जब रेलवे के पास अपने समर्पित केंद्रीकृत प्रशिक्षण संस्थान उपलब्ध हैं, तो प्रशिक्षण की दोहरी व्यवस्था क्यों?

भारत सरकार और रेल मंत्रालय से एक प्रश्न आज गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि—जब रेलवे के पास पहले से अपने समर्पित Centralised Training Institutes (#CTIs) मौजूद हैं, तो रेल अधिकारियों और सुपरवाइजरों के प्रशिक्षण के लिए गतिशक्ति विश्वविद्यालय (#GSV) को समानांतर भूमिका क्यों दी जा रही है?

गतिशक्ति विश्वविद्यालय एक डीम्ड यूनिवर्सिटी है। यह बात अलग है कि इसके लिए भारतीय रेल की सौ साल से भी अधिक पुरानी विरासत—रेलवे स्टाफ कॉलेज—को संपूर्ण चल-अंचल संपत्तियों के साथ हड़प लिया गया। तथापि विश्वविद्यालय का मूल दायित्व उच्च शिक्षा, अनुसंधान, अकादमिक कार्यक्रम और अपने निर्धारित पाठ्यक्रम संचालित करना है। यदि वह अपने क्षेत्र से जुड़े विशेष अकादमिक पाठ्यक्रम (कोर्स) चलाता है, तो यह निश्चित रूप से उसकी भूमिका का हिस्सा है। लेकिन प्रश्न तब उठता है जब विश्वविद्यालय की भूमिका रेलवे के मौजूदा संस्थागत प्रशिक्षण ढ़ांचे के समानांतर दिखाई देने लगे।

भारतीय रेल ने दशकों में अपने प्रशिक्षण संस्थानों का एक विस्तृत और विशेषज्ञतापूर्ण नेटवर्क विकसित किया है। अलग-अलग कार्यक्षेत्रों के लिए रेलवे के अलग-अलग केंद्रीकृत प्रशिक्षण संस्थान हैं, जहाँ अधिकारियों और कर्मचारियों को रेलवे की कार्यप्रणाली, नियमों, परिचालन, वाणिज्यिक गतिविधियों, संरक्षा-सुरक्षा, परियोजनाओं और प्रशासनिक चुनौतियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है।

फिर प्रश्न स्वाभाविक है—

  • जब विशेषज्ञता, अनुभव और प्रशिक्षण के लिए समर्पित संस्थान पहले से उपलब्ध हैं, तो उसी प्रशिक्षण कार्य को किसी विश्वविद्यालय के माध्यम से कराने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
  • क्या रेलवे के केंद्रीकृत प्रशिक्षण संस्थानों की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं किया जा सकता?
  • क्या उनके फैकल्टी और अनुभवी रेल अधिकारियों की विशेषज्ञता पर्याप्त नहीं है?
  • क्या प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय एक समानांतर ढ़ांचा खड़ा करना बेहतर मॉडल है?
  • और सबसे महत्वपूर्ण—क्या विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय ही रहने देना और CTIs को प्रशिक्षण संस्थान के रूप में मजबूत करना अधिक तार्किक नहीं होगा?

गतिशक्ति विश्वविद्यालय की अपनी अकादमिक भूमिका हो सकती है। रेलवे और लॉजिस्टिक्स से जुड़े नए कोर्स, रिसर्च, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, डेटा एनालिटिक्स और इंटरडिसिप्लिनरी एजुकेशन में उसका योगदान उपयोगी हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि रेलवे के स्थापित प्रशिक्षण संस्थानों की भूमिका धीरे-धीरे कम कर दी जाए।

संस्थागत व्यवस्था में हर संस्था की अपनी विशेषज्ञता और भूमिका होती है। विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय का काम और रेलवे के केंद्रीकृत प्रशिक्षण संस्थानों को प्रशिक्षण का काम स्वतंत्र रूप से करने दिया जाए—तो शायद दोनों संस्थाएँ अपनी-अपनी क्षमता का बेहतर उपयोग कर सकें।

वरना कल स्थिति यह होगी कि रेलवे के पास प्रशिक्षण संस्थान भी होंगे, उधर विश्वविद्यालय भी होगा—जिसका रेलवे से कोई संबंध नहीं है—और दोनों एक ही काम के लिए अलग-अलग व्यवस्था बनाएंगे।

प्रश्न किसी संस्था के अस्तित्व का नहीं है; प्रश्न भूमिका के स्पष्ट निर्धारण, संसाधनों के बेहतर उपयोग और रेलवे की अपनी प्रशिक्षण व्यवस्था की संस्थागत गरिमा का है।

आखिर जब घर में पहले से विशेषज्ञ रसोई मौजूद है, तो खाना बनाने के लिए पड़ोसी के घर में नई रसोई क्यों बनाई जाए?

यही वह प्रश्न है जिस पर रेलवे के नीति-निर्माताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए।