Editorial: ईपीसी अनुबंधों में लाभ-सीमा निर्धारित किए जाने हेतु आवश्यक हैं कुछ नीतिगत-निर्णय

देश में राष्ट्रीय राजमार्गों एवं रेलवे अवसंरचना के तीव्र विकास के लिए इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (#EPC) मॉडल को अपनाया गया, जिसका मूल उद्देश्य समयबद्ध निर्माण, तकनीकी दक्षता एवं लागत नियंत्रण था। किंतु वर्तमान में यह देखने में आ रहा है कि ईपीसी मॉडल का दुरुपयोग करते हुए कुछ ठेकेदार डिजाइन में अत्यधिक कटौती कर अनुचित लाभ अर्जित कर रहे हैं, जिससे संरचनाओं की दीर्घकालिक मजबूती, सुरक्षा एवं सेवा-आयु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

यह गंभीर विषय है कि निविदा के समय प्रस्तुत वस्तु-दर (आइटम रेट) के आधार पर जिस संरचना की परिकल्पना की जाती है, वही संरचना अंतिम डिज़ाइन में अत्यधिक “हल्की” कर दी जाती है, जिससे परियोजना लागत में अस्वाभाविक रूप से भारी बचत दिखाई जाती है। यह बचत किसी असाधारण इंजीनियरिंग नवाचार के कारण नहीं, बल्कि न्यूनतम स्वीकार्य सीमाओं तक डिजाइन को घटाने अथवा उस पर कम्प्रोमाइज करने के कारण होती है, जो भविष्य में संरचनात्मक क्षरण, बार-बार मरम्मत एवं सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।

अतः यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि एनएचएआई एवं भारतीय रेल द्वारा यह नीति निर्धारित की जाए कि ईपीसी अनुबंधों में ठेकेदार द्वारा अर्जित शुद्ध लाभ, स्वीकृत वस्तु-दर आधारित निविदा मूल्य की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक न हो। इस हेतु यह अनिवार्य किया जाए कि प्रत्येक ईपीसी ठेकेदार एक शपथ-पत्र (एफिडेविट) प्रस्तुत करे, जिसमें यह घोषणा हो कि डिजाइन में की गई किसी भी बचत के माध्यम से 10 प्रतिशत से अधिक लाभ अर्जित नहीं किया गया है।

यदि किसी परियोजना में डिजाइन के पश्चात 10 प्रतिशत से अधिक की बचत होती है, तो ऐसी स्थिति में या तो उस अतिरिक्त बचत को प्राधिकरण के खाते में समर्पित किया जाए अथवा उसी परियोजना में संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण, अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान, दीर्घकालिक टिकाऊपन अथवा अनुरक्षण संबंधी कार्यों में समायोजित किया जाए। साथ ही, ऐसी सभी परियोजनाओं में स्वतंत्र तृतीय-पक्ष डिजाइन एवं संरचनात्मक ऑडिट को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाएँ केवल लाभ कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की दीर्घकालिक संपत्ति होती हैं। ईपीसी मॉडल की आत्मा तभी सुरक्षित रह सकती है जब डिजाइन-इंडिपेंडेंस का उपयोग गुणवत्ता एवं नवाचार के लिए हो, न कि अत्यधिक लाभ निकालने के लिए। अतः जनहित, सार्वजनिक धन की सुरक्षा तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिए टिकाऊ अवसंरचना सुनिश्चित करने हेतु उपर्युक्त सुझावों पर शीघ्र नीतिगत-निर्णय लिया जाना अत्यंत आवश्यक है।