रेलवे में “तीज” के नाम पर संस्थागत कदाचार और प्रशासनिक एवं वित्तीय अनियमतताओं का संकट
रेलवे में तीज की बहार आने वाली है। “तीज” का त्यौहार भारतीय रेल में वह स्थान रखता है जो शायद बाकी देश में ‘गणतंत्र दिवस’ या ‘स्वाधीनता दिवस’ रखता है!
यह बहार क्यों न हो, कार्यक्रम भी तो महिला मंडल का होता है। और ये तो सब जानते ही हैं कि महिला मंडल पर मालिकाना हक सबसे बड़ी वाली मैडम का होता है—मतलब उस जोन के सबसे बड़े अधिकारी की पत्नी का—अर्थात् चेयरमैन/रेलवे बोर्ड, महाप्रबंधक और मंडल रेल प्रबंधक – ये तीन प्राणी हैं जिनकी श्रीमती जी क्रमशः रेलवे बोर्ड, जोन और डिवीजन स्तर पर इस महिला मंडल यानि महिला कल्याण संगठन (#WWO) की पदेन अध्यक्ष होती हैं।
इनके साथ एक सचिव और एक कोषाध्यक्ष भी होता है। और इन तीनों के हाथ में होती हैं करोड़ों की फिक्स्ड डिपाजिट और उससे आने वाली वार्षिक ब्याज की इनकम जो दसियों लाख की होती है। अब प्रश्न यह है कि इस पैसे को साल-दर-साल कैसे खर्च किया जाता है? दशकों पहले जब रेल ही एक बड़ी संस्था थी तो शायद इसका औचित्य था कि महिलाओं को छोटा रोजगार दे दिया, या छोटा स्कूल चलवा दिया, लेकिन आज यह बिल्कुल अप्रासंगिक हो चुका है—पूरी तरह से—तो फिर ये पैसा जाता कहाँ है?
मैडम की संपूर्ण-सर्वांग साज-सज्जा, मैडम और बड़े साहब के सोशल नेटवर्किंग पर, बड़े साहब और मेमसाहब को जन्मदिन, अन्य अवसरों पर महँगे गिफ्ट—और नहीं तो क्या ऐसे ही साहब एक ही शहर दशकों के भाव से पकड़े रहते हैं?
रेल में तीज ही मात्र एक ऐसा त्योहार या अवसर होता है जब पूरे साल में महिला कल्याण संगठन की कमाई में से सबसे बड़ा “हिस्सा-बांट” बड़े साहब और मैडम का होता है। न्यौते (इंविटेशन) महंगी गिफ्ट के साथ कई हजारों के बाँटे जाते हैं—मैडम जी, यानि ‘बड़ी बी’ ड्राइंग रूम में आएँगी, फिर वह गिफ्ट का साइज देखकर तय करती हैं कि क्या गिफ्ट आया है और कार्यक्रम में जाना है कि नहीं। अब मैडम जाएंगी तो अकेली तो नहीं ही जाएंगी, साहब भी जाएँगे सलून लगाकर—तो साहब का इंस्पेक्शन, बीबी जी की पार्टी और गुलामों का बैंड बजेगा।
फिर जब ‘बड़ी बी’ आएंगी तो साहब को ऑफिस से, बीबी जी को महिला मंडल से, फिर दोनों को क्लब से बड़े और महंगे गिफ्ट दिए जाएँगे। इस प्रकार ये आश्वासन होता है कि #APAR बढ़िया रहेगी, जहाँ पोस्टिंग चाहिए वहाँ मिल जाएगी, साहब, बीबी और गुलाम—फिर तीनों एक लंबे समय तक सुखरूप रहेंगे।
प्रश्न यह है कि क्या सारे गिफ्ट केवल महिला मंडली के ब्याज से आ जाएँगे? नहीं! उसमें तो अपनी लोकल मैडम की लाली, गहने, साड़ी इत्यादि ही आ पाती है, बाकी तो आजकल हर ब्रांच ऑफिसर के पास बड़े ठेके और ठेकेदार तो हैं ही!
हम किसी त्यौहार को मनाए जाने के विरोधी नहीं हैं, लेकिन सामंती सोच से मनाए जाने वाले ढ़की-छिपी लूट-खसोट के ये प्रकरण किसी भी तरह से उचित नहीं हैं। कितनी दबी कुंठाएँ हैं कि तीज से तीन हफ्ते पहले ही तीज मन गई कलकत्ता में। मतलब यह कि आने वाली मैडम को तीज का गिफ्ट तो अब नहीं मिलेगा, वह तो जाने वाली मैडम ले गईं!
जिस तरह से अब महाप्रबंधक, सालाना जीएम इंस्पेक्शन प्रोफेशनल ढ़ंग से कर रहे हैं, बिना पत्नियों के साथ, वैसे ही ये त्यौहार भी, त्यौहारों की तरह से मनने चाहिए! क्योंकि रेलवे में तीज उत्सव के नाम पर जिस प्रकार की गतिविधियाँ देखने को मिल रही हैं, वे गंभीर प्रशासनिक, नैतिक एवं वित्तीय प्रश्न खड़े करती हैं। यह अत्यंत चिंताजनक है कि एक सांस्कृतिक कार्यक्रम को धीरे-धीरे एक ऐसे आयोजन का स्वरूप दे दिया गया है, जिसकी तैयारियाँ दो-तीन महीने पहले से शुरू हो जाती हैं और जिसमें बड़ी संख्या में रेलकर्मियों को उनके मूल एवं महत्वपूर्ण दायित्वों से हटाकर केवल कार्यक्रम की व्यवस्थाओं में लगा दिया जाता है। यह न केवल सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग है, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई से संचालित संस्था (रेलवे) के मूल उद्देश्यों के साथ भी धोखाधड़ी है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि ऐसे आयोजनों के लिए कर्मचारियों एवं ठेकेदारों से लाखों रुपये की धनराशि अनौपचारिक एवं अवैध रूप से एकत्रित की जाती है, अर्थात् उगाही की जाती है। यदि कोई ठेकेदार रेलवे में काम पाने, भुगतान में अनावश्यक बाधाओं से बचने अथवा अधिकारियों को अप्रसन्न न करने के भय से आर्थिक सहयोग देने के लिए विवश होता है, तो यह स्वैच्छिक योगदान नहीं, बल्कि एक प्रकार का संस्थागत दबाव माना जा रहा है। यही हाल अधिकारियों का भी है, जिनके वेतन से कई जोनों में एक तय राशि महिला संगठन के नाम पर काट ली जाती है। जो अधिकारी यह योगदान नहीं करना चाहते हैं वह भी मजबूरीवश कर रहे हैं। यह निष्पक्ष एवं पारदर्शी प्रशासन की भावना के सर्वथा विपरीत है।
यह भी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वरिष्ठ अधिकारियों के पारिवारिक कार्यक्रमों (बेटी-बेटा की शादियों) अथवा सामाजिक आयोजनों (घरेलू कार्यक्रमों) के लिए विभिन्न मंडलों के कर्मचारी महीनों तक व्यवस्थाओं में लगे रहते हैं। रेल प्रशासन का उद्देश्य यात्रियों की सुरक्षा, आधारभूत संरचना का विकास एवं जनसेवा है, न कि सरकारी संसाधनों का उपयोग किसी भी प्रकार के सामाजिक या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा प्रदर्शन के लिए करना। यदि किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन के लिए सरकारी समय, सरकारी संसाधन, कर्मचारियों की सेवाएँ तथा ठेकेदारों से एकत्रित धन का उपयोग किया जा रहा है, तो यह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जाँच का विषय बनता है। यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि:
- ऐसे आयोजनों के लिए धनराशि का स्रोत क्या है?
- क्या कर्मचारियों एवं ठेकेदारों से प्राप्त धनराशि का कोई अधिकृत लेखा-जोखा उपलब्ध है?
- कार्यक्रम की तैयारियों में कितने कर्मचारी एवं कितने मानव-दिवस (Man-days) लगाए जाते हैं?
- क्या किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा इसके लिए औपचारिक स्वीकृति प्रदान की जाती है?
- कितने सरकारी वाहनों, कार्यालयों एवं अन्य संसाधनों का उपयोग इन आयोजनों में किया जाता है?
यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इस संस्था को कार्यालय, और कर्मचारी किस नियम के तहत उपलब्ध कराए गए हैं। रेलवे कोई निजी संस्था नहीं है। यह देश की सार्वजनिक संपत्ति है और इसके प्रत्येक कर्मचारी का प्रथम दायित्व जनहित एवं रेल प्रशासन के प्रति है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर यदि सरकारी कार्य प्रभावित हों, ठेकेदारों से अवैध धन संग्रह हो तथा कर्मचारियों का महीनों तक दुरुपयोग किया जाए, तो इसे केवल परम्परा या उत्सव का नाम देकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे मामलों की उच्चस्तरीय एवं समयबद्ध जाँच कर दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, जिससे सार्वजनिक संस्थाओं की गरिमा, पारदर्शिता एवं जवाबदेही बनी रहे। इसके अलावा इस संस्था को रेलवे से खत्म करने पर अविलंब विचार किया जाना चाहिए।

