महाप्रबंधक ध्यान दें—बहुत सी आँखें आपको देखती हैं!
#Railwhispers ने अपने, 12 अक्टूबर के, “कुछ बेहोश हैं, तो कुछ मदहोश!” शीर्षक लेख में नए महाप्रबंधकों के कार्य-व्यवहार को लेकर चेताया था कि ओपन लाइन और प्रोडक्शन यूनिट के जीएम की भूमिका और कार्य-प्रणाली में बहुत अंतर होता है। आपके हर शब्द, हर गतिविधि, कार्यप्रणाली, व्यवहार और निर्देश के कई-कई अर्थ निकलते हैं, और हर मातहत की दृष्टि आपके प्रत्येक कार्य-व्यवहार पर टिकी होती है!
Ep129: #CRB की मंथली सेफ्टी मीटिंग और बेहोशी में चल रही व्यवस्था!
जीएम/एनसीआर को ही लें, ओपन लाइन का चार्ज सँभालने के पहले ही दिन आदेश निकाल दिया कि जूनियर अधिकारियों के चेंबरों से एसी निकाल दिए जाएँ! जब ये आदेश वायरल हो गए और खूब मजाक बन गया, और #Railwhispers ने एक्स पर तत्काल इसकी कड़ी आलोचना की, तो इस अनावश्यक आदेश को तुरंत वापस लेना पड़ा।
वहीं मध्य रेल के महाप्रबंधक ने प्रयास किया कि मीटिंग और निर्देशित हों, और चार पन्ने के निर्देश निकाले, जिनमें हफ्ते के चार दिन हेडक्वार्टर और डिवीजन के खर्च हो गए मीटिंग्स में, चार दिन निकल गए उनकी तैयारियों में—तो प्रश्न ये उठा कि हफ्ते में आठ दिन कहाँ होते हैं बॉस!
खबर है कि कल मंगलवार, 14 अक्टूबर की वीसी मीटिंग के आरंभ में ही उन्होंने यह स्पष्ट किया कि मीटिंग में वही अधिकारी रहेंगे, जिनका मैटर डिस्कशन में है। ऐसा ही मंडलों को भी करने का निर्देश दिया। इससे हेड क्वार्टर में लोगों ने बहुत राहत की सांस ली। लेकिन गुरुवार की मीटिंग की तलवार अभी भी सबके सिर पर लटकी है।
Ep132: कुछ बेहोश हैं, तो कुछ मदहोश—कुछ वीसी कल्चर से त्रस्त, तो कुछ अभ्यस्त!
उत्तर मध्य रेलवे और मध्य रेल के महाप्रबंधकों के आशय पर किसी को कोई संदेह नहीं है, जीएम/एनसीआर—जूनियर अधिकारियों को उनके चेंबरों से निकालकर फील्ड पर लाना चाह रहे थे, और मध्य रेल वाले महाप्रबंधक मीटिंग्स को दिशा देना चाह रहे हैं।
लेकिन जो हुआ, वह यह बताता है कि क्यों यह पद ऐसे हाथों में होने चाहिए, जिन्हें बड़े निर्णय लेने का पर्याप्त अनुभव हो, जिनके कंधे फील्ड को मजबूत करने में पुष्ट हुए हों! ऊपर वालों की हाँ में हाँ मिलाने से ऊँचे पद तो अवश्य मिल जाएँगे, लेकिन स्वयं के अनुभवहीन व्यवहार के चलते बीच-बीच में शर्मिंदा भी होना पड़ेगा।
#NAIR खत्म होने के बाद आज महाप्रबंधकों और डीआरएम के पास कोई ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट नहीं बचा। इन पदों पर आए नए अधिकारियों के पास केवल चेयरमैन की उबाऊ, बोझिल और लंबी मीटिंग ही गाइड करने को बची हैं। इन्हीं को चाहे रिफ्रेशर समझ लें, चाहे प्रशिक्षण! कोई आश्चर्य नहीं कि रेल के ये सौ अधिकारी—अधिकारी कम सुपरवाइजर अधिक लगने लगे हैं। यह इन पदों का डिग्रेडेशन है।
यह बात हाल में बदले गए कई डीआरएम और महाप्रबंधकों ने भी स्वीकारी है। यही कारण है कि डीआरएम फील्ड में अपने स्टाफ को मोटिवेट करने के लिए धूप में जाने के बजाए ‘लीडर्स’ ह्वाट्सऐप ग्रुप पर लाइक जुटाने पर लगे हैं। दिखावे और चापलूसी की यह नई संस्कृति रेल को रसातल में ले जा रही है।
हाल के कुछ वर्षों में बदले कई डीआरएम इसे शर्मिंदगी से देखते हैं कि यह स्कूली बच्चों जैसा रूटीन हो गया है, जहाँ केवल हेडमास्टर (सीआरबी) और क्लास टीचर (जीएम) को खुश रखना ही सबका ध्येय बन गया है। जैसे चापलूसी से भरे संदेश रेल के ये सौ वरिष्ठ अधिकारी साझा करते हैं, उससे समझ नहीं आता कि इनमें रीढ़ या स्वाभिमान बचा भी है या नहीं?
जैसे फेसबुकिये सुबह की चाय को भी ‘feeling blessed’ के कैप्शन के साथ फोटो शेयर कर देते हैं, वैसे ही रेल के ये सौ अधिकारी ‘लीडर्स’ ग्रुप पर अपनी छवि चमकाते और नंबर बटोरते दिखाई देते हैं। यह छिछली कार्य-संस्कृति रेल प्रबंधन को कहाँ ले जा रही है, इस पर अब विचार करना आवश्यक हो गया है!
आपकी कभी किसी रियल एस्टेट वाले से भेंट हुई है? वह आपको एलआईजी मकान को भी ऐसा दिखाएगा कि उसके सामने कोई आलीशान बंगला भी फीका दिखे। यही हाल रेल के इन सौ अधिकारियों के ह्वाट्सऐप ग्रुप्स का है—कुछ का मानना है कि जैसे सिंगल माल्ट की बोतल में देशी पाउच काटकर भर दिया गया है! शेष फिर कभी..!

