कॉन्ट्रैक्ट पर सीसीआरएस—क्या इसी तरह स्थापित होगी सिस्टम में विश्वसनीयता?
मुख्य रेल संरक्षा आयुक्त (#CCRS) को सारे रिक्रुटमेंट रूल्स को बायपास करके एक साल के “कॉन्ट्रैक्ट” पर सेवा-विस्तार दिया गया है। संरक्षा विशेषज्ञ समझ नहीं पा रहे हैं कि सीसीआरएस जैसी रेगुलेटरी भूमिका पर “कॉन्ट्रैक्ट नियुक्ति” करने अथवा री-एम्प्लॉयमेंट देने का कोई कारण नहीं है—इसका कोई औचित्य भी नहीं है, तथापि ऐसा किया गया।
जानकारों का मानना है कि रेल व्यवस्था की गिरती विश्वसनीयता और रेल संरक्षा की दुर्दशा के परिप्रेक्ष्य में यह आदेश एक नया निम्नतम स्तर है। पहले तो इस पोस्ट का लेवल-17 होना ही विवादास्पद था, उस पर भी इस पोस्ट पर पदस्थ रीढ़हीन अधिकारी को कॉन्ट्रैक्ट पर यह सेवा-विस्तार देना सरकार का बहुत ही गलत निर्णय है।
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उल्लेखनीय है कि रेल संरक्षा आयुक्त के पदों को कैडरलेस करके इस संस्था को ही रीढ़विहीन कर दिया गया। कॉन्ट्रैक्ट पर सेवा-विस्तार पाने वाले वर्तमान सीसीआरएस इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं। जिन्हें वस्तुतः इस विषय की कोई जानकारी नहीं, उन्हें रेल संरक्षा आयुक्त बनाकर मनोपयुक्त जांच रिपोर्ट बनवाना ही इसके पीछे का उद्देश्य रहा। इसके स्पष्ट परिणाम फील्ड में दिखाई दे रहे हैं।
संरक्षा व्यवस्था में काम कर रहे कई वरिष्ठ अधिकारियों के बताए अनुसार, कॉन्ट्रैक्ट पाए वर्तमान सीसीआरएस को तब भी फेवर किया गया था जब इस पद पर वेस्टर्न सर्कल के सीआरएस को बायपास करके इन्हें इस पद पर लाया गया था, जो कि न केवल इनसे दो साल सीनियर थे, बल्कि उन्हें अपने डोमेन का गहन अनुभव भी था।
उन्होंने यह भी बताया कि कॉन्ट्रैक्ट पाए सीसीआरएस ने पिछले लगभग एक साल से सीआरएस/मेट्रो का अतिरिक्त चार्ज भी अपने पास रखा, जबकि उस पर नई नियुक्ति हो चुकी थी, फिर भी इन्होंने उसे चार्ज नहीं सौंपा। क्या यह ऊपरी संरक्षण में चल रही मनमानी और निरंकुशता नहीं है?
उनका कहना था कि संभवतः मेट्रो लॉबी ने इस कॉन्ट्रैक्ट नियुक्ति में प्रमुख भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि रेलवे और मेट्रो की संरक्षा चौकसी में बहुत बड़ा अंतर है, जबकि व्यवस्था का जोर इस बात पर रहा है कि मेट्रो रेलों की भी संरक्षा रेलवे के समकक्ष होनी चाहिए, मगर मेट्रो लॉबी ऐसा नहीं चाहती, संभवतः इसीलिए उसे एक रीढ़हीन सीसीआरएस चाहिए!
उनका कहना है कि वैसे ही वर्तमान चेयरमैन/रेलवे बोर्ड के दो सेवा (कॉन्ट्रैक्ट) विस्तार—उनसे पहले जिसे चाहे उसको सेवा-विस्तार—चाहे वह बोर्ड मेंबर हों या चेयरमैन—ने रेल के वरिष्ठ अधिकारियों में निराशा-हताशा भर दी है, CCRS का यह कॉन्ट्रैक्ट पर सेवा-विस्तार आदेश और भी अधिक निराशाजनक है।
संरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बिना विश्वसनीयता के वरिष्ठ अधिकारी कैसे काम कर सकते हैं? कैसे सरकार इस बात को मान रही है कि वरिष्ठ अधिकारी—जिसने ठेके पर सेवा-विस्तार लिया है—अपने अधीनस्थों को प्रेरित कर सकता है?
विशेषज्ञों का कहना है कि रेल में इतने बड़े निवेश के बाद भी यदि रेल से अपेक्षित रिजल्ट नहीं मिले हैं, तो उसके पीछे सिस्टम को तोड़ने की मानसिकता है। चाहे वह #IRMS के नाम से रेल के पूरे वरिष्ठ स्तरों को बाईपास करना हो, या विजिलेंस के वसूली रैकेट को प्रोटेक्ट करना रहा हो, या फिर कुछ ऐसे वसूलीबाज विजिलेंस और ऐसे कुछ अन्य अधिकारियों को दूसरे संस्थानों में अपना बगलबच्चा बनाकर बैठाना रहा हो, कुछ फेवरेट अधिकारियों को रोटेट न करना हो, जब चाहे रेलवे जोनों को छोटा करना हो—यदि ऐसे ही ठेके पर सेवा-विस्तार कर रेल चलानी है, तो 80-90 साल की उम्र तक तो यही लेवल 16-17 की फसल चल जाएगी!

