रेल के इतिहास में पहली बार रेलवे के सबसे भ्रष्ट और निकम्मे विभाग को आईना दिखाया गया
“उन्हें जाकर किसी गंदे नाले में डूब मरना चाहिए, वे इसी लायक हैं!”
एडिटोरियल ओपिनियन: यह इनपुट एक वरिष्ठ IRPS अधिकारी से प्राप्त हुआ है। सभी मामलों की पुष्टि अन्य अधिकारियों से बात करके की गई है। यदि किसी भी अधिकारी को लगता है कि उनका पक्ष पूर्ण रूप से नहीं आया है, तो वे हमें अपना पक्ष भेज सकते हैं। पारदर्शिता के लिए हम पूरी तरह समर्पित हैं। हमारा उद्देश्य केवल देश की इस आर्थिक धमनी—भारतीय रेल की भलाई है।
भारतीय रेल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब रेलवे के सबसे भ्रष्ट और निकम्मे विभाग—कार्मिक विभाग—को आईना दिखाया गया है। ये भ्रष्टाचार पिछले लगभग दो-तीन सालों में विशेष रूप से बढ़ा है। यह कहना है कई वरिष्ठ कार्मिक अधिकारियों का! हाल में कार्मिक शील्ड को लेकर जो विवादास्पद निर्णय लिया गया, और लगातार आंतरिक भेदभाव से आहत एवं पक्षपातपूर्ण ट्रांसफर/पोस्टिंग से दुखी ये कार्मिक अधिकारी अपने आप में काफी अपमानित महसूस करते दिखाई दिए।
उन्होंने कहा, तीन सीनियर डीपीओ—सीबीआई से ट्रैप हुए, जिनके कारनामों का खुलासा #RailSamachar और #Railwhispers ने ही किया। रेल के इतिहास में यह भी पहली बार हुआ है जब मानव संसाधन प्रबंधन (#HRM) की शील्ड किस रेलवे को दी जाए, यह स्वयं रेलवे बोर्ड का मानव संसाधन निदेशालय नहीं तय कर पाया, जिसने सभी शील्ड्स के Key Performance Indicators (#KPI) तय किए हैं।
उन्होंने बताया कि एक भ्रष्ट कार्मिक अधिकारी को डीआरएम के पद पर बैठाया गया है, जिसका नाम अयोध्या जमीन घोटाले में आया था और जिसने काली कमाई से जी. डी. गोयनका स्कूल की फ्रैंचाइजी खरीदी है। उन्होंने अब धीरे-धीरे कार्मिक की आंतरिक गतिविधियाँ बतानी शुरू कीं। उनसे बात करने का यह अवसर किसी गहरे अनुभव से कम नहीं था—
एक ईमानदार महिला कार्मिक अधिकारी को पटियाला से कोलकाता फेंक दिया गया और दूसरी तरफ एक महाभ्रष्ट कार्मिक अधिकारी को #CRIS में बैठाने का प्रयास चल रहा है। भ्रष्टाचार के चलते जिस अधिकारी की रेलवे बोर्ड की पोस्टिंग की फाइल सीआरबी ने वापस कर दी हो, उसे कार्मिक विभाग द्वारा किसी तरह दिल्ली में एडजस्ट किया जा रहा है।
उत्तर भारत के अधिकारियों को कोलकाता और भुवनेश्वर फेंका जा रहा है, वहीं दक्षिण के अधिकारियों को क्रिस दिल्ली के बजाय उनके घरों—चेन्नई और बंगलुरु—में पोस्टिंग दी गई है जिससे क्रिस दिल्ली के अधिकारियों पर काम का बहुत अधिक दबाव है और एचआरएमएस में गलतियाँ निकल रही हैं। क्रिस चेन्नई और बंगलुरु में जब कार्यालय ही नहीं था—तो पोस्टिंग कैसे?
मनचाही पोस्टिंग न मिलने से एक पीसीपीओ आधा महीना अवकाश पर रहते हैं। ऐसे निर्णयों से ईमानदार अधिकारी डेपुटेशन की तरफ भाग रहे हैं और रेलवे में नौकरी अपनी शर्तों पर हो रही है।
जोनों द्वारा भेजी गई आरआरबी इंडेंट्स की वैकेंसी को मनमाने तरीके से रेलवे बोर्ड द्वारा काट दिया जाता है जिससे रेलवे में कर्मचारियों की कमी से एक्सीडेंट हो रहे हैं।
यही नहीं, 9 जनवरी को एक भ्रष्ट रेलवे को रेलमंत्री से वार्षिक कार्मिक शील्ड दिलवाने का दुस्साहस किया गया। इसके चलते पूरे कार्मिक कैडर को शर्मसार होना पड़ा और निराशा का माहौल छाया है। क्या इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए डीजी/एचआर को वीआरएस नहीं सौंप देना चाहिए?
कार्मिक विभाग अपने निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के चरम पर है—यह कहते हुए इन वरिष्ठ कार्मिक अधिकारियों ने जो थोड़ा-थोड़ा इनपुट दिया, वह इकट्ठा करके यहाँ प्रस्तुत है—
- शुजा मोहम्मद को बंगलुरु दिया गया, जबकि उसके विरुद्ध भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामले चल रहे हैं।
- राजीव गांधी को टेन्योर के बाद भी रेलवे बोर्ड में रखा गया है, वह भी #RRB की पोस्ट पर।
- मोहन राजा को डीजी/एचआर द्वारा दिल्ली लाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि अपने रिटायर होने के बाद भी सत्ता दक्षिण के हाथ में ही रहे।
- पत्रुदु को विशाखापत्तनम में होम पोस्टिंग—पत्रुदु पर आरोप है कि वह अपनी पत्नी के फोन से पैसा माँगता है, उसको श्रीमती वी. जी. भूमा, एएम/एचआर ने पहले NDC ट्रेनिंग में एडजस्ट किया।
- मेश्राम—जिसके ऊपर सीबीआई केस था—वह आईआरपीएस को ट्रेंड करेगा?
- जबकि संजय कुमार को रिटायरमेंट के साल में भुवनेश्वर फेंका गया।
- एमसीएफ, पीएलडब्ल्यू और बीएलडबल्यू के कार्मिक विभाग के शीर्ष पर दूसरों को बैठाया गया है।
- #EDGC की पोस्ट कई महीनों से रिक्त पड़ी है, उस पर भी किसी अन्य कैडर को बैठाने की तैयारी है, जबकि #EO की पोस्ट एकाउंट्स को दे रखी है।
- मनोज कुमार को रिटायरमेंट के ठीक पहले दिल्ली से गोरखपुर हटाया गया।
- अमित पांडेय को लखनऊ से हटाने की साजिश हो रही थी, मगर मुंबई या बिहार से एक पति-पत्नी दिल्ली आए तो अफसरों को कार्यकाल से पहले हटा-हटाकर हर तरह का एडजस्टमेंट किया गया।
- पूर्व रेलमंत्री पीयूष गोयल के विरुद्ध साजिश रचने वाली लिली को जेएस इम्पैनल करवाकर जल्दी से डेपुटेशन भेज दिया गया।
- अतुल मिश्रा की आज क्या हालत है, ये किसी से नहीं छिपा, उसे पूरे भारत में नचा दिया गया।
- वहीं दक्षिण के रेड्डी की कपूरथला पोस्टिंग रद्द कर वापस सिकंदराबाद बैठा दिया गया।
- सहर्ष बाजपेयी को मध्य रेल में उसी जगह पर पीसीपीओ से सीपीओ कर दिया गया।
- #SECR में दर्शनिता को उसी जगह पर पीसीपीओ से सीपीओ कर दिया और अब फिर से #PCPO बनाने की तैयारी है।
- #NFR में टिमोथी को उसी जगह पीसीपीओ से सीपीओ कर दिया।
- #NCR में मुदित को पीसीपीओ से सीपीओ और फिर पीसीपीओ कर दिया।
- #SECR में राजेंद्र को भी पीसीपीओ से सीपीओ कर दिया, परिणामस्वरूप वह डेपुटेशन पर चले गए।
- वैभव चौहान को छह महीने में बिलासपुर से जयपुर, और फिर पटियाला भेज दिया।
- क्या बोर्ड कभी सोचता है कि उस अधिकारी की मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता होगा?
- ऐसा दक्षिण भारतीय कार्मिक अधिकारियों के साथ क्यों नहीं होता?
- रेलवे बोर्ड के अधिकारियों के दुर्व्यवहार से उत्तर रेलवे के पीसीपीओ डेपुटेशन पर भागने के लिए विवश हो रहे हैं, पहले उन्हें रेलवे बोर्ड से हटाया गया था।
- #WCR, #NER और #ECoR में 3 सीपीओ और #NCR जैसी बड़ी रेलवे में 2 सीपीओ।
- सुवर्णा जैसे सीनियर अधिकारियों को छोटा पद और उससे कहीं जूनियर को सीपीओ/एडमिन, क्योंकि उनके पति भूमा के करीबी हैं।
- अमित मेहरा को इस साल मंत्री अवार्ड क्यों मिला? कार्मिक विभाग में यह चर्चा का विषय है।
- न तो एमपीपी में कुछ खास हुआ है, न ही कोई दूसरा बड़ा काम, उससे सौ गुना अधिक काम उल्लास ने अकेले किया।
- मोनिका सिंह को हाजीपुर भेजा गया, मगर वह IIPA/Delhi से दस महीने के कथित कोर्स के बहाने दिल्ली में हैं। उनका बेटा IIT/Delhi में तृतीय वर्ष का स्टूडेंट है और वह स्वयं पचीस साल से मेंटल हेल्थ से पीड़ित हैं। उनके हसबैंड CE/DMRC हैं, इसलिए उन्हें दिल्ली में ही रहना है। संभवतः मार्च तक उनका यह कथित कोर्स समाप्त हो जाएगा, तब बोर्ड से मानसिक रोगी होने के बहाने दुबारा पोस्टिंग लेकर दिल्ली में कहीं बैठ जाना है, जबकि ऐसे लोग सिस्टम पर बोझ हैं।
- कवायद यह भी है कि आनंद मधुकर जैसे अफसर को समय से पहले डेपुटेशन से वापस बोर्ड में लाया जाए—अपने रिटायरमेंट से पहले—केवल इसलिए कि वह वहां मजा नहीं लूट पा रहा है और उसको रेलवे में वापस आकर पुनः गंदगी फैलाना है।
- #IRMS का भौकाल बनाने वाली और #IRPS केडर को पूरी तरह से ध्वस्त करने वाली अन्विता सिन्हा नाम की महिला कार्मिक अधिकारी स्वयं डेपुटेशन पर चली गई।
- आईआरपीएस के लगातार तीन बैच को शुरू में जॉइंट सेक्रेटरी (#JS) नहीं मिला, इसकी जिम्मेदारी किसकी है? ईमानदार अधिकारियों को अपने अधिकार के लिए डीओपीटी में एड़ियाँ घिसनी पड़ीं।
- शाकिर की जो फजीहत की गई है वह पूरे कैडर को पता है, #NAIR में जबरदस्ती रखा गया। फिर NAIR बंद करके उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया, आखिर उसे डेपुटेशन पर भागना पड़ा।
- ईमानदार और काम करने वाले कार्मिक अधिकारी इन दो महिलाओं के आतंक से या तो रेलवे से डेपुटेशन पर भाग रहे हैं या फिर डेपुटेशन को बढ़वा रहे हैं, ताकि इन दोनों की सूरत न देखनी पड़े।
- एक जूनियर अधिकारी को पीसीपीओ बनाने और एक बहुत जूनियर अधिकारी को सीएलडबल्यू में एडजस्ट करने के लिए एक सीनियर को भुवनेश्वर भेजा गया।
- अर्थात् सीनियर अधिकारी सीपीओ रहे और उससे दो जूनियर अधिकारी पीसीपीओ, वाह क्या गजब का कार्मिक प्रबंधन है डीजी/एचआर का!
- उद्योत झा जैसे सक्षम अधिकारी को पहले भुवनेश्वर भेजा और फिर 6 महीने में ही फिर दिल्ली से बाहर कर दिया गया, क्योंकि वह उत्तर भारतीय है।
- एचआरएमएस के चलते पूरी रेलवे की स्थिति ऐसी है कि कोई क्लर्क कार्मिक में काम नहीं करना चाहता है।
- हर दिन नया मॉड्यूल, उस मॉड्यूल में हजारों कमियाँ, उनके लिए सर्विस रिक्वेस्ट, जो कैशबैग लेकर क्रिस जाकर मिल आए—उसका काम होता है—बाकी लटके रहो। इन मॉड्यूल्स के नाम पर जो धंधा चल रहा है, वह एक अलग ही लेवल का है।
- ट्रेनिंग के नाम पर जो फर्जीवाड़ा चल रहा है, वह एक दिन अवश्य पकड़ा जाएगा। फिर सब मुँह छिपाते फिरंगे।
- रेलवे के एक रिटायर कार्मिक ऑफिसर ने ट्रेनिंग कराने की कंपनी खोली है, आरोप है कि रेलवे बोर्ड के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को सालाना लाखों रुपये चढ़ावा चढ़ाकर वह फर्जी ट्रेनिंग करवाते हैं, सारे पीसीपीओ पर नॉमिनेशन भेजने का दबाव डाला जाता है।
- इसी तरह एक और रिटायर कार्मिक अधिकारी कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (#CBT) कराने की एक कंपनी का CEO है। यह पूर्व IRPS अपने एक मार्केटिंग मातहत को जिस भी PCPO के पास डील करने भेजता है उसे पहले स्वयं फोन पर हर बात समझा देता है। इसी कारण से सीबीटी का धंधा रेलवे में खूब फलफूल रहा है! जबकि इसके लिए क्रिस से एक पैन-इंडिया सॉफ्टवेयर तैयार करवाया जाना चाहिए था, मगर जहां हर कंपनी या एजेंसी से जोन-वाइज अलग-अलग डील करके कमाई करने का उद्देश्य हो, वहां दीर्घावधि पुख्ता नीति पर विचार करने की फुर्सत किसे है?
- अभी हाल में ही भूमा मैडम ने ताज होटल में ट्रेनिंग करवाई, उसका क्या आउटपुट रहा—किसी को पता नहीं।
- डीजी/एचआर को नैतिक जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी—इतना खराब और पक्षपाती कैडर मैनेजमेंट को देखते हुए इस महिला को फौरन 56J में घर भेज दिया जाना चाहिए!
- रिजर्वेशन पॉइंट पर गलत तरीके से निर्णय देने के फैसले को डीजी/एचआर ने क्यों नहीं रोका, आज पूरे भारत के रेल कर्मचारी प्रभावित हैं।
- दूसरी मिनिस्ट्री से क्या पूछना नहीं चाहिए था उनको, बिना #DoPT को संज्ञान में लिए ये फैसला कैसे किया? कार्मिक विभाग इतना कमजोर कभी नहीं हुआ था जो आज उसकी हालत है।
- हर दिन कोई न कोई कार्यक्रम मनाना होता है दबाव में, बिना एसओपी के लाखों-करोड़ों के बिल पास हो रहे हैं, यदि जाँच हुई तो कौन जिम्मेदारी लेगा?
- सिविल विभाग अपना काम कार्मिक पर थोपता जा रहा है, क्वार्टर्स इंस्पेक्शन कमेटी में डिप्टी सीपीओ को महाप्रबंधक द्वारा अपमानित होना पड़ता है, आईओडब्ल्यू पर कार्मिक का कोई कंट्रोल नहीं, बस डाँट खाना ही अब इसका काम रह गया है।
- रेलवे क्वार्टर्स अलॉटमेंट सिविल इंजीनियरिंग विभाग करता है, डेटा कार्मिक दे—क्यों पूछते हैं कार्मिक के बाबू?
- बच्चों को सरकारी फंक्शन में भेजने का काम कार्मिक का क्यों—जब फंक्शन कमर्शियल का हो? वह भी प्राइवेट स्कूल से बच्चे? यदि एक शहर से दूसरे शहर में भेजने पर कुछ हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी?
- वही हाल कोर्ट केसेस का है, ग्रुप ‘बी’ के सेलेक्शन पर इतने सारे कोर्ट केस, क्या ये डीजी/एचआर का निर्णय नहीं था कि नोटिफिकेशन के बाद कंडीशन बदली गई? यदि हाँ, तो वह सीधे कोर्ट में क्यों नहीं अपियर होती?
- जब सीनियर स्केल और जूनियर स्केल की सारी वेकेन्सी लेकर ग्रुप ‘बी’ सेलेक्शन हुआ, तो बीच में ग्रुप ‘बी’ का ट्रांसफर कैसे एक्सेप्ट हो रहा है, क्या वेकेन्सी डिस्टर्ब नहीं होगी?
- और भूमा मैडम के एचआरएमएस का क्या मतलब जब हर बार डेटा जोन को ही भेजना पड़ता है?
कार्मिक अधिकारी बताते हैं कि इतने सारे किस्से हैं कि लिखते-लिखते एक मोटी पोथी बन जाएगी—बताते-बताते संभवतः समय भी कम पड़ जाए—इतनी हरामखोरी चल रही है रेलवे बोर्ड के कार्मिक निदेशालय के डायरेक्शन में भारतीय रेल के कार्मिक कैडर में!
जब इन वरिष्ठ कार्मिक अधिकारियों से यह कहा गया कि इतने इनपुट के सार्वजनिक होने पर एचआर डायरेक्टोरेट में बैठे अधिकारियों की तो पूरी कलई खुल जाएगी, इस पर उनका कहना था कि “उन्हें जाकर किसी गंदे नाले में डूब मरना चाहिए, वे इसी लायक हैं!”
अंत में उन्होंने केएमजी सहित डीजी/एचआर-सह-सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड और एएम/एचआर के नाम पर मुँह बिचकाते हुए फिलहाल अपनी बात का समापन किया। क्रमशः

