बिलासपुर की दुर्घटना—क्या यह मात्र मानवीय भूल है? या रेल का लेवल 16-17 इसके लिए जिम्मेदार है?

बिलासपुर में हुए रियर इंड कोलिजन—जिसमें मेमू पैसेंजर ट्रेन ने एक खड़ी मालगाड़ी में पीछे टक्कर मार दी—को प्रथमदृष्टया #SPAD माना जा रहा है, कहीं यह सिस्टम की गलती का ठीकरा मृत ड्राइवर पर फोड़े जाने का प्रयास तो नहीं?

जैसा #Railwhispers ने बार-बार कहा और लिखा है—रेल की पहली, दूसरी और तीसरी प्राथमिकता संरक्षा (सेफ्टी) होनी चाहिए—उसके बाद सुरक्षा और समयपालन!

यह रेल के कई वरिष्ठ अधिकारी—जिनके पास डीआरएम, महाप्रबंधक और मेम्बर होने का अनुभव है—ने #Railwhispers से बार-बार कहा है कि रेल के आका भूल गए हैं आधारभूत—सबसे बेसिक अन्तर—जो ओपन लाइन और कंस्ट्रक्शन को अलग रखता है।

#Railwhispers ने इस विषय पर कई विशेषज्ञों से चर्चा करने के बाद दो भागों में यह लेख प्रकाशित किए हैं:

25 अक्टूबर: “What is the role of a Division, Zone and Railway Board: Getting Basics correct, Part-I

26 अक्टूबर: “What is the role of a Division, Zone and Railway Board: Getting Basics correct, Part-II

उक्त दोनों लेखों में #Railwhispers ने मंडल, जोन और रेलवे बोर्ड की क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए—के बारे में विस्तार से लिखा। इन्हीं विशेषज्ञों के फीडबैक पर #Railwhispers ने डीआरएम को गतिशक्ति के नाम पर कंस्ट्रक्शन के काम दिए जाने का पुरजोर विरोध किया था। सरकार ने यह माना भी और डीआरएम को पुनः ‘सेफ्टी फर्स्ट’ पर लगाया गया।

#Ep145: बिलासपुर की दुर्घटना: मृत ड्राइवर पर सारा दोष मढ़ना अनैतिकता की पराकाष्ठा है!

लेकिन बीच-बीच में कंस्ट्रक्शन और प्रोजेक्ट ओपन लाइन महाप्रबंधकों के लिए प्राथमिकता बन जाते हैं। वे ये भूल जाते हैं—जैसा हमने उपरोक्त आर्टिकल्स में लिखा—कि प्रोजेक्ट्स—कंस्ट्रक्शन और विभाग प्रमुखों (#PHODs) से डील होने चाहिए। डीआरएम की पहली, दूसरी और तीसरी प्राथमिकता केवल रेल सेफ्टी होनी चाहिए, क्योंकि लोगों की जान से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। तत्पश्चात चौथी और पांचवीं सिक्योरिटी और पंक्चुअलिटी ही होनी चाहिए। यदि डीआरएम इस पर कड़ाई से अमल करें, तो विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकार की बार-बार हो रही किरकिरी से काफी हद तक बचा जा सकता है!

जोनल महाप्रबंधकों और विभाग प्रमुखों की जिम्मेदारी मंडलों पर दबाव बनाने की नहीं है, बल्कि उनको फैसिलिटेट अर्थात् उन्हें संबल देने की है। लेकिन आज रेलवे बोर्ड, जोनल हेडक्वार्टर सीधे मंडलों के ब्रांच ऑफिसर्स पर दबाव बनाते हैं—निश्चित दूरी पर बैठे बोर्ड और हेड क्वार्टर के अधिकारियों के लिए दैनंदिन कार्य—जो सेफ्टी से जुड़े हैं—के बारे में वह चिंता नहीं होती, जो डीआरएम की हो सकती है—हालांकि क्लबों, पार्टियों और नाच-गानों में डूबे कई डीआरएम भी रेल संचालन से भटके रहते हैं।

बिलासपुर में हुए एक्सीडेंट से एक बार फिर लोको पायलट्स के काम करने की शैली पर प्रश्न उठ गए हैं। कई जोनल रेलवे में जहां लोको पायलट केटेगरी में 25-35% वेकेंसी है, वहीं उत्तर भारत के कई मंडलों में ये इफरात में हैं। एक भूल की कीमत प्रशासनिक कार्यवाही हो सकती है, लेकिन किसी की जान नहीं हो सकती। लोको पायलट को मिलने वाले अलाउंस और अतिरिक्त बेसिक का 30% उन्हें रेल के सबसे अधिक वेतन पाने वाली केटेगरी बनाती है। लेकिन यह कहकर प्रशासन इस बात से पल्ला नहीं झाड़ सकता कि इतनी अधिक वेकेंसी रहें, साथ ही कई रनिंग रूम के हालात भी बहुत अच्छे नहीं। जैसा कि पूर्व मध्य रेलवे (#ECR) में हुए हाल ही के एक्सीडेंट की बात करें, जहाँ एसी के पानी पर पैर फिसलने से एक लोको पायलट की मृत्यु हो गई। रेल मंत्रालय ने लोको पायलट और गार्ड लॉबी पर बहुत सी गाइडलाइन जारी की हैं, लेकिन क्या ये जमीनी स्तर पर इंप्लीमेंट हुई हैं? ये इंप्लीमेंट हो सकती हैं? आउटकम और मैनपावर बेसिस पर होने वाले कांट्रैक्ट के अंतर के चलते भी कई रनिंग रूम बदहाल स्थिति में हैं।

रेलवे बोर्ड के अधिकारियों और रेलमंत्री को यह सोचना होगा कि इतनी पब्लिसिटी के बाद आज स्थिति यह है कि रेल में कॉकरोच, चूहे, सांप, अजगर निकल रहे हैं। वहीं हाल में हुए #OBHS के स्टाफ द्वारा चलती ट्रेन में एक सैनिक की हत्या आत्मा को झकझोर देती है। वहीं पैंट्री वाले रिजर्व्ड यात्रियों के साथ मार-पिटाई करते देखे गए हैं। अवैध वेंडर्स पर कोई अंकुश नहीं है, जब तब अवैध वेंडर्स की यात्रियों के साथ मारपीट की घटनाएँ होती रहती हैं। कुछ डीआरएम से जब बात हुई तो पता चला की OBHS के कांट्रैक्ट उनके सबसे बड़े सिरदर्द बन गए हैं। यात्रियों को दिए जाने वाले छोटे तौलिये कई बार पोछे के लिए इस्तेमाल हो जाते हैं, तो कभी बदबूदार पोछे से पूरा कोच बदबू से भर जाता है जिसे दबाने के लिए सस्ता रूम फ्रेशनर छिड़क दिया जाता है।

गत वर्षों में लिए गए खान मार्केट गैंग (#KMG) से प्रेरित कई निर्णयों में, #ENHM डायरेक्ट्रेट की स्थापना करना भी था। आज रेल की साफ-सफाई पता नहीं किसके पास है, ENHM बना तो दिया—लेवल 16 का अधिकारी भी रेलवे बोर्ड में बैठा दिया और लेवल 15 का जोनल मुख्यालय में—लेकिन इन्हें साफ-सफाई का काम बहुत कम जगह दिया गया।

आज हाल यह है कि रेल की सफाई—ट्रैफिक के कमर्शियल, ऑपरेटिंग, सिविल इंजीनियरिंग और मैकेनिकल ब्रांच में बँटी हुई है, जबकि एक ENHM नाम का डायरेक्टोरेट अलग से केवल इसी काम के लिए बनाया गया था। और हाँ, मेडिकल तो रह ही गया, CHI भी तो यही काम करते हैं। ये है रेल का ट्रांसफॉर्मेशन! खर्चे कई गुना बढ़ गए, इन ठेकों की लागत दो दूनी चार गुना हो गई और गाड़ियों में अजगर, चूहे निकल रहे हैं-कॉक्रोच के लिए लोगों ने तो अब आपत्ति दर्ज कराना ही बंद कर दिया है।

रेलवे बोर्ड के डबल कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन के एक्सपर्टों को ये रायता सँभालना है, न कि ब्रांच ऑफिसर्स के रोल पर दादागीरी करना। एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जीएम और बोर्ड की मीटिंग अब सुपरवाइजर्स से होने लगे, तो कोई हैरानी नहीं होगी। जब रेल का लेवल 16, 17 इसमें कन्फ्यूज्ड है कि मंडल का क्या रोल है और जोन एवं बोर्ड का क्या रोल है, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।

रेलमंत्री जी कृपया इन लेखों को अब आप स्वयं ही पढ़ें, और अपने शीर्ष कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट का अब आप ही कुछ मार्गदर्शन करें, शायद उनमें कुछ जीवंतता का संचार हो जाए:

25 अक्टूबर: “What is the role of a Division, Zone and Railway Board: Getting Basics correct, Part-I

26 अक्टूबर: “What is the role of a Division, Zone and Railway Board: Getting Basics correct, Part-II