टीआरडी में नित-नई आड़ी-तिरछी ड्राइव चलाने से कुछ हासिल नहीं होगा!

जब तक अधिकारियों का प्रॉपर रोटेशन नहीं होगा, तब तक न तो सिस्टम सुधरेगा, न ही भ्रष्टाचार कम होगा!

अभी 27 अप्रैल को पुणे डिवीजन में वंदे भारत का पहला-पहला डिरेलमेंट हुआ, फिर परसों एक और वंदे भारत के पैंटोग्राफ का इंटैंग्लमेंट हुआ। और कल फिर एक मालगाड़ी के इंजन का पैंटो इंटैंगल हुआ है। मध्य रेल के टीआरडी का हाल किसी से छिपा नहीं है—साहब और मेमसाब लोगों को खुश रखते हुए #रोटेशन से इसके कुछ #HOD बच तो गए, लेकिन एक को #CBI ने पकड़ लिया और पूरे सिस्टम की एक बार फिर फजीहत हो गई।

पूछने पर पता चला कि रेलवे बोर्ड टीआरडी में नित-नई आड़ी-तिरछी ड्राइव चला दे रहा है। AM/RE के पास #TRD का अनुभव नगण्य है, ऊपर से एक और पुराने #CEDE की तर्ज पर रोटेशन से बचते हुए बिजली के एक अन्य SAG अधिकारी को नया CEDE बना दिया गया। बोर्ड से और जोनल हेड क्वार्टर से केवल ड्राइव के गूगल फॉर्म भरने का ही जोर है।

ब्लॉक कहीं नहीं मिल रहे हैं। वो तो #SrDEE का काम है—कहकर सब किनारा कर ले रहे हैं। SrDEE अपने #DRM से और HQ से डाँट खाकर चुप बैठ गया है। #SrDOM तो वैसे भी DRM की नहीं सुनते, और ये भी सही है कि SrDOM की बात उसके सुपरवाइजर भी नहीं सुनते, लेकिन मुख्यालय में मुंह में दही जमाए बैठे अधिकारी मजाल है कि ब्लॉक न मिलने की बात GM या PCOM को बोल दें। भुसावल में हुए डबल TRD ब्रेकडाउन से 17 घंटे लाइन बंद रहने की ऐतिहासिक घटना अभी पिछले साल की ही तो है।

आज वंदे भारत के डिरेलमेंट की चर्चा चाहे कितनी ही हो—इसके मूल में यह है कि देश भर में, यार्डों में क्रॉसओवर के लिए जितने ब्लॉक चाहिए, वह मिलते ही नहीं हैं। सीआरबी और महाप्रबंधक यह देखें कि रोलिंग ब्लॉक प्रोग्राम के ब्लॉक तो कम से कम मिलें—DRM को डाँटने से कुछ नहीं होगा—क्योंकि सिस्टम में ग्राउंड लेवल पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है।

सीआरबी की मासिक सेफ्टी वीसी परसों है, जहाँ वह “पॉइंट ऑफ माउंट” पर व्याख्यान देंगे, लेकिन रोलिंग ब्लॉक प्रोग्राम के फर्जीवाड़ा पर बोलने के लिए उनके भी मुंह से शब्द नहीं फूटते, क्योंकि MInfra के बाद अब MOBD का भी चार्ज वही लिए बैठे हैं।

ऑपरेटिंग के एक ब्रांच अधिकारी का कहना है कि जितना ऑपरेटिंग के ब्रांच ऑफिसर को डाँट सहनी पड़ती है उतनी किसी को नहीं—हालाँकि ये बात कई अधिकारी बोल चुके हैं—ऑपरेटिंग विभाग केवल चीखने-चिल्लाने, डराने-धमकाने से चलता है—चूंकि उनकी इतनी पिटाई होती है, तो वे भी बाकी सभी ब्रांच अफसरों से लड़-झगड़कर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं।

हमने पहले भी लिखा है कि ब्लॉक मीटिंग और कंट्रोल रूम मच्छी बाजार से अलग नहीं लगते, रेलवे की इस ब्लॉक मीटिंग में पहले भी ब्रांच अफसरों के बीच हाथापाई हो चुकी है। कुल जमा बात यह है कि इस मीटिंग की विषाक्तता में समय के साथ कोई बदलाव नहीं हुआ।

जानकारों का मानना है कि समय आ गया है CRB, MOBD और AM/Traffic को निर्देशित करें कि कोडल प्रोविजन के बराबर ब्लॉक नहीं देना लोगों के जान-माल से खिलवाड़ करना है। वहीं, सभी जीएम अपने #PCOM को निर्देशित करें कि जब रोलिंग ब्लॉक प्लान साइन हो जाता है तो यह ऑपरेटिंग की जिम्मेदारी है कि ब्लॉक दिए जाएं, अन्यथा कोडल प्रोविजन बदल दिए जाएँ!

शिक्षित-प्रशिक्षित टेक्निकल अधिकारी इस बात से बेहद असंतुष्ट हैं कि उन्हें अपने काम को कराने के लिए भीख माँगनी पड़ती है। वे कहते हैं, “ऐसी व्यवस्था जो काम करने के इच्छुक अधिकारी को काम कराने की अनुमति चिरौरी-विनती करवाने अर्थात भीख मांगने के बाद देती है, वहाँ काम करने का इंसेंटिव क्या होगा!” यह बात CRB और GMs के सोचने की है।