रेलवे में कॉन्ट्रेक्ट डीलिंग पदों पर निर्धारित ट्रांसफर पॉलिसी का उल्लंघन

रेलवे बोर्ड द्वारा संवेदनशील पदों पर कर्मचारियों/अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में सीवीसी के दिशानिर्देशों और रेलवे बोर्ड की निर्धारित कार्यकाल (#Tenure) नीति के उल्लंघन की गंभीर स्थिति मंडलों के लेखा विभाग सहित सभी विभागों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।

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रेलवे बोर्ड की स्थापित नीति के अनुसार, काँट्रेक्ट डीलिंग से संबंधित संवेदनशील पदों पर किसी भी अधिकारी/कर्मचारी का अधिकतम कार्यकाल क्रमशः 3-4 वर्ष निर्धारित है। इस प्रावधान का उद्देश्य पीरियोडिकल #Rotation सुनिश्चित करना तथा सिस्टम में पारदर्शिता बनाए रखना है।

मंडल स्तर पर इस नीति का #Periodical Transfers के दौरान, सीट/पद परिवर्तन को मात्र एक दिखावा बना दिया गया है। कर्मचारियों/अधिकारियों को नाममात्र के लिए विभिन्न अनुभागों (व्यय/वित्त) में स्थानांतरित दर्शाया जाता है, जबकि उनका वास्तविक कार्यक्षेत्र और कार्यभार पूर्ववत कांट्रेक्टर/सप्लायर डीलिंग से ही संबंधित रहता है।

यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब किसी स्टाफ विशेष को लंबे समय से संवेदनशील पदों पर बनाए रखा जाता है। जैसे उदाहरण के लिए, एक #SSO, जो वर्तमान में व्यय अनुभाग, लखनऊ मंडल, उ.रे. में कार्यरत हैं, वर्ष 2018 से निरंतर कॉन्ट्रैक्ट डीलिंग से संबंधित कार्यभार संभाल रहे हैं, ऐसे ही कई अन्य SSO भी इस श्रेणी में शामिल हैं।

सिस्टम की यह विसंगति मंडल स्तर पर विभागीय अधिकारियों और कर्मचारी यूनियनों की मिलीभगत को दर्शाती है, जिसके परिणामस्वरूप विभाग प्रमुखों द्वारा इच्छित स्टाफ को संवेदनशील पदों पर बनाए रखने के लिए निर्धारित पीरियोडिकल ट्रांसफर पॉलिसी का उल्लंघन किया जाता है।

उधर अधिकारियों और कर्मचारियों का आरोप है कि पूर्व मध्य रेलवे के प्रिंसिपल फाइनेंस एडवाइजर (#PFA) की जाति के सारे कनिष्ठ अधिकारी (#ADFM या #AFA और सीनियर सेक्शन ऑफिसर (#SSO) अपनी-अपनी मनचाही जगहों पर विराजमान हैं या विराजमान कर दिए गए हैं—लेकिन इनकी #जाति से इतर कुछ लोग अभी भी दर-दर भटक रहे हैं।

समस्तीपुर में पदस्थापित ADFM की अभी तक नहीं सुनी गई, लेकिन PFA अपने जाति के जूनियर स्केल अधिकारियों को पटना, सोनपुर, दानापुर में उनकी सुविधानुसार घुमा रहे हैं। जो पटना से बाहर हैं—उनको भी उनकी सुविधानुसार सेटल कर रहे हैं।

“जहाँ सुविधा वहाँ एडमिनिस्ट्रेटिव ग्राउंड—जहाँ नहीं वहीं नियम-कानून!” एडमिनिस्ट्रेटिव ग्राउंड के सहारे अपने लोगों को एडजस्ट किया जा रहा है, यह सरासर गलत और मनमानी है। #CBI के मामले में भी अपनी जाति के AFA को नहीं हटा रहे हैं। सिस्टम के कोढ़ ऐसे PFA को तुरंत निकाल बाहर करना चाहिए!

यह स्थिति—स्पष्ट रूप से नीतिगत उल्लंघन, सिस्टम की विफलता, अक्षमता और सुनिश्चित-सुनियोजित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है। अतः रेलवे बोर्ड की आवधिक कार्यकाल नीति का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करने तथा उपरोक्त उदाहरणों सहित समस्त अनियमितताओं को दूर करने के लिए तत्काल जांच एजेंसियों और मंत्री जी का प्रभावी हस्तक्षेप आवश्यक है।