टॉयलेट अपग्रेडेशन: मंत्री और सीआरबी प्रकोष्ठ कठघरे में!

14 मार्च को एक्स पर प्रकाशित #Toilet-Upgradation पर #Railwhispers का ये थ्रेड देखें-

फिर कल 15 मार्च 2026 को प्रकाशित यह आर्टिकल, “हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे !!!” भी एक बार पुनः पढ़ें!

टॉयलेट अपग्रेडेशन के उपरोक्त विस्तृत थ्रेड की यदि टाइम लाइन देखें, तो पाएंगे कि जिन अधिकारियों ने इस ‘स्कैम’ को अंजाम दिया था, वे सब वर्तमान सीआरबी के बहुत करीबी रहे हैं, और यह काम कर इन्होंने #CRB-सेल में बैठकर पूरी भारतीय रेल को हाँका। बात केवल इतनी ही नहीं कि इतने बड़े फैसले—जो जनता की गाढ़ी कमाई की बदौलत हैं—उस पर निर्णय कैसे लिया गया—यही आज भारतीय रेल के ‘मैनेजमेंट’ का दर्पण बन गया है।

यहाँ यह न भूला जाए कि कैसे ‘पॉवर कार पालिसी’ को तोड़-मरोड़कर इसी मंडली ने आज उसी काम को कई गुना अधिक महंगा कर दिया है, और जमीनी स्तर पर यह काम आज भी वैसे ही हो रहा है, बल्कि उससे बदतर स्थिति में हो रहा है। किसी भी जोनल रेलवे के टेंडर मंगाकर देख लिया जाए—क्यों वही काम—वैसे ही—अधिक महंगा क्योंकर किया जा रहा है? यह जो अधिक रेट पर वही और वैसा ही काम करने के निर्णय से जो अधिक पेमेंट हो रहा है, वह किसकी जेब से जा रहा है? जिस ईंधन की बात 15 मार्च 2026 के आर्टिकल—हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे !!!—में की गई थी, ये वही ईंधन है।

इसी ईंधन से बड़ी कार्टेल बनी हैं रेलवे में, और उन कार्टेल का प्रोटेक्शन, #रोटेशन न कर एक माफिया सुनिश्चित करता है। इसका सुपर प्रोटेक्शन रेल का विजिलेंस करता है। मजाल है कि आप आरटीआई में कुछ निकाल पाएँ। जिस कथित इमोशनल इंटेलिजेंस टेस्ट ने रेल के सभी वरिष्ठ अधिकारियों का मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल विदेशी सर्वर में रखवा दिया, उस सिंगल टेंडर के कोई भी डिटेल न सरकार की नीति के तहत वेबसाइट पर डाले गए, न ही आरटीआई में दिए गए। ये न भूलें, कि जैसा टॉयलेट अपग्रेडेशन का निर्णय रहा, पॉवर कार पालिसी का भी वैसा ही था, वैसी ही बकैती—मंत्री और सीआरबी सेल में बैठे अधिकारी—जो बाद में मंत्री जी के एडवाइजर बन गए—ने निर्भीक होकर की।

टॉयलेट अपग्रेडेशन भी इसी ‘पालिसी करप्शन’ का ही एक नया संस्करण मात्र है, इससे पहले पॉवर कार आदि—ये सब करने वाले रेल भवन में बैठकर उल्टे-सीधे निर्णय लेते रहे और रेल मंत्रालय, रिफार्म की अफीम चाटकर मदमस्त हाथी की तरह झूमता रहा और इन अधिकारियों को पालता रहा।

इसे देखिए

इसकी चर्चा हमने, 15 मार्च 2026–“हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे !!!—के आर्टिकल में की है। अब प्रश्न यह है कि जब ये राष्ट्रीय खबर बन गया है, तो क्या नजर की शर्म भी बाकी नहीं रही? कैसे ये अधिकारी मंत्री सेल में बना रह सकता है? इन साहब के कुतर्क और बदतमीजी से पूरी भारतीय रेल के सभी वरिष्ठ अधिकारी परेशान हैं। वहीं स्टेशन डेवलपमेंट सरकार के गले का फंदा बनता दिख रहा है। फील्ड स्तर की खींच-तान, वरिष्ठ अधिकारियों की बंदर-बांट से और बचकाने पब्लिसिटी प्रकोष्ठ के चलते हर उद्घाटन एक मेमे-मीम्स मैटेरियल बनेगा। चेरलापल्ली या कन्नौज की घटनाएँ तो उदाहरण मात्र हैं।

मोबिलिटी छोड़कर स्टेशन डेवलपमेंट पर किया गया खर्च उपभोक्ता को अब इरिटेट करता दिखने लगा है। स्टेशन का पहला काम समय से चलती गाड़ियों में सुरक्षित चढ़ना-उतरना, चाय-पानी, खाने-पीने के सामान के प्रबंध से अधिक नहीं—लेकिन गाड़ियाँ बनीं तो वंदे भारत, और हॉलिडे स्पेशल ट्रेनों में तो झख मारकर आईसीएफ कोच ही चल रहे हैं। ये स्पेशल ट्रेनें न तो कभी समय पर चलती हैं, न ही चलाई जाती हैं, ऊपर से पचीस प्रतिशत किराया अलग से लिया जाता है। स्मरण रहे, यह हमने सालों पहले कहा था कि निवेश की प्राथमिकता का सही निर्धारण ऑल इंडिया डेल्ही सर्विस (#AIDS) और खान मार्केट गैंग (#KMG) के चलते नहीं हो सकता।

यदि मंत्री सेल के पब्लिक ग्रीवंस देखने वाले अधिकारी ट्रैक फिटिंग देखने के लिए एक एग्रीड लिस्टेड अधिकारी के साथ विदेश यात्रा कर सकते हैं, और फिर भी चौड़े होकर मंत्री सेल में बने रह सकते हैं—तो यहाँ कुछ भी हो सकता है। कुल जमा यह, कि सारे काम तो साहब की मेमसाहब ही करवाएँगी। रेल के रेसिडुअल स्ट्रेस का आकलन आवश्यक नहीं, रेल के निवेश का सही निर्धारण आवश्यक नहीं, बड़ी समस्याओं को हल करना आवश्यक नहीं—आवश्यक है केवल करियर मैनेजमेंट, और सबको खुश रखना!

आज जैसे ‘लीडर्स ग्रुप’ पर प्राइमरी स्कूल के बच्चों की तरह अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने की परिपाटी को खुला बढ़ावा दिया जा रहा है, #मोदी जी उसे रुकवाईये, क्योंकि यह काम आपके मंत्री से नहीं हो पा रहा है! आप तो ‘प्रधान सेवक’ बनकर निर्णय ले तो रहे हैं, बड़ी समस्याओं को हल तो करने का प्रयास कर तो रहे हैं, लेकिन ये आपके अधिकारी जनसेवा से दूर, आपके विजन से इतर—जनता को गुमराह करने, बेवकूफ बनाने की एक नई मैनेजमेंट फिलॉसफी का प्रसार कर रहे हैं।

याद रखिए इसी फिलॉसफी के चलते बालासोर जैसी घटनाओं की पूर्व सूचना को भी किसी ने नहीं देखा था, क्योंकि सब अपने ही ‘मैनेजमेंट’ में सबको खुश करने में लगे थे। और ये भी न भूला जाए कि ये मार्च का महीना बहुत जालिम है, सबकी वार्षिक कार्य आकलन रिपोर्ट (#APAR) इसी महीने में लिखी जाएगी।

मोदी जी, अब रेल के पास अपना स्टाफ कॉलेज तो बचा नहीं, कोई तरीका निकालिये अपने इन रेल अधिकारियों को बताने का—#DRM, #GM, #Member और अन्य लेवल-15 के अधिकारियों का काम सोशल मीडिया में और ह्वाट्सऐप पर लाइक बटोरना नहीं है। जब ईमेल भी नहीं थे, तब भी रेल में हुए फील्ड वर्क के बारे में जनरल मैनेजरों को और बोर्ड को सब पता रहता था। तो आज ये लार टपकाते हुए डीआरएम और जीएम लीडर्स ग्रुप में क्यों हर छोटे-बड़े कामों का झूठा श्रेय लेते रहते हैं? क्यों अदने से दैनंदिन कार्यों का श्रेय लूटने की होड़ लगी है? कम्पीटीशन चल रहा है ह्वाट्सऐप करने का, क्या कोई ठहराव नहीं रेल के शीर्ष नेतृत्व में?

रेल अधिकारियों की ये होड़, और इस बचकाने व्यवहार को मिलने वाला प्रोत्साहन किसी बड़ी समस्या का खुला न्योता है। वैसे भी सिस्टम में जितना इनपुट जा चुका है उसके बाद हो रही दुर्घटनाएं—जो सीआरबी के मासिक जनता दरबार में गिन-चुनकर बताई जाती हैं—भी खत्म हो जानी चाहिए थीं। अधिकारियों का वार्षिक आकलन इस पर हो कि उन्होंने कौन सी बड़ी समस्या को हाथ में लिया, किस बड़ी समस्या का समाधान किया, न कि इस पर कि किसी और के किए काम पर लाइक्स बटोरना।

वरिष्ठ नेतृत्व को #OLQ चिह्नित करनी चाहिए, वरिष्ठ अधिकारी सबको खुश करने के लिए नहीं होते हैं, उन्हें जनहित को सामने रखना है। इसी कन्फ्यूजन के कारण आज यूनियनें और वेंडर सबके सिर पर चढ़कर नाच रहे हैं—क्योंकि यही दोनों अधिकारियों के कमरों में निर्बाध आते-जाते हैं, और अपने मुद्दों पर हल्ला मचाते हैं, क्या केवल इनको खुश रखना ही अब रेल प्रबंधन का सबसे बड़ा काम बन गया है!

रेल अधिकारी—न तो सेलिब्रिटी हैं, न ही राजनेता—रेल अधिकारियों को यह कतई यह नहीं भूलना चाहिए!