लखनऊ मंडल, उत्तर रेलवे में कुर्सी का खेल

कमाऊ कुर्सी की भूख, ईएमआई वाले भ्रष्टाचार का नया स्वरूप, और उच्च अधिकारियों की मूकदर्शक गिरगिट वाली भूमिका—मिलकर भारतीय रेल को एक भ्रष्ट रंगमंच बना रहे हैं। समय रहते इस खेल को नहीं रोका गया, तो वित्त विभाग का “Gen-Z” संस्करण, रेलवे को ही म्यूजिकल चेयर का अखाड़ा बना देगा!

भारतीय रेल में भ्रष्टाचार की कहानियाँ अब किसी बेताल कहानियों की तरह सामान्य हो चुकी हैं। इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, एसएंडटी, स्टोर्स और सिविल इंजीनियरिंग के ठेके, ऑपरेटिंग और कमर्शियल की मलाई—ये सब तो लोग खूब सुनते आए हैं। मगर असली और मुफ्त की “मलाई” का खेल तो मंडलों के वित्त विभाग में है, जिसका नाम आते ही लोग अब तक ऊंघने लगते थे। जी हाँ, वही वित्त विभाग—जो मलाई से भरी झील के किनारे पर बैठा किसी “बगुला-भगत” की तरह दिखता है—पर भीतर ही भीतर पूरा धन-तांडव करता है, जिम्मेदारी कुछ भी वहन नहीं करता, मगर इसकी बॉसिंग सभी विभागों पर चलती है।

बताते हैं कि उत्तर रेलवे के किसी मंडल का वरिष्ठ मंडल वित्त प्रबंधक (#SrDFM) बन जाना, किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी से सांसदी का टिकट पाने से भी कठिन है। और यह बात उत्तर रेलवे के लेखा विभाग में बड़े चटकारे लेकर कही जाती है। और फिर उसमें यह भी जोड़ा जाता है कि अगर मंडल लखनऊ या दिल्ली हो, फिर तो यह कठिनाई सीधे-सीधे कैबिनेट मंत्री बनने जैसी हो जाती है। टिकट के लिए पार्टी फोरम, और सीनियर डीएफएम की कुर्सी के लिए—ऊँचे संपर्क, मोटी जेब और ऊँचे जुगाड़ का होना आवश्यक शर्त है। इसका कारण भी कोई गूढ़ नहीं है—यह कुर्सी ही ऐसी है कि जिस पर बैठते ही “लक्ष्मीदेवी” की कृपा आप पर बरसने लगती है।

यह भी कहा जाता है कि अब चूँकि यह कुर्सी इतनी “सुपर प्रीमियम” होती है, तो इसके लिए होने वाली स्पर्धा भी उतनी ही हड़कंप मचाने वाली होती है। अधिकारी अपने-अपने स्तर पर “बहुमूल्य” प्रयास करते हैं—कोई सांसद से सिफारिश करवाता है, कोई यूनियनों को मालामाल कर देता है, तो कोई बडौदा हाउस अथवा रेल भवन में “नमस्कार—साष्टांग चरण वंदन” का रिकॉर्ड तोड़ देता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर रेलवे के एक मंडल में घटी घटना तो इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में लिखी जानी चाहिए। थोड़ी पुरानी घटना है। एक पुराने सीनियर डीएफएम का ट्रांसफर हो गया, मगर वे कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे। वे सुबह नौ बजे ही—ऑफिस ऑवर शुरू होने से पहले ही—आकर अपनी गद्दी पर बैठ जाते। नए अधिकारी पीछे खड़े रहते कि जैसे ही ये लघुशंका के लिए उठें, या फिर डीआरएम का बुलावा आए, तो मैं बैठ जाऊँ। दस दिन तक दोनों के बीच यह “म्यूजिकल चेयर” का खेल चलता रहा—कभी पुराने जीत जाते, कभी नए। आखिरकार मुख्यालय को दखल देना पड़ा और वादा करना पड़ा—“अरे भाई! नाराज मत हो, लड़ो मत आपस में, तुम्हें दूसरा ‘बेहतर मालदार’ पद मिलेगा।” तब जाकर उनका मोह टूटा।

बताते हैं कि दूसरे एक “सृजनशील” सीनियर डीएफएम साहब ने तो अपने मातहत सूबेदारी प्रथा ही लागू कर दी। सारे सेक्शन अपने-अपने सीनियर सेक्शन ऑफिसर (#SrSO)—जो कि गजटेड न होते हुए भी गजटेड होता है—को बेच दिए—“तुम्हारा इलाका, तुम्हारा लगान! तुमको क्या करना है, कैसे करना है, तुम करो!” महीने के अंत में एक निश्चित लगान वसूल कर लेते और पूरे महीने निश्चिंत रहते। यूनियन के लोगों को कोटेशन फ्री करके अपने पक्ष में रखा। यानि वित्त विभाग भी अब मुगलिया सल्तनतों की तरह जागीरें बाँटने, लगान वसूलने, और मौज करने की परंपरा का पालन करने लगा है।

ताजा किस्सा लखनऊ मंडल का है। बताते हैं कि यहाँ एक नये “तगड़े” उम्मीदवार ने मात्र दो साल में ही पुराने सीनियर डीएफएम को गद्दी से पटखनी दे दी। अब पुराने सीनियर डीएफएम साहब भी भला इतनी ‘मेहनत’ से कमाया हुआ पद इतनी आसानी से क्यों छोड़ते? सो, उन्होंने नवागत के स्वागत का नया अध्याय लिखा—“पूरे सीनियर डीएफएम कार्यालय पर ताला जड़ दिया और स्वयं तो गायब हुए ही, साथ में सभी सहायकों को भी हवा कर दिया। न चैंबर, न फाइल, न स्टाफ—पूरा सीनियर डीएफएम कार्यालय जैसे एक “कॉमेडी शो” के मंच में बदल गया। लोग तालियाँ बजाकर हँस रहे हैं।”

तालाबंद सीनियर डीएफएम कार्यालय, लखनऊ मंडल, उत्तर रेलवे

उधर नए आए सीनियर डीएफएम साहब सोच रहे हैं—“कुर्सी मिली है या अग्निपरीक्षा हो रही है? आखिर मुझे इस मंडल की ‘सेवा’ करने का अवसर कब मिलेगा? इसके लिए तो हम पोस्टिंग ऑर्डर निकलने के बाद तीन महीने से अधिक समय से प्रतीक्षा कर रहे थे! इसके लिए ही तो हमने रतलाम से यहां आने की जुगाड़ लगाई थी! पूर्व विभाग प्रमुख को पटाने की बहुत कोशिश की, मगर वो नहीं मानीं, और अब जब नए विभाग प्रमुख को पटाया भारी ईएमआई पर, तब यह नया पंगा पड़ गया! बड़ा कन्फ्यूजन है भाई, पर कुछ तो हल निकालना होगा इस नई समस्या का, वरना सारी जुगाड़ बेकार चली जाएगी!”

लगभग तीन महीने बाद चॉइस पर निकला गया पोस्टिंग ऑर्डर?

अब बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इस कुर्सी में ऐसा क्या है कि इसके लिए इतनी उठापटक हो रही है दो लेखा अधिकारियों के बीच? इसका उत्तर बहुत सीधा सा है—धन और शक्ति का महामिश्रण, और ऊपर बैठे विभाग प्रमुख जैसे बड़े अधिकारी? जो इस पूरे खेल को देख-देखकर होंठों में मंद-मंद मुस्कराते रहते हैं। हालाँकि असल में वही इस प्रहसन के निर्देशक होते हैं। और यह प्रहसन लगभग सभी विभाग प्रमुखों द्वारा सभी डिवीजनों में खेला जा रहा है!

जानकारों का मानना है कि अगर यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब मंडलों में ब्रांच अफसरों की कुर्सी के लिए गैंगवार होने लगेगी—“तू हट, मैं बैठूँगा।” कोई किसी की सुपारी दे देगा, कोई किसी का ट्रांसफर नोटिफिकेशन गायब कराएगा। किसी के बीच जूतम-पैजार होगी। और तब ऊपर बैठे विभाग प्रमुख फिर से अपना वही पुराना किंकर्तव्यविमूढ़ता वाला डायलॉग मारेंगे—“हमें तो कुछ पता ही नहीं, हम क्या कर सकते हैं, हमको तो कोई रिपोर्ट ही नहीं मिली।”

वास्तव में यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, यह एक कटु सत्य है। साक्षात घटित घटनाओं पर आधारित है। कुर्सी की यह भूख, ईएमआई वाले भ्रष्टाचार का यह नया स्वरूप, और उच्च अधिकारियों की यह मूकदर्शक गिरगिट वाली भूमिका—सब मिलकर भारतीय रेल को एक भ्रष्ट रंगमंच बना रहे हैं। अगर समय रहते इस खेल को नहीं रोका गया, तो वित्त विभाग का “Gen-Z” संस्करण, रेलवे को ही म्यूजिकल चेयर का अखाड़ा बना देगा। ऊपर बैठे लोग उनकी नाक के नीचे चल रहे इस खेल से बेखबर कुम्भकर्णी निद्रा में लीन हैं। उन्हें जगाना नहीं—खबरदार !

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी