RVNL का सराहनीय प्रयास—अब धूर्तों की खैर नहीं!

रेल विकास निगम लिमिटेड (#RVNL) में बहुत आर्थिक गड़बड़ी होती रही है, और यह आज भी लगातार जारी है। गाड़ियों को अपने और परिवार सहित नाते-रिस्तेदारों तक के कामों के लिए इस्तेमाल एक अलग स्तर पर होता रहा है, और यह लगातार हो रहा है।

आपको यदि #deputation पर RVNL में लिया जा रहा है, या #absorption हो रहा है, अथवा प्रमोशन हो रहा है, तो ये मानकर चला जाता है कि बड़े साहब—जिन्होंने ये करवाया है—उनके कार्यकाल के बाद आपको उन्हें गाड़ी, घर-मायके-ससुराल के लिए आदमी मुहैया करवाना पड़ेगा।

और यदि वह बड़े साहब रिटायर हो रहे हैं, तो आपको साल-दो साल तक उन्हें एक गाड़ी मुफ्त में देनी पड़ेगी—जिसका माहवार 60-70 हजार रुपये का खर्च RVNL के खाते में जाता है या फिर किसी वेंडर/कॉन्ट्रैक्टर के माथे, और साथ में दो आदमी भी—घर काम के लिए—जिनका खर्च अलग!

बड़े-बड़े अधिकारियों ने RVNL को पूरी तरह से चूसा है—यह एक सच्चाई है। ईमानदारी का परचम लहराने वाले अधिकारियों का हिसाब किस शहर में हुआ, इस सबकी जानकारी भी हमें मिली है, लेकिन हम बिना डबल वेरिफिकेशन और बिना पूरी सुनिश्चितता किए उसे पब्लिश नहीं कर रहे हैं।

ये बात तो सब जानते हैं कि किस सब-वेंडर को काम मिलेगा, इसका फैसला साहब या उनके चेले करते हैं—और ऐसा क्यों है—ये भी सब जानते हैं। बैक-टु-बैक टेंडर देने और इसकी मलाई मिल-बाँटकर खाने की जो प्रथा इन परजीवी रेलवे PSUs ने चला रखी है, उसकी भी कलई जल्दी ही खुलेगी।

ईमानदारी का चोला ओढ़े सफेदपोश अपनी पूरी शक्ति लगा देते हैं कि उनके चेले सुरक्षित एक ही स्थान पर बने रहें। चेले भी साहब को यदि दो आदमी देते हैं तो अपने दर्जन भर रिश्तेदारों का हिसाब कर लेते हैं।

साहब के ये चेले उनका आधा वेतन हर महीने खुद रखते हैं और नौकरी लगवाने की एवज में 5-10 लाख जो शुरू में लेते हैं, वो अलग। इससे बढ़िया क्या होगा कि साहब और मेमसाहब को लेमन-चूस दे दी और अपनी लूट बेधड़क जारी रखी।

यह आदेश RVNL का सराहनीय प्रयास है—जहाँ प्रोजेक्ट नहीं, वहाँ लोग क्यों रहें? वहाँ उन्हें क्यों रहना चाहिए? कौन-कौन अधिकारी ऐसे आदेशों को बदलवाने की कोशिश करते हैं और उन्होंने क्या-क्या सेवा ली है, उससे बहुतों के नकाब उतरेंगे। रेल के PSUs को अपने खर्चे कम करने होंगे, वरना तो ये भ्रष्टाचार के गढ़ बन ही गए हैं।