‘सरकार किसी की भी पर सिस्टम उनका’ की उक्ति को चरितार्थ करते हैं ऐसे पोस्टिंग ऑर्डर

जैसा हमने लिखा था, गुप्ता जी को चॉइस पोस्टिंग मिल गई है। अपने #PCOM/CR के टेन्योर में इन्होंने ट्रैफिक कैडर में जो लंबे समय से पूना-मुंबई में थे—उन्हें वहीं प्रमोट किया—भले ही दूसरे डिवीजन की गैजेटेड स्ट्रेंथ कम करके। महाप्रबंधक के छोटे कार्यकाल और लुकिंग ऑफ्टर के वायरस ने मनमानी के सारे रास्ते खोल दिए हैं।

कहीं ईमानदार अधिकारियों के कार्यकाल पूरे नहीं हो पा रहे, तो वहीं दसियों साल एक ही जगह पोस्टिंग देने की तत्परता, कोढ़ में खाज यह कि रेल मंत्रालय ऐसे अधिकारियों को ही पुरस्कृत कर रहा है। मंत्री जी यदि ऐसे ही लोगों को दिल्ली में बैठाना है—वह भी रेल भवन में—तो आपको महामृत्युंजय जाप बैठा देना चाहिए।

भुसावल मंडल में ऑपरेटिंग के खिलाफ यूनियन का प्रदर्शन इसलिए नहीं हुआ कि स्टाफ काम नहीं करना चाहता था, वह इसलिए था कि अनसेफ कंडीशन बनाकर कब तक काम करवाया जा सकता है? ‘सरकार किसी की भी पर सिस्टम उनका’ की उक्ति को ऐसे ही पोस्टिंग ऑर्डर चरितार्थ करते हैं।

गुप्ता जी के समय में लिए गए ट्रांसफर-पोस्टिंग के निर्णय सरकार की साफ-सुथरी छवि के साथ तो कम से कम मैच नहीं करते। जिनके ट्रांसफर-पोस्टिंग के निर्णय महाप्रबंधक को बदलने पड़ें—यही काफी है यह बताने के लिए कि निर्णय किस आधार पर लिए गए।

वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, “गुप्ता जी की अभी काफी लंबी सर्विस बाकी है—उनका रिटायरमेंट 2029 में है—वह काफी लंबे समय से बोर्ड में बैठने की तैयारी कर रहे थे। ऐसे में उन्हें बोर्ड में बैठाने के बजाय किसी अन्य जोन में भेजा जाना चाहिए था!” उनका यह भी कहना था कि इस तरह की चॉइस या फेवरेबल पोस्टिंग से सिस्टम का नहीं, बल्कि केवल संबंधित अधिकारियों का भला होता है!

मोदी सरकार को रेल में मात ऐसे ही अधिकारियों और उनके ऐसे निर्णयों के कारण ही मिल रही है। महीनों से रेगुलर GM नहीं—ऐसे में #PHOD निरंकुश हैं। रेल जैसे बड़े मंत्रालय में उच्च पद इतने लंबे समय तक खाली रहना सिस्टम की क्रिमिनल गलती है।