SEE/Spring karkhana Sithauli arrested for cutting & selling trees
कहां मर-खप गए हैं ऑफिसर्स एसोसिएशन और रेल कर्मचारी यूनियनें तथा कैडर संगठन?
रेल स्प्रिंग कारखाना रेलवे कॉलोनी, सिथौली, ग्वालियर से माह जून/जुलाई में बिजली के तारों में फसने वाली हरे पेड़ों की शाखाओं को छांटने के नाम पर कुल 30 पेड़ों को तने से काट-काटकर उनकी लकड़ी को चोरी कर लिया गया।
28 जुलाई 2020 को इस संबंध में आईओडब्ल्यू, ग्वालियर आर. के. गुप्ता द्वारा चोरी की लिखित सूचना दी गई। आरपीएफ पोस्ट ग्वालियर द्वारा उसी दिन अपराध संख्या 09/2020 के तहत आरपी(यूपी) ऐक्ट की धारा 3 का मामला अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज किया गया।
31 जुलाई 2020 को उक्त मामले में जसरथ बंजारा पुत्र प्रीतम सिंह और बीरू बंजारा पुत्र भगवान सिंह, कप्तान बंजारा पुत्र खेमा को गिरफ्तार कर उनकी निशानदेही पर शमशान भूमि नाका चंद्रवदनी, ग्वालियर से उक्त लकड़ी बरामद कर ली गई। गिरफ्तार आरोपियों को उक्त मामले में आरोपी बनाया गया।
आरोपियों ने वरिष्ठ विद्युत इंजीनियर (एसईई) सोमेंद्र सिंह के कहने पर उक्त पेड़ों को काटने और उनके आदेश पर लकड़ी बेचने का जुर्म स्वीकार किया। उनके एक अन्य साथी चरण सिंह को 5 अगस्त 2020 को गिरफ्तार किया।
आरपीएफ ने सम्मन देकर एसईई सोमेंद्र सिंह को सम्मन देकर 8 अगस्त 2020 को रे.सु.ब. पोस्ट ग्वालियर द्वारा बुलाया गया।
कुछ समय बाद सोमेंद्र सिंह जब आरपीएफ पोस्ट पर हाजिर हुए तब उन्होंने अपने बयान में रेलवे कॉलोनी सिथौली के अंदर से कथित पेड़ों की कटाई (अपुष्ट कीमत ₹20000) चोरी करवाना स्वीकार किया।
इसके बाद उक्त मामले में आरपीएफ द्वारा दोपहर बाद करीब 15.00 बजे एसईई सोमेंद्र सिंह को गिरफ्तार करके उन्हें रेलवे कोर्ट ग्वालियर में पेश किया गया। रेलवे कोर्ट ने उनको जमानत पर छोड़ दिया गया।
एक अधिकारी का कहना है कि इसमें कहानी कुछ और है। यह बहुत ही आपत्तिजनक है। यदि यह एसईई भी है, तो आरपीएफ के इस रवैये पर सीआरबी सहित तथाकथित पांचो टेक्निकल डिपार्टमेंट की एकता अब कहां गई?
इस अधिकारी का कहना है कि आरपी(यूपी) ऐक्ट रेल कर्मचारियों और अधिकारियों पर लगाने के लिए नहीं है, इनके लिए डिसिप्लिन एंड अपील रूल (डीएआर) है। फिर रेल अधिकारियों और कर्मचारियों पर यह ऐक्ट आरपीएफ द्वारा कैसे इस्तेमाल किया जा रहा है?
उनका कहना है कि वैसे तो जिस-जिस सेक्शन में ऐसी चोरियां होती हैं, उस-उस सेक्शन के सारे अपराधी आईपीएफ/आरपीएफ को हफ्ता पहुंचाते ही हैं। अतः किसी भी आईपीएफ के लिए यह बहुत ही आसान है कि वह अपने इन्हीं गुर्गों से जिसका भी नाम बुलवाना चाहे, बुलवा दे। यदि वह चाहे तो उनसे “वीकेन यादव” तक का भी नाम बुलवा सकता है। रस्सी को सांप बनाने की कला सिर्फ खाकी वर्दी को ही आती है, सर्वज्ञात तथ्य है।
उन्होंने आगे कहा कि अगर आरपीएफ की यह निरंकुश मनबढई नहीं रोकी गई, तो आने वाले दिनों में डीआरएम, जीएम और सीआरबी सहित सब इसके शिकार बनेंगे। उनका अंतिम सवाल था कि इतनी बड़ी घटना हो गई, अब कहां हैं ऑफीसर्स एसोसिएशन, प्रमोटी ऑफीसर्स एसोसिएशन और कहां मर-खप गई हैं रेल कर्मचारी यूनियनें तथा कैडर संगठन?

