KMG: “Never A Bystander” – A Standard & Deeper Analysis: पार्ट-2

पार्ट-1 में हमने पाठकों को यह बताया कि कैसे हमने #KMG की खोज की, और यह भी कि रेल में चल रही ऊहापोह की स्थिति समझने के लिए #एडवाइजर साहब उर्फ #TenderMan को समझना आवश्यक है!

हमने अपने सुधी पाठकों को यह भी बताया कि कैसे हमसे भी गलती हुई जब हमें लगा कि मंत्री या सीआरबी सेल या संसद की प्रोसीडिंग्स से हमें रेल की दिशा और दशा का सही अनुमान लगेगा। हमने जब #Advisor साहब की अपनी किताब में दी गई सलाह मानी और पोस्टेड अधिकारियों पर निगाह डाली, तो सारे तार जुड़ते चले गए, और अंततः सब स्पष्ट हो गया!

#Advisor साहब का यह बड़प्पन है कि उन्होंने सारी बातें अपनी मात्र ₹900/- मूल्य की पुस्तक में लिख डाली हैं। इसको पढ़ डाला तो झिंगालाला, अर्थात फिर आपको और कहीं कुछ पढ़ने-जानने की आवश्यकता ही नहीं। रेल का उद्भव, इसका वर्तमान और इसका भविष्य इन पन्नों में कैद है, जिनके दिन-रात स्मरणीय महानायक आदरणीय #TenderMan हैं, जो 1999 में दिल्ली आए और आज तक, दिसंबर 2022 दिल्ली में और खासकर, रेल भवन से अपनी सेवाओं से देश को लाभान्वित कर रहे हैं! उनको कोटि-कोटि नमन!

हम अपनी सीमित समझ, सीमित जानकारी और सीमित संसाधनों से उनकी इस ‘महान कृति’ का विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे-आपके द्वारा दिए गए फीडबैक को अपना दिशा-सूचक यंत्र (कंपास) मानते हुए! आप कृपया ईमेल और व्हाट्सएप पर मैसेज देकर हमारा उत्साहवर्धन करते रहें!

इस प्रक्रिया में हम नौकरशाही, #OLQ, #EmotionalIntelligence, वृहद् स्तर के पॉलिसी कन्फ्यूजन, और ‘utter lack of competence’ के बारे में जानने की कोशिश करेंगे। आज रेल ऐसी क्यों है? क्यों रेलकर्मियों का मनोबल टूटा हुआ है? कैसे #KMG ने पूरे सिस्टम का #Game किया है? हम जानने का दुस्साहस करेंगे कि क्यों #adhocism की प्रक्रिया से रेल की जड़ें कमजोर हुई हैं? कैसे इन ‘विषधरों’ ने वह किया, जो विदेशी आक्रांता करते थे, कुओं में जहर डाल दिया।

इस सीरीज में हम #Advisor साहब और उनकी कथित सुविचारित नीतियों को जानने के लिए उनकी “Never a Bystander” नाम की जीवनी को आधार बनाएंगे। इसमें दिए तथाकथित तथ्यों के बारे में सुधी पाठकों और जानकारों से मिले फीडबैक से पुष्टि करते हुए उसी भाषा में पाठकों को बताने का प्रयास करेंगे। चूंकि #Advisor साहब ने बिना किसी पूर्व पुनरावलोकन (प्रॉयर रिव्यू) के इमोशनल इंटेलिजेंस को रेल की व्यवस्था में घुसा दिया, पर्याप्त जानकारी इस पर भी रहेगी और वही विन्यास आपके सामने आएगा, कृपया प्रतीक्षा करें!

Ability to keep Balance

इमोशनल इंटेलिजेंस के कई आयाम हैं, एक यह भी है कि आप नई जानकारी को कितने संतुलन से लेते हैं और वह आपको कैसे प्रभावित करती है? क्या आप नई जानकारी से इतने अभिभूत या भौंचक हो जाते हैं कि आप सुधबुध खो बैठते हैं? निर्णय लेने का संतुलन खो बैठते हैं? क्या आप कांतारा के राजा की तरह हैं, जो दैव पंजुरली के सामने सुधबुध खो देता है?

सीखने की चाह एक बहुत अच्छा गुण है, अपनी गलती मानना भी एक बड़ा गुण है। ‘मैंने फलां को पीट दिया’ इसे आप क्या कहेंगे? आपने तो सच बोल दिया, लेकिन क्या इससे आपकी गलती कम हो जाएगी? और अगर आपके पीटने से उस व्यक्ति की मौत हो जाती है, तो इस बात की स्वीकृति का क्या मतलब रहा?

वैसे ही अगर बिल्ली सौ चूहे खाकर हज को जाएगी तो क्या उसके परिवर्तित इरादों पर शक नहीं होगा? अब आपने तो जीवन में केवल राजनीति ही की, और कैरियर के अंत में आपको कोई एक पुरानी चीज पहली बार पता चली तो आप ऐसे विस्मित हो गए कि आप उस डॉक्टर की तरह प्रतीत हुए जो जीवन भर वही दवा देता रहा जो उसे मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव बताते रहे, क्योंकि उसने स्वयं समय से अपने ज्ञान को अपडेट नहीं किया।

पृष्ठ क्रमांक 230 पर #Advisor साहब लिखते हैं, “मुझे इमोशनल इंटेलिजेंस के बारे में सितंबर 2018 से पहले कुछ नहीं पता था”, तो #Advisor साहब को 23 साल बाद पता चला कि इस नाम की भी कोई चीज होती है दुनिया में – इमोशनल इंटेलिजेंस 60 के दशक में लिटरेचर में आई, 1995 में डैनियल गोलमेन ने जब एक बेस्ट सेलर किताब इस विषय पर लिखी, तब से ये आम बोल चाल में आ गया।

फिर अपनी पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 235 पर वह लिखते हैं-

Upadhyaya’s depth of knowledge and thoroughness in the subject is impressive. If you listen to him once, you’ll want to listen to him many times over. His intellect, his personal conduct and the aura of his personality will mesmerise you. His command over the language and the motivation that comes along due to the depth of his nuanced understanding of the scriptures, spirituality, mythology, philosophy and extensive international experience will make you his staunch follower and admirer.

Rajeshwar is a great thinker, motivator and himself a Level 5 leader. He is a perfect teacher and a guide. No wonder, therefore, that he is the Master Trainer for India for EQi, certified by Multi Health Systems, Canada.

I do not have adequate vocabulary to express my feelings for Rajeshwar Upadhyaya. He has taught Emotional Intelligence to MPs, MLAs, doctors, ambassadors, officers from IAS, IFS, IPS, IRS and Railways, entrepreneurs, scientists, academicians, and even monks.

He has been a visiting faculty at ISB for more than 16 years. He has taught at eminent Business Schools around the world.

He is my friend, philosopher, guide and, above all, guruji. I owe everything to him.

I am grateful to God, for bringing me close to him – and his agreeing to guide me!

Verbatim quotes from Never a Bystander-Indian Railways in Transition by Sudheer Kumar, Sterling Publications (taken with view to bring home the point that being overwhelmed, there is loss of ability to think clearly by a key official whose conduct impacts entire top leadership of IR and its finances).

उपरोक्त पैराग्राफ्स में #Advisor साहब पूरे विस्मित और उपाध्याय जी के वश में लग रहे हैं! इतना कि #NSE की पूर्व चीफ चित्रा रामकृष्णन और उनके गुरु की याद आ जाती है, जिसके चलते यह सवाल उठे कि क्या वे अपने गुरु के इतने वश में हैं कि NSE की चीफ के तौर पर स्वतंत्र होकर निर्णय लेने की उनकी क्षमता खो तो नहीं गई? इसे ‘loss of agency’ कहते हैं।

https://www.business-standard.com/article/markets/trading-queen-and-mystery-guru-strange-tale-engulfs-nse-in-scandal-122032100123_1.html

जैसे विस्मित हो उपाध्यायजी की कैनेडियन कंपनी को सिंगल टेंडर पर काम देकर रेल के सभी अधिकारियों का इमोशनल ब्लैकमेल और #ISB में #AMP कार्यक्रम से गुजरने वाले सभी अधिकारियों का यह टेस्ट किया गया, उससे ये स्पष्ट है कि राजेश्वर उपाध्याय, जो इस टेस्ट के लाभार्थी हैं, वह इंटरेस्टेड पार्टी हैं – क्या ये विस्मय का कारण है कि वह आधारभूत विश्लेषण भी नहीं हुआ, जो हमेशा होना चाहिए सरकारी पैसे के व्यय से पहले? और फिर वही व्यक्ति जिसके वश में आप हैं, उसके नीचे आप पीएचडी करने लगते हैं? उपाध्यायजी के रेफरेंस से डॉ जोरिलो दो केस स्टडी लिखते हैं, जिसे ISB, हॉर्वर्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित करवाता है, आपके साभार!

सवाल एक और उठता है कि #Advisor साहब 1999 से दिल्ली में हैं, 1981 के ग्रेजुएट हैं, उन्हें सितंबर 2018 तक इमोशनल इंटेलिजेंस के विषय के बारे में कुछ पता ही नहीं था? तब प्रश्न यह है कि वे किस गुफा में रह रहे थे?

उनका विस्मय यह भी स्पष्ट करता है कि उन्होंने अपनी अल्पज्ञान की अवस्था को पूरे रेलवे का बेंचमार्क मान लिया! वह लोग जो रेल में इसकी बात दशकों से करते थे, वे बेवकूफ ही रहे। वैसे #Advisor साहब और उनके बॉसेस ने भारतीय शिक्षा को अधिक भाव नहीं दिया, क्योंकि वह अपनी किताब में लिखते हैं कि ‘उन्हें देश की ट्रेनिंग में नहीं भेजा गया’ – हां, हर सफल रेल अधिकारी की सफलता का जो मापदंड है कि आपने कितनी विदेश यात्राएं की हैं, पर वह अव्वल ही आएंगे – अमेरिका में, यूरोप में, कई महीनों से लेकर कुछ हफ्तों की अनेक ट्रेनिंग के बारे में वह चर्चा करते हैं।

रेल की ट्रेनिंग विदेश भ्रमण का अवसर माना जाता रहा है और यह भी सही है कि इसे रेवड़ियों की तरह बांटा जाता रहा है अपने चहेतों में। यह काम रेलवे बोर्ड का है, जहां आपने 1999 से लेकर अब तक डटे रहने का कीर्तिमान बनाया है! आपकी जय हो!

फ्रांस और स्विट्जरलैंड में सपरिवार यात्रा पर, लूव्र म्यूजियम के सामने – from ‘Never A Bystander’, to bring home the content and intent of foreign training.
ईशा फाउंडेशन में रिट्रीट पर – इस फोटो में आपको वे सब मिल जाएंगे जिनमें से कई अफसर पिछले 8 साल से बदलते मंत्रियों के बावजूद डटे हैं – समरथ को नहिं दोस गोसाईं! – from ‘Never A Bystander’, to bring home the stated fact.

Blinded by self – importance, acting on low level of knowledge, late to acquire and then not able to handle transformative information.

यह बात भी उठानी इसीलिए आवश्यक है, क्योंकि #Advisor साहब की पूरी कार्यशैली इस विश्वास पर है कि रेलकर्मी नई टेक्नोलॉजी को नहीं समझ सकते – p.95-97। और तारीफ यह कि उनके इस कन्विक्शन पर देश के दसियों हजार करोड़ के बड़े-बड़े निवेश हो गए!

रेलवे बोर्ड में 1999 से बैठकर विद्युत लोको और बाद में EMU को देखते हुए #Advisor साहब ने कभी यह नहीं पूछा, और अपनी किताब में भी नहीं लिखा, कि जो झौव्वा भर रेल अधिकारी विदेश में ट्रेनिंग पर भेजे गए, वे लौटकर उस काम को करने के लिए क्यों नहीं लगाए गए, जिसके लिए उन पर सरकार ने ट्रेनिंग का भारी-भरकम खर्च किया था? भेजने वाले आप! पोस्टिंग करने वाले आप! बोर्ड में बैठकर गाली देना बहुत आसान है – क्या आपने इस फेलियर की जिम्मेदारी ली – क्यों लेंगे, नहीं तो टेंडर का जस्टिफिकेशन कैसे बनेगा? कैसे बड़ा दिखने की महत्वाकांक्षा पूरी होगी? और हां, सबके लिए खलनायक की भूमिका में जो आरडीएसओ है न, उसमें भी अधिकारी आपके बिना आशीर्वाद के पोस्ट नहीं हो सकते थे!

ठेके पर काम करना है तो चैलेंज, टेंडर और उनकी कंडीशन बनाने का ही है – फील्ड इंजीनियरिंग का नहीं – तभी आप #TenderMan कहे गए। आपकी टीम के विद्युत इंजीनियर भी आपके ही द्वारा लिखी किताब में केवल नोट, ब्रीफ, इवेंट मैनेज करते देखे गए – p.227, 228। वही हाल आपके स्टैब्लिशमेंट अफसर का रहा। कुल मिलाकर रेल में रेलकर्मी जो डेढ़ सौ साल से अधिक समय से हाथ से काम करते रहे, काम की वह संस्कृति बेमानी हो गई!

गनीमत है कि यह ‘सुधीरदृष्टि’ भारत सरकार के पास 1962 के युद्ध के बाद नहीं थी, नहीं तो सेना भी एक #Tender द्वारा चमकीले कांट्रैक्ट के सुपुर्द की जा चुकी होती, क्योंकि, सेना बुरी तरह हारी थी, शीर्ष नेतृत्व बिखरा और इंकम्पीटेंट था, सेना में वह सब अवगुण थे जिसके लिए आपकी पुस्तक रेल को गाली देती है। ये अलग बात है कि सैन्य बल आज भी सीडीएस, थिएटर कमांड इत्यादि जैसी बड़ी पहल बिना संकोच के कर रहे हैं, अपने वर्तमान की कमियों का ईमानदार आकलन करके!

एक सुधी पाठक के भेजे मेसेज को देखें:

“High on Emotional Intelligence also permits you to sell comb to a bald man. This is the prime enabler of snake oil salesmanship – no wonder Indian Railway is sold to the promise of transformation on the back of Emotional Intelligence, little realising its dark side which is well published and debated in academic circles – which makes it what petrol is to fire. Mesmerised by one individual, entire top brass lost their agency to act on their own volition, all that this individual had to do was to mesmerise the Rasputin – rest all felt like dominos! ओम शांति!!”

बचो साथियो, अब इस विषय में PhD हो रही है!

बदलते मौसम में बदलती आवाज!

क्यों भारत सरकार को लाखों करोड़ खर्च करने के बाद #Atmanirbharta (आत्मनिर्भर भारत) की बात करनी पड़ी? क्या इसका उत्तरदायित्व 1999 से रेलवे बोर्ड में कार्यरत #Advisor साहब का नहीं है? क्यों उनकी पुस्तक इन विषयों पर साइलेंट है? उनका हमेशा यह विश्वास रहा कि जो भारतीय है, वह बेकार है – कमरा जगमग करना चाहिए, पावरपॉइंट प्रजेंटेशन चमकने चाहिए, बस – कैसे देश का पैसा विदेश में जाए, इस पर इनकी महारत रही, यह उनकी #KMG और नैरेटिव बिल्डिंग इको-सिस्टम की प्राइमरी सदस्यता का प्रमुख कारण रहा। बड़े होटलों में कांफ्रेंस, विदेश यात्रा और विदेशों में मिलने वाली आवभगत, देसी समान की खरीद से कहां मिलेगी?

लेकिन चूंकि आज का फ्लेवर – आत्मनिर्भरता है, तो इस पर आप उनसे 100 स्लाइड का प्रजेंटेशन ले सकते हैं! आप इमोशनली इंटेलीजेंट हैं, तो बदलते परिवेश में ढ़लना और बॉसेस को शीशे में उतारना आप भली-भांति जानते हैं। और हां, सावधान – अब तो इसमें पीएचडी हो रही है!

रेल के पिछड़ेपन पर किताब में लिखना जब मंत्रीजी से आपकी अत्यधिक निकटता जग-जाहिर है, कौन पूछेगा कि आपका रेल के इस पिछड़ेपन में क्या योगदान है? इसका न इनके पास जवाब है, न ही इनका कोई इस दिशा में प्रयास रहा – कारण – अपने स्वयं के अल्पज्ञान को इन्होंने सभी रेल अधिकारियों के ज्ञान का बेंचमार्क मान लिया। इन्हें नहीं समझ आया तो इस दिशा में प्रयास की क्या आवश्यकता? जिन अधिकांश अधिकारियों को आपने अपनी पुस्तक में करेक्टर सर्टिफिकेट दिया है, उन नामों से सब मंत्रमुग्ध हैं, कभी विद्युत विभाग के अफसरों को छेड़कर तो देखें!

यह तो भला हो कि आजादी के बाद के रेल इंजीनियरों में ‘सुधीरदृष्टि’ नहीं थी और ‘खान मार्केट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट’ के ग्रेजुएट नहीं मिला करते थे, नहीं तो आज भी अंग्रेज भारतीय रेल की फैक्ट्री, वर्कशॉप और ट्रेन चला रहे होते!

पूरा कैरियर देखें, तो 1999 के बाद से दिल्ली में रहे – थोड़े समय के लिए बड़ौदा हाउस को आपकी सेवा का लाभ मिला। अपनी किताब में आप बताते हैं कि अक्टूबर 2011 में डीआरएम/धनबाद बनकर जाते हैं, जहां वे दूसरे गैर-ट्रैफिक डीआरएम बनते हैं। वह ये नहीं बताते कि ये दिल्ली या आस-पास ही रहना चाहते थे – लेकिन धनबाद का भाग्य आपकी इच्छाओं पर भारी पड़ा। इतिहास गवाह है, दधीचि के त्याग के बाद आप इनके दिल्ली से दूर रहने के त्याग को भी गिना जाता है!

2022 खत्म होने वाला है #Advisor साहब अभी भी दिल्ली में ही हैं – रेल भवन में! जिन फाइलों पर इनकी नजर पड़ गई, वे इनकी उपलब्धियां बनकर इनकी जीवनी में आ गईं। हमारा मानना है कि रवीश कुमार अगर आपसे मिले होते या आपकी पुस्तक बांची होती, तो वह भी अपने नए सेठ से सटे रहते! एक पत्रकार के नाते, पत्रकारिता का ये नुकसान बहुत कचोट रहा है! #RailWhispers इसके लिए क्षमा चाहता है कि ज्ञान-कोष के इस रहस्योद्घाटन में उसे देर हो गई!

और तो और एलआईसी की पॉलिसी कि तरह, सेवारत रहते हुए भी, और सेवानिवृत्ति के बाद भी, आपका रेलवे बोर्ड में डटे रहना, निश्चित रूप से यह आपके इमोशनल इंटेलिजेंस की दाद देता है कि कैसे आप डटे रहे और बॉसेस और मंत्री बदलते रहे!

शायद भविष्य में कोई खोजी ही यह बताएगा कि आपको आपके साथी ऑनरेरी कौसा पीएचडी क्यों नहीं दिलवा पाए, क्योंकि इमोशनल इंटेलिजेंस की #adaptability ट्रेट पर आप नोबल पुरस्कार विजेता हैं – चूंकि भारतरत्न में ‘भारत’ है, इसलिए यह #KMG को रास नहीं आता, इसीलिए मैगसेसे या नोबल की ही आपके लिए बात होगी!

कैसे बिना समझे एक सेल्समेन की तमक-झमक से वशीभूत होकर ‘इमोशनल इंटेलिजेंस का सांप’ रेल के गले में डाल दिया गया, ये जानने के लिए कृपया अगले पार्ट की प्रतीक्षा करें..

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी

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