भारतीय रेल के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रही है कार्मिक निदेशालय, रेलवे बोर्ड की क्षेत्रीय मानसिकता
जब से #Railwhispers ने #DGHR एवं कार्मिक निदेशालय, रेलवे बोर्ड की गतिविधियों के बारे में एक विस्तृत लेख, “रेल के इतिहास में पहली बार रेलवे के सबसे भ्रष्ट और निकम्मे विभाग को आईना दिखाया गया” शीर्षक से प्रकाशित किया है, तब से पूरी भारतीय रेल के कार्मिक विभाग के कर्मचारियों का दर्द छलक आया है। उनके कई एसएमएस और व्हाट्सएप फीडबैक आ रहे हैं, और उनको पढ़कर निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि कार्मिक विभाग में सब कुछ ठीक नहीं है। #HRMS के नाम पर कार्मिक कर्मचारियों का एक अलग ही तरह का शोषण हो रहा है। एक के बाद एक डिवीजन से मैसेज आए, उनको पढ़ने से लगा कि इस विषय पर विस्तार से लिखना आवश्यक है।
भूमा मैडम, एएम/एचआर, दक्षिण भारत से हैं, आईआईटी जैसी संस्था से जुड़ी रही हैं। शायद उन्हें धरातल का ज्ञान नहीं है। भारत केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है। उसमें अन्य 29 राज्य भी शामिल हैं, जिनकी भौतिक वास्तविकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जैसे कि, कार्मिक विभाग के अधिकतर लिपिकों को बहुत अधिक अंग्रेजी नहीं आती, और न ही वह बहुत अधिक टेक-सैवी हैं। ऐसे में उनसे यह अपेक्षा करना कि वे केवल वीडियो देखकर एचआरएमएस मॉड्यूल समझ लेंगे, यह अधिकारी की अपरिपक्वता है और शायद इसी अपरिपक्वता के चलते भूमा मैडम को लेवल-17 से वंचित रखा गया है।
वैसे तो उनकी अपरिपक्वता के चलते पूरी भारतीय रेल पर खतरा मंडरा रहा है। सेफ्टी कैटेगरी की वैकेंसी भूमा मैडम की अपरिपक्वता का ही परिणाम हैं। जो भी इंडेंट्स डिवीजन भेजता था उसे बिना किसी तर्क के वह आधा कर देती थीं। आज रेलवे में यदि प्वाइंट्समैन, ट्रैकमैन, लोको पायलट्स और गार्ड्स की भयंकर कमी है, तो भूमा मैडम ही उसके लिए सीधे जिम्मेदार हैं, क्योंकि डिवीजन ने तो इंडेंट्स पूरे भेजे थे। अंदर की जानकारी ये है कि मैडम को लगता है कि यदि आरआरबी का नोटिफिकेशन निकलेगा तो बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोग रेलवे में भर जाएँगे और दक्षिण में बस जाएँगे। उत्तर भारतीयों को नौकरी मिलने से शायद मैडम के दक्षिण भारत को समस्या हो रही है?
खैर, बात करते हैं एचआरएमएस की—
कार्मिक के कई बाबुओं ने बताया कि मॉड्यूल बहुत तेजी से लांच हो रहे हैं। मॉड्यूल्स के लांच होने पर बाबुओं को कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती है। बस वीडियो से सीखना होता है। जब तक वे पहला मॉड्यूल समझ नहीं पाते हैं, दूसरा लांच हो जाता है। शायद भूमा मैडम सेवानिवृत्ति से पहले पूरा श्रेय लेने की होड़ में हैं। उन्हें यह श्रेय लेना भी चाहिए, मगर साथ में तमाम फेलियर की जिम्मेदारी भी उन्हें ही लेनी चाहिए।
इसी से जुड़ी दूसरी बात, रेलवे में हर कैटेगरी के लिए हर रेलवे में ट्रेनिंग सेंटर हैं, लेकिन कार्मिक के बाबुओं के लिए ले-देकर एकमात्र उदयपुर है, जहाँ एचआरएमएस की कोई रेगुलर ट्रेनिंग नहीं होती। मतलब दीपक तले अंधेरा। भूमा मैडम—जो ट्रेनिंग की इंचार्ज हैं—वह अपने ही विभाग को ट्रेनिंग नहीं दे पा रही हैं। मैडम ने ट्रेनिंग के ईडी पद पर बिजली विभाग के अधिकारी को चुना है। बिजली विभाग का अधिकारी ट्रेनिंग में क्या कर रहा है—यह भी एक विचारणीय मुद्दा है। उनके कार्यों की समीक्षा होनी चाहिए कि पिछले दो सालों में उन्होंने #NAIR को बंद करवाने के अलावा क्या किया? बड़ी चालाकी के साथ भूमा मैडम ने कार्मिक अधिकारियों की ट्रेनिंग को दक्षिण भारत में शिफ्ट करा दिया।
तीसरी बात, मैडम मॉड्यूल लांच करने के बाद डेटा फ्रीज कर देती हैं। आज एमपीपी और एचआरएमएस के डेटा में बहुत अधिक विसंगति है। भूमा मैडम उसको ठीक करवाने के लिए एडिटिंग पॉवर जोनल रेलों को नहीं देती हैं। उन्होंने कई बार वेस्टर्न रेलवे की पीसीपीओ मंजुला सक्सेना को वीसी में लताड़ा है, सेंट्रल रेलवे के अधिकारी सहर्ष बाजपेई को भी फटकारें पड़ीं थीं। जबकि डेटा तो एनएफआर का भी गलत था और ईस्ट कोस्ट रेलवे का भी, लेकिन उन्हें पुचकारा गया। क्या भूमा मैडम को यह नहीं समझ में आता है कि जब कोई मॉड्यूल नया-नया लांच होता है तो उसको इंप्लीमेंट करने में कई तरह की दिक्कतें आती हैं और कुछ गलतियाँ भी होती हैं? उन्हें ठीक कराने के बजाय वह अपने ही वर्ग के कुछ चुनिंदा लोगों को सबके सामने अपमानित करती हैं, यह कहाँ तक उचित है?
चौथी बात, जब कार्मिक के बाबू लोग सर्विस रिक्वेस्ट भेजते हैं, उन्हें समय से ठीक नहीं किया जाता। #Railwhispers यहाँ भूमा मैडम को चुनौती देता है कि वह पेंडिंग सर्विस रिक्वेस्ट का डेटा सार्वजनिक करें। सर्विस रिक्वेस्ट ठीक न होने से कई जोनल रेलों में प्रमोशन, ट्रांसफर पेंडिंग हो गए है, या फिर वहाँ के अधिकारी शॉर्टकट कर ई-ऑफिस पर काम कर रहे हैं और कह रहे हैं कि जब बोर्ड आपत्ति करेगा तब देखेंगे। इस व्यावहारिक बात को प्रमिला भार्गव, एएम/स्टाफ ने समझा और उन्होंने जोनल अधिकारियों को छूट दी कि जहां समस्या आ रही हो वहाँ काम न रोकें—एचआरएमएस पर एंट्री बाद में हो जाएगी। इसीलिए नॉर्दर्न रेलवे के सारे सेलेक्शन एचआरएमएस पर नहीं हुए, क्योंकि वहाँ के पीसीपीओ मिश्रा साहब ने कर्मचारी हितों को ऊपर रखा, न कि भूमा मैडम के बनाए बचकाने रूल्स को।
पांचवी बात, समस्या केवल कार्मिक बाबुओं की ही नहीं है, कर्मचारियों की भी है। ट्रांसफर को लेकर आज लोग जिस तरह से परेशान हैं, वैसा कभी नहीं हुआ। लेगेसी डेटा को पीईडी/विजिलेंस से इन्वेस्टीगेट करवाना चाहिए। बहुत से कर्मचारी—जिन्होंने पहले ट्रांसफर रिक्वेस्ट डाली थी—लेगेसी डेटा के चलते वे जूनियर दिख रहे हैं।
क्या एक अधिकारी के पागलपन पर पूरी भारतीय रेल को इस तरह छोड़ा जा सकता है? यह एक बहुत ही गंभीर प्रश्न है। सीआरबी महोदय को एक रिव्यू करना चाहिए कि जोनल रेलों ने जो इंडेंट्स भेजे थे उनमें भूमा मैडम ने किस आधार पर काट-छाँट की? यह रेलवे की सुरक्षा का ही नहीं, ये पूरे देश के लोगों के सुरक्षा-हितों से किए गए खिलवाड़ का भी प्रश्न है! यह उत्तर भारतीयों के प्रति क्षेत्रीय विद्वेष का भी प्रश्न है!
छठी बात, जैसा कि मैंने पिछले आर्टिकल में भी लिखा था। भूमा मैडम ने अरविंद की पोस्टिंग चेन्नई और अरुण रविचेट्टु की बैंगलोर में कर रखी है। इससे दिल्ली ऑफिस पर काम का दबाव बहुत अधिक बढ़ गया है। अनुराग—जो एचआरएमएस को समझ चुके थे—उन्हें उत्तर भारत का होने के कारण बाहर कर दिया गया। ये क्षेत्रीय मानसिकता भारतीय रेल के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रही है।
सातवीं बात, भूमा मैडम का व्यवहार रेलवे बोर्ड में अपने मातहतों से भी ठीक नहीं है। वह उनके हिंदी बोलने पर कटाक्ष करती रहती हैं। चूँकि वह महिला अधिकारी हैं और भारत के लोग महिलाओं का सम्मान करते हैं, इसलिए उनकी इस धृष्टता को अब तक क्षमा किया जा रहा है। क्रमशः
Please Read Once Again—“रेल के इतिहास में पहली बार रेलवे के सबसे भ्रष्ट और निकम्मे विभाग को आईना दिखाया गया”

