सेवाविस्तार का दंश, सोशल मीडिया का डर और प्रशासनिक हताशा: सीजेपी आंदोलन से सरकार ने कुछ नहीं सीखा!
सेवाविस्तार (#Extension) की कुनीति, सोशल मीडिया पर अत्यधिक निर्भरता, और सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों की अनदेखी—प्रशासन के ढ़ांचे तथा युवाओं की मनोदशा को गहराई से प्रभावित कर रही है। सीजेपी जैसे आंदोलन केवल छात्रों के असंतोष का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह व्यवस्था से हताश सरकारी तंत्र और उनके परिवारों के अंदर सुलग रहे आक्रोश का प्रस्फुटन हैं!
सरकार ने ‘कॉन्ट्रैक्ट सीआरबी’ को लगातार तीसरी बार ‘कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन’ देकर एक ऐतिहासिक भूल की है। एक अत्यंत अक्षम और अयोग्य सेवानिवृत्त अधिकारी को यह तीसरा एक्सटेंशन—वह भी एक महीना पहले—देकर सरकार ने न केवल जन-आकांक्षाओं पर पानी फेरा है, बल्कि जनता के भरोसे और विश्वास को भी गहरी चोट पहुँचाई है। सरकार के इस रवैये से लगभग 12 लाख रेलकर्मियों और करोड़ों रेलयात्रियों के बीच घोर निराशा, हताशा और असंतोष का पनपना स्वाभाविक है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सरकार ने हालिया अप्रिय घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया।
सीजेपी (#CJP) आंदोलन से भी सरकार ने कोई सीख नहीं ली। चापलूस और अयोग्य अधिकारियों को बढ़ावा देने और सोशल मीडिया को आवश्यकता से अधिक तवज्जो देने का ही दुष्परिणाम था यह आंदोलन। जब सरकार स्वयं फेसबुक, ट्विटर (X) और इंस्टाग्राम जैसे विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को आवश्यकता से अधिक महत्व देती है, तो एक प्रकार से वह अपनी शक्तियां और नियंत्रण विदेशी ताकतों के हाथों में सौंप देती है। इस आसक्ति से सरकार जितनी जल्दी बाहर निकले, उतना ही बेहतर होगा। कोई भी व्यवस्था या सरकार सोशल मीडिया के रुझानों से नहीं, बल्कि मजबूत प्रशासनिक तंत्र, उत्तरदायित्व और नियमों से चलती है।
सरकार को अपने प्रशासनिक तंत्र को मजबूत करना चाहिए और उस पर भरोसा रखना चाहिए। स्थिति यह हो गई है कि वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर निचले स्तर का कर्मचारी तक सोशल मीडिया के भय में काम कर रहा है। काम करने के बजाय कर्मचारियों की पूरी ऊर्जा इस बात में लग रही है कि कहीं सोशल मीडिया के किसी आकलन में वे गलत न ठहरा दिए जाएं। सोशल मीडिया को दी जा रही इस अनावश्यक प्राथमिकता ने पूरे सरकारी तंत्र के आत्मविश्वास और काम करने की इच्छाशक्ति को ध्वस्त कर दिया है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग (#CVC) के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी संवेदनशील पद पर कोई भी सरकारी सेवक 3-4 वर्ष से अधिक समय तक तैनात न रहे। यदि यही नियम मंत्रियों पर भी लागू हो—जो अपने-अपने विभागों के एक प्रकार से सीईओ हैं—तो उन्हें भी एक पद पर लंबे समय तक नहीं रहना चाहिए। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि कॉन्ट्रैक्ट पर कार्यरत किसी अधिकारी को लगातार तीसरा एक्सटेंशन कैसे दिया जा सकता है?
#Ep232: समय पर नहीं चेतती मोदी सरकार!
यदि पदों का समय पर परिवर्तन हो, तो पंक्ति में खड़े अन्य योग्य अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अवसर मिलेगा। इतिहास गवाह है कि लंबे समय तक एक ही पद या मंत्रालय में रहने से विवाद, बदनामी और फजीहत ही हाथ आती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सड़क एवं परिवहन मंत्रालय है; यदि एक-दो वर्ष पूर्व मंत्री जी ने अपना मंत्रालय छोड़ दिया होता, तो इतिहास उन्हें एनडीए के सबसे सफल और लोकप्रिय मंत्रियों में गिनता। परंतु अब परिस्थितियां विपरीत हो रही हैं और उनकी घटती लोकप्रियता किस स्तर पर जाकर रुकेगी, यह कह पाना कठिन है।
CJP आंदोलन को देखकर सरकार को समझ जाना चाहिए था कि युवाओं और आम जनता में व्यवस्था के प्रति किस हद तक आक्रोश व्याप्त है। इस आंदोलन का एक बड़ा सत्य यह भी है कि यदि उपद्रवियों और राजनीतिक तत्वों को अलग कर दिया जाए, तो आंदोलन में शामिल अधिकांश वास्तविक छात्रों के माता-पिता स्वयं सरकारी कर्मचारी या अधिकारी हैं। ये बच्चे अपने घरों की विषम आर्थिक-मानसिक स्थिति भी देख रहे हैं और अपने अनिश्चित भविष्य को भी। यही दोहरी दुर्दशा उन्हें सड़कों पर उतरने और अपनी सामूहिक शक्ति का अहसास कराने के लिए बाध्य करती है।
सरकार शायद अपने ही अधिकारियों और कर्मचारियों के भीतर पनपते असंतोष को देख नहीं पा रही है या अपने अहंकार में इसे समझने से इनकार कर रही है। वर्तमान में सरकारी कर्मचारियों में जो मोहभंग और आक्रोश है, वैसा शायद पिछले 40 वर्षों में कभी नहीं देखा गया। बच्चे अपने नौकरीपेशा माता-पिता की झल्लाहट और असहायता को देखकर सरकार के प्रति पहले ही नकारात्मक दृष्टिकोण बना चुके थे; ऐसे में नीट (#NEET) जैसे मुद्दों ने आग में घी का काम किया।
#Ep233: रेल में CBI की बहार—IRCTC, ECR, NER, SER—किसी के चेहरे पर शर्म तक नहीं!
सरकार को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि CJP आंदोलन केवल युवाओं या छात्रों का था। यह वास्तव में सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों का भी एक परोक्ष आंदोलन था, जिसमें सरकारी कर्मचारी-अधिकारी पर्दे के पीछे थे। यदि सरकार अब भी चेत नहीं पाई, तो कर्मचारियों के धैर्य का बांध टूटने पर वे स्वयं सड़कों पर होंगे। तब उन्हें इस बात की चिंता नहीं होगी कि उनका नेतृत्व कौन कर रहा है—चाहे वह कोई ‘रोडी’ हो, अन्ना हजारे हों, या कोई अन्य मुखर विरोधी चेहरा।
यदि सरकार इंटेलिजेंस ब्यूरो (#IB) या अन्य खुफिया संस्थाओं के माध्यम से अपने कर्मचारियों के वास्तविक असंतोष का निष्पक्ष आकलन करा ले, तो उसे आभास हो जाएगा कि आने वाला समय कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि सरकार सभी विभागों के असंतोष का सही आकलन करके समय पर मंत्रिमंडल और प्रशासनिक फेरबदल कर लेती, तो शायद CJP जैसे आंदोलनों को इतना व्यापक जनसमर्थन नहीं मिलता।
सेवानिवृत्त हो रहे अधिकारियों को बार-बार एक्सटेंशन देकर शीर्ष पदों पर बिठाना जनता के बीच अत्यंत नकारात्मक संदेश भेज रहा है। जनता भली-भांति समझती है कि ऐसा केवल इसलिए किया जा रहा है ताकि ‘रबर स्टैंप’ अधिकारी मिले, जो सही-गलत या नैतिक-अनैतिक का विचार किए बिना केवल आदेशों का पालन करें।
एक्सटेंशन की इस नीति ने उन सभी संभावनाओं और प्रोत्साहनों को समाप्त कर दिया है, जो किसी निष्ठावान कर्मचारी को बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। रेलवे में विभिन्न बैचों और सेवाओं के कई सक्षम एवं कर्मठ अधिकारियों—जिन्होंने अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष रेलवे को दिए—का करियर उस शीर्ष पद तक पहुँचने से पहले ही समाप्त कर दिया गया, जिसके वे वास्तविक हकदार थे।
प्रशासनिक ढ़ांचा प्रोत्साहन से चलता है—#PHOD इस उत्साह से कार्य करता है कि वह #GM बनेगा; GM इसलिए मेहनत करता है कि उसे बोर्ड मेंबर बनने का अवसर मिलेगा; और मेंबर इसलिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देता है, ताकि वह #CRB बन सके। परंतु यदि ये पद दो-तीन वर्षों के लिए एक्सटेंशन के कारण अवरुद्ध हो जाएंगे, तो इस व्यवस्था में काम करने का उत्साह किसके पास बचेगा? ऐसी दिशाहीन और गतिहीन व्यवस्था से प्रशासन में असंतोष और आक्रोश के अलावा और क्या उत्पन्न हो सकता है?
सरकारी कर्मचारी और उनके परिवार स्पष्ट देख रहे हैं कि एक तरफ 60 वर्ष की आयु के बाद भी चहेते अधिकारियों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखकर एक्सटेंशन दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम कर्मचारियों को समय से पहले निकालकर या पदोन्नति से वंचित कर सरकार ‘ईमानदारी’ का ढ़ोंग कर रही है। CJP का विरोध प्रदर्शन इसी दोहरे रवैये की एक झलक मात्र है। यदि सरकार इस चेतावनी को समझ गई तो उचित है, अन्यथा परिणाम समय तय करेगा।
निचले स्तर का कर्मचारी सब देख रहा है कि फैसले क्यों और किसके लाभ हेतु लिए जा रहे हैं। शीर्ष स्तर पर होने वाले बड़े खेल से नीति-निर्माताओं का कुछ नहीं बिगड़ता, परंतु बिगड़ती प्रशासनिक व्यवस्था की आंच सीधे आम कर्मचारी के घर तक पहुँचती है। वेतनभोगी वर्ग होने के कारण वे न तो टैक्स छुपा सकते हैं और न ही बढ़ती महंगाई से बच सकते हैं। सीमित वेतन में परिवार का पालन-पोषण और बच्चों की पढ़ाई ही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
कर्मचारियों के बच्चे अपने माता-पिता के इस मानसिक द्वंद्व और लाचारी को देख रहे हैं। अपने भविष्य को दांव पर लगा देखकर ही वे सड़कों पर उतरे हैं और उन्होंने एक स्पष्ट संदेश दिया है। देश को मोदी जैसे प्रधानमंत्री की आवश्यकता है, परंतु प्रधानमंत्री का पद और उसकी साख बनी रहे—इसके लिए समय-समय पर मंत्रियों और अधिकारियों का परिवर्तन अति आवश्यक है। यही इस संपूर्ण आंदोलन का निहितार्थ और संक्षिप्त संदेश है।

