डटकर निर्णय लें—मैं आपके साथ खड़ा हूँ ! -लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी

आदरणीय मोदी जी, लात क़िले की प्राचीर से 15 अगस्त का आपका भाषण और उसमें किए आव्हान ने दिनकर जी की अमर पंक्तियों को याद दिला दिया:

भग्न मंदिर बन रहा है, स्वेद का जल दो।

रश्मियाँ अपनी निचोड़ो, ज्योति उज्ज्वल दो।

प्रधानमंत्री मोदी जी का भाषण यहाँ सुनें:

प्रधानमंत्री मोदी जी का वक्तव्य यहाँ पढ़ें:

https://indianexpress.com/article/india/pm-modi-independence-day-2025-speech-full-text-10191069/

मोदी जी, इस अनिश्चितता के समय में—जब देश के स्वाभिमान को चुनौती मिली है—देश अपने 2014 वाले मोदी को चाहता है—और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आपके भाषण में हुए सीधे संवाद में वही दिखा। आपने कितना सही कहा—हमें लाइन लंबी खींचनी है—नकारात्मकता के दौर में यही एकमात्र रास्ता है।

आपने कितना सही कहा, “देश में टैलेंट की कमी नहीं!” लेकिन प्रश्न ये है कि क्या टैलेंटेड अधिकारी कमांड पोजीशन में हैं? यदि कर्मठ टैलेंटेड देशभक्त आगे आने हैं, तो पहले उनके लिए जगह बनानी होगी!

#Railwhispers और #RailSamachar का फोकस 1997 से लगातार भारतीय रेल पर ही रहा है। अपने अनुभव से हमें ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि जितना निवेश आपने रेल में पिछले 10-11 सालों में किया है, उस इंटेंसिटी का निवेश 1853-2014 तक नहीं हुआ था।

ऐसे में प्रश्न यह है—कौन है असली लाभार्थी?

मोदी जी, क्या आपने सोचा है कि कौन आपके रिकॉर्ड निवेशों का असली लाभार्थी है? वह हैं रेल के खान मार्केट गैंग (#KMG) के सदस्य अधिकारीगण। रेल में बदबूदार शौचालयों में बैठकर यात्रा करने के लिए मजबूर आपका वोटर तो रेल में किए गए आपके असीम निवेश का लाभार्थी अब तक तो नहीं बन पाया है।

हमने रेल के टॉप सौ रोल्स को चिह्नित किया—रेलवे बोर्ड सदस्य गण, महाप्रबंधक और डीआरएम। यदि ये लोग ह्वाट्सऐप और सोशल मीडिया पर लाइक्स जुटाने में लग जाएँगे, सोशल मीडिया पर किए-अनकिए कार्यों की शेखी बघारने में लगे रहेंगे, तो ईश्वर भी रेल की मदद नहीं कर पाएगा—फिर चाहे कितना ही निवेश क्यों न हो जाए। रेल के इन सौ उच्च अधिकारियों के स्तर पर—जो नैतिक मूल्यों और राष्ट्र प्रथम रेखने की आवश्यकता है—वहाँ से आप शुरुआत कर सकते हैं।

क्या आप जानते हैं कि आपके डीआरएम, आपके महाप्रबंधक और रेलवे बोर्ड के सदस्यगण अपनी पुरानी पोस्टिंग के स्थान पर अपना सरकारी आवास रख सकते हैं—एक अनुमान है कि मुंबई-दिल्ली जैसे बड़े शहरों में इस पालिसी से प्रति अधिकारी को कुछ करोड़ रुपयों का लाभ मिलता है—और इस पर टैक्स भी नहीं लगता। ये सुविधा किसी अन्य केंद्रीय मंत्रालय में या अन्य सर्विस में नहीं है—आप ट्रांसफर के बाद मकान अपने नाबालिग बच्चों के शैक्षिक सत्र के खत्म होने तक ही रख सकते हैं—अपने विवाहित, नौकरीपेशा बच्चों के लिए नहीं—जो रेल में हो रहा है। रिटायर भले दिल्ली से हों, लेकिन एक आवास मुंबई में भी पकड़कर रखते हैं। यही हाल उन महाप्रबंधकों का है, जो दिल्ली में अपना आवास पकड़कर रखे हैं और करियर की आखिरी पोस्टिंग किसी अन्य महानगर में है।

जो अधिकारी सरकार की—ख़ासकर के रेल मंत्रालय में सरकार की—किरकिरी कराते हैं, वह हैं सबसे बड़े लाभार्थी। हमने इन्हें चिन्हित भी किया। हमें इसमें कोई संदेह नहीं कि इनके ऊपर आपका हाथ नहीं। आज आपने जब सीधा संवाद किया, तो फिर एक उम्मीद जगी है। क्यों वह अधिकारीगण—जो खान मार्केट गैंग के हैं—पुनः येन-केन प्रकारेण दिल्ली लाए जाते हैं?

क्यों वे अधिकारी—जो दिल्ली से केवल डीआरएम बनने के लिए निकलते हैं—डीआरएम रहते हुए रेल के इतिहास के सबसे बड़े प्रमोशन में औद्योगिक स्तर के भ्रष्टाचार करवाते हैं—वापस दिल्ली लाए जाते हैं? जबकि आपकी सरकार के ग्यारह साल के कार्यकाल में इन्ही लोगों ने रेल की आज ऐसी स्थिति बना दी हैं जहाँ सरकार को सबसे अधिक निर्णयों को वापस लेना पड़ा है? क्यों ऐसा एक अधिकारी उत्तर प्रदेश मेट्रो कारपोरेशन का डायरेक्टर बनाया गया—जबकि मेट्रो या विद्युत चालित रेल में उसका अनुभव शून्य है? क्यों डीआरएम के कार्यकाल में औद्योगिक स्तर का भ्रष्टाचार पनपाकर सदा दिल्ली में रहने वाले अधिकारी को वापस रेल भवन लाया गया डीआरएम टेन्योर के उपरांत? ये वही अधिकारी हैं जिन्होंने गलत सलाह देकर—गलत निर्णय करवाए। जिन अधिकारियों ने रेल में रहते हुए रेल के ई-टेंडरिंग वेबसाइट #IREPS पर व्यवसाय किया, वे आज भी प्रोटेक्टेड हैं—क्यों? क्षमा करें मोदी जी, रेल में, काम अवश्य हुआ है, लेकिन सिस्टम अभी भी उन्हीं का है।

क्या ऐसे अधिकारी—स्वाभिमान की लड़ाई (मेक इन इंडिया) में आपके सिपाही बन सकते है?

रेल के नम्बी नारायण आपके समर्थन की आस लगाए हैं। रेल में डॉक्टर नम्बी नारायण जैसे तो नहीं, लेकिन उनका लघु रूप अवश्य दिखेगा कई रेल अधिकारियों में। ये बहुत चुभता है कि आपके सबसे कर्मठ और देशप्रेमी अधिकारी भ्रष्टाचार के नितांत झूठे आरोपों से लड़ते रह गए और ऐसे स्वार्थी तथा भ्रष्ट अधिकारियों का रेल मंत्रालय में पोषण होता रहा।

एक वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी—जो सिविल सर्विस के हैं—ने हमें रेल की #इंजीनियरिंग सर्विस के दो अधिकारियों के उदाहरण दिए, जिन्हें “एग्रीड लिस्ट” में डाल दिया गया और एक का तो करियर ही खत्म कर दिया गया। ये वे अधिकारी हैं—जो रेल की दिशा-दशा बदलने की सामर्थ्य रखते हैं, और ऐसी विश्वसनीयता रखते हैं कि उनकी फैन फॉलोइंग भी है। दो अधिकारी तो ऐसे बताए, जिन्हें एग्रीड लिस्ट में डालकर बाद में जब रेलवे बोर्ड विजिलेंस के दुष्ट-ग्रह कटे, तो यही अधिकारी डीआरएम बनने के लिए उपयुक्त पाए गए। ध्यान रहे कि श्रीधरन भी एक रेल अधिकारी ही थे—ये है सामर्थ्य आपके रेल के कर्मठ अधिकारियों की।

राष्ट्रीय प्राथमिकताएं किसी निजी कंपनी की प्राथमिकता से कहीं ऊपर हैं। जापान को ही देखें—जहाँ आप रेल की हर टेक्नोलॉजी में कम से कम तीन कंपनियों को पाते हैं। आप जापान की हाई स्पीड रेल को ही देखें। एक #कंपनी को आगे रेखने की जिद में #कार्टेल ही बनती है, राष्ट्र की नींव मजबूत नहीं होती। जापान के मंत्रालय के अधिकारी इतनी विश्वसनीयता रखते हैं कि उनके सामने ये सारे बड़े ग्रुप झुकते हैं—भारतीय रेल से कौन बात करेगा—ये उनका मंत्रालय निर्णय लेता है। लेकिन हमारे अधिकारीगण रेल की कुछ चुनिंदा कंपनियों के सामने झुकने को मजबूर कर दिए गए हैं।

लेकिन जो आपने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर एक नई ऊर्जा का संचार किया, हो सकता है आपको अपने ऑफिस में, और निश्चित ही रेल भवन में सरकारी अधिकारियों के नेतृत्व की टीम में परिवर्तन पर विचार करना तो पड़ेगा—वरना होगा वही, जो होता आ रहा है।

आपको बड़ा सोचने वाले, बड़ा करने की क्षमता रखने वाले अधिकारी चाहिए, जिन्हें उचित निर्णय लेने में कोई डर न लगे। कहीं आपकी लीडरशिप टीम में वे लोग तो नहीं रहे, जिन्होंने कभी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया ही नहीं, और इसीलिए ऊपर ‘साफ सुथरे’ आ गए?

आपने आत्म-निर्भरता के सामरिक महत्व को बताया—तो क्यों रेल मंत्रालय में कांट्रैक्ट डिजाइनर और कांट्रैक्ट मैनेजमेंट पर ही जोर रहा? आपको रेल में टेक्नोलॉजी के डिजाइनर और टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट वाले अधिकारी चाहिए—यदि रेल में ये टैलेंट नहीं रहेगा, तो आपके कांट्रैक्ट—मनी लॉंडरिंग के माध्यम बन जाएँगे।

इसे ही देखें: “When Made-in-India engines alarmed the British

आपके विजन की रेल यूनिवर्सिटी का ही हाल देखें—रेल का स्टाफ कॉलेज बंद कर दिया गया और जो बचा वहाँ मॉल तो बन सकता है, यूनिवर्सिटी नहीं—आप ड्रोन फुटेज मंगाकर स्वयं ही देख लें। एक सेवानिवृत्त रेल अधिकारी के दर्द भरे उद्गार देखें, जहाँ रेलवे स्टाफ कॉलेज को निर्भया बताया, RSC: How can we ever forget and forgive this betrayal?

मोदी जी आज जब देश के स्वाभिमान को चुनौती मिली है, और आपने विभागों का भी आव्हान किया है, तो बड़े मंत्रालयों में उनको लाइये जो काम जानते हैं और काम करने से पीछे नहीं हटते। इनका एनकाउंटर खान मार्केट गैंग के सदस्य अधिकारियों ने और वेंडरों के कार्टेल ने किया है—उन्हें सुरक्षा दें। स्वाभिमान की लड़ाई वे नहीं लड़ सकते, जिनका करियर केवल जोड़-तोड़ में निकला है। राष्ट्र निर्माण दलाल नहीं कर सकते—मोदी जी!