका 1-2 प्रतिशत ही पाकिस्तान जैसे देश को सालों खिला सकता है। और न भूलें, जो पकड़े गए हैं, वो पूरी व्यवस्था का मात्र छटाँक भर ही हैं।
कौन हैं वो लोग?
कौन हैं वो लोग जो रोटेशन नहीं होने देते? क्या ये किसी को नहीं दिख रहा कि चाहे #DDU का #CLI सेलेक्शन हो, या बड़ौदा मंडल का औद्योगिक स्तर का विभागीय पदोन्नति भ्रष्टाचार कांड, मध्य रेल का ट्रैफिक कांड—जो चुनिंदा लोगों को पूरा जीवन एक ही शहर में रखने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। प्रश्न ये है कि ये #PHOD कैसे डिवीजन से पोस्ट लेकर अपने आदमी की गैर जरूरी पोस्टिंग कर सकते हैं? उन्हें क्या लाभ मिला? और ये सब करने के बाद भी ये रेल भवन में जगह पा जाते हैं? कौन है जो इस सिंडिकेट का ईंधन है? यही सवाल उस अधिकारी पर उठा, जिसने बड़ौदा मंडल में औद्योगिक स्तर के पदोन्नति भ्रष्टाचार कांड को अपनी छत्रछाया में पनपने दिया और लौटकर रेलवे बोर्ड में स्थान पा गया, और अब बड़ौदा हाउस में PHOD बन गया! कौन हैं जो इन्हें आश्रय और समर्थन दे रहे हैं? झूठे केसेस में उलझाए लोगों के करियर पर इनकी काली छाया पड़ जाती है, लेकिन त्रिमूर्ति और ऐसे भ्रष्टाचार के प्रणेता हमेशा समर्थन पाते हैं।
जो वेंडर अधिकारियों और कर्मचारियों को ब्लैकमेल करते हैं, उनका कोई कुछ नहीं कर पाता, और कुछ वेंडर हो गए काम के लिए भी पैसे देते पकड़े जाते हैं। इसी कारण से मध्य रेल का कांड हुआ!
आज कम से कम अधिकतर महाप्रबंधक अपने वार्षिक इंस्पेक्शन को पूरी तरह से प्रोफेशनल रख रहे हैं, नहीं तो पहले तो ऐश और ऐयाशी का माध्यम थे ये इंस्पेक्शन। महिला कल्याण संगठन मेमसाहब के कल्याण के लिए है और रहेगा, जब तक इस पर सर्जिकल स्ट्राइक न हो। तीज पर कपड़े, जेवर और मैडम के तेवर, उफ्फ, क्या राजसी ठाठ हैं—ये विवेक बँजल के प्रयागराज के इंतजाम से कहीं उन्नीस नहीं। डीआरएम मैडम, जीएम मैडम, जिस ठाठ का प्रदर्शन करती हैं, ऐसा लगता है कि पूरी भारतीय रेल मायके से दहेज में लाई हैं।
मुंबई खासकर इसके लिए बदनाम है! सभी अधिकारी पुश्तैनी मकान की तरह सरकारी मकानों पर काबिज हैं—जलवे किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं, मगर ये दिखते उनके पासंग बराबर भी नहीं। रेल की नौकरी अब जमींदारों की तरह इन सरकारी नौकरों की ऐशगाह बन गई है। जिस तरह से #RVNL ने अधिकारियों, सुपरवाइजरों, उनके घर-परिवारों, ससुरालों, मायकों में आदमी और गाड़ियाँ मुहैय्या करवाने की परिपाटी बनवाई, वह कोई भूला नहीं है।
जीरो टॉलरेंस का झुनझुना
इसे तो अब बजाना बंद ही कर दिया जाना चाहिए। और रेल के विजिलेंस विभाग पर भी ताला लगा दिया जाना चाहिए। जब पकड़ना सीबीआई को ही है, तो रेल ने क्यों ये पनौती पाली हुई है? हिम्मत है तो उन लेवल-15 के सभी अधिकारियों पर सर्जिकल स्ट्राइक हो, जो #रोटेशन का मजाक बनाए हुए हैं। जो बिना किसी काम के जोनल हेड क्वार्टर में और रेल भवन में सैकड़ों परजीवी अधिकारी पाले हुए हैं, जो चवन्नी के लिए भी महंगे हैं। है हिम्मत? तो निकाल फेंकिए #AIDS और #KMG को!
लेकिन ये होगा कैसे, जब मंत्री जी के #EDPG की मेमसाहब और बेबी की अमृतसर में खातिरदारी ठीक-ठाक न होने के कारण मंडल के चार-पांच वरिष्ठ अधिकारी दिल्ली तलब किए जा सकते हैं, तो किस मुँह से जीरो टॉलरेंस की बात की जा सकती है? ये रेलमंत्री के ठीक नीचे उनके एक अधीनस्थ अधिकारी का जलवा है, बाकियों का क्या हाल होगा? हमने कई नकारों के बारे में लिखा, जो दिल्ली के बाहर जाने वाले सारे आदेश बदलवाकर और चौड़े होकर रेल भवन में डटे हुए हैं। क्या चेयरमैन-ऑन-कॉन्ट्रैक्ट और मंत्री जी को यह सब नहीं दिख रहा?


