बिना सोचे-समझे बचकाने निर्णय लेने वाले अधिकारियों को तत्काल हटाया जाए!

पूर्व डीआरएम/आसनसोल सुश्री विनीता श्रीवास्तव का नया पोस्टिंग ऑर्डर रेलवे के ह्वाट्सऐप ग्रुप्स पर बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है। कई अधिकारियों ने यह ऑर्डर #Railwhispers को भी फ़ॉरवर्ड किया। हालाँकि ये ऑर्डर रेलवे बोर्ड की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है, तथापि इसके सही होने की पुष्टि कर ली गई है।

तो सुश्री विनीता श्रीवास्तव बहाल हो रही हैं, लेकिन उनको ट्रांसफर किया जा रहा है आसनसोल से मुरादाबाद—तकनीकि रूप से पश्चिम मध्य रेलवे (#WCR) के कैडर से। शायद रेलवे बोर्ड को समझ आ गया कि कोर्ट में उसकी स्थिति बहुत कमजोर है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने बोर्ड की प्रशासनिक शुचिता और निर्णय लेने की योग्यता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है—जैसा कि एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “it reeks of administrative immaturity.”

यदि गलती समझ में आ गई अथवा कोर्ट के डर से बोर्ड ने यू-टर्न लिया गया है तो ये माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी और रेलमंत्री जी के लिए एक बड़ी चेतावनी के संकेत हैं-तुरंत उन अधिकारियों को नापा जाए जिन्होंने ये निर्णय बिना सोचे-समझे लिया।

इसके साथ ही मुरादाबाद के अपदस्थ DRM, संग्रह मौर्य की क्या गलती? लगे हाथ क्या उन्हें बहाल इसीलिए नहीं किया गया, क्योंकि वह कोर्ट नहीं गए या आकर आपके चरणों में दंदवत नहीं हुए-गिड़गिड़ाए नहीं-आपकी चिरौरी-विनती नहीं की, बल्कि एक अनुशासित अधिकारी की तरह प्रशासनिक आदेश का पालन कर लिया? तो गलती आपने की है तो उसे सुधारना भी आपको ही पड़ेगा!

रेलमंत्री जी ये कितनी खराब मैसेजिंग है-डीआरएम वर्किंग भले ही जीएम या बोर्ड मेंबर बनने के लिए आपने अनिवार्य नहीं रखा, लेकिन जो यह यू-टर्न कराने वाले अधिकारी सोचते हैं, ध्यान दीजिये यही पद आपकी पूरी रेल व्यवस्था की प्रशासनिक धुरी है। इसके साथ ऐसा व्यवहार आपके जमीनी नियंत्रण को कमजोर करता है और आज लाखों करोड़ के निवेश के बाद भी जो किरकिरी हो रही है वह ऐसे ही बिना आधार वाले अयोग्य सलाहकारों के कारण हो रही है।

हम पिछले कई सालों से कह रहे हैं-ये आपकी जिम्मेदारी है कि अपने सबसे कर्मठ, निष्ठावान और राष्ट्रवादी अधिकारियों को चिह्नित करें। सरकार और पार्टी का नेटवर्क इस जानकारी को सहजता से निकाल सकता है। खैर, ये आपका निर्णय है।

जब रेल मंत्रालय ने विवादित मानव संसाधन शील्ड रोक दी, वहीं इस औद्योगिक स्तर के भ्रष्टाचार के प्रणेता तत्कालीन वड़ोदरा और अहमदाबाद के डीआरएम—जो क्रमशः रेल भवन में और आसनसोल में बैठाए गए हैं—उनको वहाँ से तत्काल हटाया जाना चाहिए, यह हमारी पुरजोर मांग है।

तकनीकी और कानूनी तौर पर, जब किसी मामले का न्यायालय संज्ञान ले रहा हो और स्थगन आदेश अभी भी लागू हो, तो प्रतिवादी—न्यायालय की अनुमति के बिना ओरिजनल अप्लीकेशन (#OA) के आवेदक से संबंधित कोई भी आदेश पारित नहीं कर सकता। लेकिन रेलवे बोर्ड पूरी तरह से बेवकूफों द्वारा चलाया जा रहा है जिन्हें कुछ भी नहीं पता, यहां तक कि कानूनी मामलों को भी वे घटिया तरीके से संभालते हैं।

अदालती मामले सेक्रेटरी/रेलवे बोर्ड के अधीन होते हैं। जब किसी आईआरपीएस को सेक्रेटरी के पद पर नियुक्त किया जाता है, तो उससे कम से कम निर्धारित प्रक्रियाओं की जानकारी होने की अपेक्षा की जाती है। डीआरएम/आसनसोल के अदालती मामले को जिस तरह से संभाला गया है, उससे रेलवे बोर्ड के सेक्रेटरी-सह-डीजीएचआर के पेशेवर ज्ञान पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।