कितना अमानवीय है, रेलकर्मी के मरने तक उसे ‘मेडिकली इनवेलिड’ न करना!
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“बीमार रेलकर्मियों के परिवारों के भूखों मरने से रेलवे के डॉक्टरों को कोई फर्क नहीं पड़ता!“
दरअसल ये वे ही रेलकर्मी हैं जो अधिकारियों के और डॉक्टरों के कुसमय में काम आते हैं। बेचारे अपना घर परिवार छोड़कर जी-जान लड़ाकर खड़े रहते हैं। अनेकों ऐसे डॉक्टरों के परिवारिक सदस्यों के स्वर्गवासी होने के बाद यह देखा गया है कि कोई अधिकारी तो छोड़ो उन डाक्टरों के साथी भी जब शव यात्रा में शामिल नहीं हुए, तब वे ही रेलकर्मी थे जिन्हें कभी इन्होंने दुत्कारा था, ढंग से इलाज नहीं किया था, या जानवरों जैसा व्यवहार किया था, वे रेलकर्मी ही शव यात्रा में भी शामिल भी हुए, और उनकी हरसंभव सहायता भी की।
यह बातें बोली या कही नहीं जाती हैं, लेकिन जब सब्जेक्ट ही उससे संबंधित हो तो बताना जरूरी लगता है। यहां यह भी बता दें कि डॉक्टरों की क्रूरता तो है ही, परंतु उनसे ज्यादा क्रूर वे अधिकारी हैं, जो रेल वर्करों से बहुत दूर कहीं अपने सुरक्षित कैबिनों में बैठकर रेलवे की सुविधाओं का और पैसे का भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं। वे रेलवे द्वारा दिए गए पद के नशे में इस तरह मदहोश हो चुके हैं कि उनमें मानवीयता का नामोनिशान भी नहीं बचा है।
ऐसे ही नरपिशाच अधिकारी, मंडल अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों को आदेश देते हैं कि रेलकर्मी के मरने तक उसको मेडिकली इनवेलिड न किया जाए। आमतौर पर डॉक्टरों/अधिकारियों की यह सोच है कि रेलकर्मी अपने बच्चों को नौकरी दिलाने के लिए “अनफिट फ्रॉम ऑल कैटेगरी” होना चाहते हैं। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि यह 100% गलत है, लेकिन संबंधित डॉक्टरों और अधिकारियों की सोच 90% गलत है, यह बात दावे से कही जा सकती है।
जबकि मात्र 10% रेलकर्मी माया-मोह में फंसकर अपने बच्चे के भविष्य को संवारने के लिए इस तरह का निवेदन कहीं अस्पताल कर्मियों से या यूनियन पदाधिकारियों से अथवा सीधे डॉक्टरों से भी करते तो हैं, लेकिन वे हर जगह से खाली हाथ लौटते हैं। यह भी सत्य है। क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में किसी को फेवर करना तो बहुत दूर रहा, वास्तविक इलाज ही हो जाए तो रेलवे और रेलवे के डॉक्टरों की बहुत बड़ी कृपा मानी जाती है।
परंतु डॉक्टरों ने बस एक ही राग लगा लिया है कि रेलकर्मी जानबूझकर “इनवेलिडेशन” चाहता है। जबकि वे भी अच्छी तरह से जानते हैं कि यह व्यक्ति अब किसी भी तरह से रेलवे के लिए, और अपने घर-परिवार के लिए कोई काम करने योग्य नहीं बचा है। फिर भी उसको महीनों ही नहीं, सालों तक सिक में रखे रहना, जिस आदमी से खड़े नहीं होते बन रहा, उसको ड्यूटी के लिए फिटनेस दे देना, कितना मानवीय है? और साथ ही कसाईयों से भी बुरा व्यवहार करना, यह आम बात है।
किसी डॉक्टर की सोच ऐसी कैसे हो सकती है? एक तो रेलवे/आईआरएमएम (इंडियन रेलवे मेडिकल मैनुअल) में ऐसा नियम है कि किसी व्यक्ति के इनवेलिडेशन के लिए उसका 6 माह तक सिक में रहना आवश्यक है। यह नियम मानवीय आधार पर बनाया गया है। यह बिल्कुल गलत नहीं है। यह नियम इसीलिए बनाया गया कि रेलवे डॉक्टरों के द्वारा उस व्यक्ति को ठीक करने का हर संभव प्रयास किया जाए। यदि सारे प्रयास विफल हो रहे हैं तो ही उसका इनवेलिडेशन कर दिया जाए।
ऐसा मानकर चला गया कि इसमें चार-छह महीने का समय लग सकता है। इस सोच पर आईआरएमएम में वह नियम बनाया गया। हालांकि आज के अत्याधुनिक मेडिकल युग में यह सोच भी बेहद पुरानी हो चुकी है। किसी भी बीमारी के बारे में आज आठ-दस दिन के अंदर ही निश्चित हो जाता है कि संबंधित व्यक्ति का भविष्य क्या है। परंतु रेलवे के डॉक्टर पेशेंट की बुरी हालत देखते हैं तो न तो अपनी तरफ से उसे ठीक करने का कोई प्रयास करते हैं, और न ही उसे किसी अच्छे रेफरल या कांट्रैक्ट अस्पतालों में भेजकर ठीक करने के लिए कोई मशक्कत करने की आवश्यकता समझते हैं।
ऐसे में जब रेलवे के डॉक्टरों से पूछा जाता है कि संबंधित व्यक्ति को किसी अच्छे प्राइवेट अस्पताल में रेफर करने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे हैं? तब उनका बड़ी बेरहमी से कहना होता है कि “इस पेशेंट को कहीं भी लेकर जाओ यह ठीक होने वाला नहीं है। जब ठीक ही नहीं किया जा सकता तो रेलवे का पैसा क्यों व्यर्थ किया जाए।”
इसी बात पर जब उनसे उस पेशेंट के इनवेलिडेशन की बात की जाती है तो वह साफ कह देते हैं कि “यह नाटक कर रहा है।” आखिर सच्चाई क्या है? ऐसी परिस्थितियों में सीधे तौर पर यह नियम बना देना चाहिए कि यदि 6 महीने की मशक्कत में यदि किसी रेलकर्मी के ठीक होने की संभावना कहीं से भी दिखाई देती है तो, उसके लिए रेलवे अस्पताल के द्वारा हो या किसी प्राइवेट अस्पताल के द्वारा उसको ठीक करने के लिए सारी ताकत झोंक देनी चाहिए जिससे कि वह चुस्त-दुरुस्त होकर रेलवे की भी सेवा कर सके और उसके परिजन भी निश्चिंतता महसूस करें।
यदि इस समय सीमा में कोई व्यक्ति ठीक नहीं किया जा सकता है तो उसको तत्काल प्रभाव से ‘अनफिट फ्रॉम इंडियन रेलवे’ का सर्टिफिकेट देकर सीधे तौर पर रेलवे से विदा कर दिया जाए। यह काम जिस भी डॉक्टर या अधिकारी के द्वारा डिले किया जाता है, उस व्यक्ति के परिवार के जीविकोपार्जन के लिए उस डॉक्टर या अधिकारी की पेमेंट में से रेलवे द्वारा उस व्यक्ति को जितनी पेमेंट मिलती है कम से कम उससे आधी पेमेंट दी जाएगी। देखिए कैसे तत्परता से कार्य होना शुरू हो जाएगा। क्रमश:…
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