रेल संरक्षा बनाम परिचालन का दबाव: गिरते मास्ट और सिस्टम की विफलता
प्रस्तुत है भारतीय रेल के परिचालन (#Operations) और रखरखाव (#Maintenance) के बीच बढ़ते तनाव और संरक्षा-सुरक्षा से जुड़े गंभीर समझौतों का एक तीखा विश्लेषण। यहाँ व्हिसलब्लोअर इनपुट का एक संक्षिप्त आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
यह इनपुट रेलवे के भीतर एक ‘सिस्टमेटिक फेलियर’ की ओर इशारा करता है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- प्राथमिकता का संकट: रेल प्रशासन ‘समयबद्धता’ (#Punctuality) और ‘ट्रैफिक’ को संरक्षा और रखरखाव से ऊपर रख रहा है। “ब्लॉक माँगना—गुर्दा माँगने जैसा है” यह मुहावरा जमीनी स्तर पर काम करने वाले इंजीनियरों की हताशा को दर्शाता है।
- नेतृत्व की विफलता: शीर्ष प्रबंधन (#CRB और #GMs) के पास नीतियां तो हैं, लेकिन वे डिवीजनों में परिचालन और रखरखाव विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने में विफल रहे हैं।
- संसाधनों का अपव्यय: हजारों करोड़ की मशीनें (#Track & #TRD) खरीदी गई हैं, लेकिन यदि उन्हें काम करने के लिए ‘ब्लॉक’ ही नहीं मिलेगा, तो यह निवेश पूरी तरह से व्यर्थ है।
- मानवीय मूल्य बनाम आंकड़े: धनबाद की घटना का उल्लेख यह बताता है कि परिचालन के दबाव में कर्मचारियों की जान जोखिम में डालना, यह एक खतरनाक परंपरा बनती जा रही है।
आज मंगलवार, 21 अप्रैल को नागपुर मंडल, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में निर्माण कार्य के दौरान ओएचई (#OHE) पर एक पोल (#Mast) के गिरने की घटना ने भारतीय रेल के सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है। हालांकि इस घटना में कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन इसने एक मौलिक प्रश्न खड़ा कर दिया है: जब रेल प्रशासन स्वयं अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहा, तो यात्रियों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
कई वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि #CRB साहब अपनी रिव्यू मीटिंग्स में प्रोजेक्ट ऑर्गेनाइजेशंस और ओपन लाइन के मेंटेनेंस विभागों को आश्वस्त करें कि काम करने के लिए स्पष्ट ब्लॉक मिलेगा और ये सुनिश्चित करना सभी जीएम की जिम्मेदारी है। वहीं फील्ड स्टाफ इस पर बहुत स्पष्टता से कहता है कि सभी फील्ड मेंटेनेंस ब्रांचेज को अपने हिस्से का काम करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।
ब्लॉक के लिए ‘कुश्ती’ और जान का जोखिम
रेलवे के गलियारों में यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ट्रैक या बिजली के तारों (ओएचई) के रखरखाव के लिए ‘ब्लॉक’ (ट्रेनों की आवाजाही रोकना) मिलना कितना कठिन हो गया है। इनपुट बताते हैं कि कुछ साल पहले धनबाद मंडल में पांच मजदूरों की मौत का मुख्य कारण यही था कि काम का दबाव अधिक था और सुरक्षित ब्लॉक की कमी थी। जब ऑपरेटिंग विभाग से ब्लॉक माँगा जाता है, तो इसके अधिकारी ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उनसे उनका ‘गुर्दा’ माँग लिया गया हो।
नीतियों और धरातल के बीच की खाई
रेल भवन में बैठे उच्चाधिकारी बड़े-बड़े मैन्युअल और कोड साइन करते हैं, लेकिन डिवीजन स्तर पर यह सब एक ‘नाटक’ बनकर रह जाता है। ‘रोलिंग ब्लॉक’ का प्रोग्राम कागजों पर तो शानदार दिखता है, लेकिन हकीकत में हर दिन ब्लॉक के लिए मीटिंग्स में अधिकारियों के बीच ‘दो-दो हाथ’ होते हैं। जबकि सबको पता है कि बिना काम किए मेजरमेंट बुक (MB) नहीं भरी जा सकती और पेमेंट भी नहीं हो सकता—फिर इतने बड़े काम जो रेल में हो रहे हैं, वो कैसे होंगे?
- ट्रैफिक का दबाव: जोनल हेडक्वार्टर्स में बैठे ट्रैफिक बॉसेस अपने जूनियर अफसरों पर इतना दबाव बनाते हैं कि मेंटेनेंस का काम या तो अधूरा छूट जाता है या जोखिम के साथ किया जाता है।
- मशीनों की बर्बादी: ट्रैक और टीआरडी की आधुनिक मशीनों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। यदि इन मशीनों को चलने का समय ही नहीं मिलेगा, तो ये जंग खाकर सरकारी खजाने पर बोझ ही बनेंगी। आसनसोल की दुर्घटना इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ वर्षों से मशीनें नहीं चलाई गई थीं।
रोलिंग ब्लॉक की सच्चाई दुखी कर देने वाली है, ऐसा बहुत से वरिष्ठ अधिकारियों और सुपरवाइजर्स का कहना है। उनका यह भी कहना है कि ये प्रोग्राम बनता अवश्य है, लेकिन ब्लॉक तो रोज की मीटिंग में छीना-झपटी के बाद ही मिलता है। आसनसोल की दुर्घटना—जिसके कारण DRM का स्थानांतरण हुआ था—उस सेक्शन में—जानकार बताते हैं कि कई सालों से ट्रैक मशीन चली ही नहीं थी!
विद्युत विभाग: एक ‘रिसेट’ की जरूरत
भारतीय रेल का तेजी से विद्युतीकरण (2x25kV) हो रहा है। बिजली से चलने वाली रेल भले ही सस्ती और तेज हो, लेकिन इसका मेंटेनेंस अत्यंत संवेदनशील है। यहाँ एक छोटी सी लापरवाही धनबाद जैसी बड़ी त्रासदी को जन्म दे सकती है। विद्युत विभाग में अब ‘रिसेट’ बटन दबाने का समय आ गया है, जहाँ पैसेंजर और असेट्स की संरक्षा सुरक्षा को परिचालन के आंकड़ों से ऊपर रखना आवश्यक हो गया है।
निष्कर्ष:
आज हुई नागपुर मंडल, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अक्षम नेतृत्व और परिचालन के अंधे दबाव ने फील्ड स्टाफ को असुरक्षित माहौल में काम करने पर मजबूर कर दिया है। यदि समय रहते जीएम और रेलवे बोर्ड ने ब्लॉक आवंटन और मेंटेनेंस विभागों को सुरक्षा का आश्वासन नहीं दिया, तो भविष्य की राह और भी पथरीली हो सकती है।

