पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन में लंबित ‘सिस्टम क्लीन-अप’
1. लेखा विभाग पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और अधूरा न्याय
पिछले कुछ महीनों में पूर्व मध्य रेलवे के महेन्द्रूघाट (पटना) स्थित निर्माण संगठन कार्यालय में सीबीआई की छापेमारी के बाद हड़कंप मच गया था। इसके बाद महाप्रबंधक द्वारा लेखा विभाग (#Accounts Department) में वर्षों से एक ही जगह जमे लेखा कर्मियों को हटाकर एक सराहनीय कदम उठाया गया। कर्मचारियों और जनता के बीच यह संदेश गया कि अब “रोटेशन ट्रांसफर” और “पारदर्शिता” का युग लौटेगा। लेकिन, तीन महीने बीत जाने के बाद भी यह कार्रवाई केवल एक विभाग तक सिमट कर रह गई है। इसे सिस्टम की प्रशासनिक विफलता के रूप में देखा जा रहा है।
2. ‘सेंसिटिव पोस्ट’ पर रोटेशन का अभाव
रेलवे बोर्ड और केंद्रीय सतर्कता आयोग (#CVC) के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि ‘संवेदनशील’ पदों पर बैठे कर्मचारियों का रोटेशन निश्चित अंतराल पर होना चाहिए। इसके बावजूद, निर्माण संगठन के निम्नलिखित तकनीकी विभागों में ‘जड़ता’ (Inertia) बनी हुई है:
- सिविल इंजीनियरिंग विभाग
- इलेक्ट्रिकल विभाग
- संकेत एवं दूरसंचार (S&T) विभाग
इन विभागों में दर्जनों ऐसे कर्मचारी हैं जो 5 से 10 वर्षों से एक ही सीट पर जमे हुए हैं। यह न केवल प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह भ्रष्टाचार के लिए एक “इकोसिस्टम” तैयार करता है।
3. ‘कार्य में बाधा’ का बहाना: एक सोची-समझी रणनीति
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, इन विभागों के कुछ वरिष्ठ अधिकारी अपने ‘चहेते’ कर्मचारियों को बचाने के लिए “कार्य में बाधा उत्पन्न होने” (Disruption of Work) का तर्क दे रहे हैं।
- तथ्य: किसी भी सरकारी तंत्र में कोई व्यक्ति अपरिहार्य (Indispensable) नहीं होता।
- तार्किक प्रश्न: क्या इन तकनीकी विभागों में अन्य योग्य कर्मचारी नहीं हैं? या फिर इन पुराने कर्मचारियों के पास ऐसी “विशेष गोपनीय फाइलें” या “वसूली का नेटवर्क” है, जिसे अधिकारी खोना नहीं चाहते?
यह बहाना महाप्रबंधक को गुमराह करने और व्यवस्था में सुधार को रोकने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।
4. भ्रष्टाचार का संभावित ‘नेक्सस’ और आगामी खतरे
जब कर्मचारी वर्षों तक एक ही पद पर रहते हैं, तो वे ठेकेदारों और बिचौलियों के साथ एक ‘कम्फर्ट जोन’ बना लेते हैं। लेखा विभाग की सीबीआई रेड के बाद भी तकनीकी विभागों में चुप्पी साधे रखना यह संकेत देता है कि “वसूली की मशीनरी” अब भी सक्रिय है। यदि जल्द ही इन ‘संवेदनशील’ सीटों पर बदलाव नहीं किया गया, तो विभाग को एक और CBI रेड या भारी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, जिससे रेलवे की छवि धूमिल होगी।
5. ईमानदार कर्मचारियों का मनोबल और जन-विश्वास
इस प्रशासनिक सुस्ती का सबसे बुरा प्रभाव उन ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर पड़ रहा है जो व्यवस्था में सुधार चाहते हैं।
- परिणाम: जब “तिकड़मी” कर्मचारी मलाईदार पदों पर सुरक्षित रहते हैं, तो फील्ड में कड़ा परिश्रम करने वाले कर्मचारियों का मनोबल टूटता है।
- सुझाव: व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास बहाल करने के लिए “पिक एंड चूज” (चुनिंदा कार्रवाई) की नीति त्यागकर, सभी विभागों में एक समान ‘क्लीन-अप ड्राइव’ चलाई जानी चाहिए।
निष्कर्ष:
महेन्द्रूघाट निर्माण कार्यालय को ‘पार्किंग स्लॉट’ बनने से रोकने के लिए महाप्रबंधक को उन अधिकारियों की सूची की भी समीक्षा करनी चाहिए, जो इन कर्मचारियों का बचाव कर रहे हैं। पारदर्शिता केवल एक विभाग के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए होनी चाहिए।

