कोयले की कोठरी में जाओ और बेदाग वापस आओ! घर से बाहर कम निकलो वरना अपनी मौत खुद मरो!!
कोरोना से होने वाली मौतों का तांता लगता जा रहा है। जहां अपनी जान-पहचान के बहुत से लोगों की मौत कोरोना के कारण हो चुकी हैं। वहीं देश भर में कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा लाख के पार जा पहुंचा है।
दफ्तर, कार्यस्थल, कारखाना और बाजार सभी कुछ सर्वसामान्य जनता के लिए खोलकर और यह कहकर छुट्टी पा ली गई है कि अब जनता कोरोना वायरस से अपनी रक्षा-सुरक्षा खुद करे।
पूरा फोकस सिर्फ इस बात पर सीमित होकर रह गया है कि अगर जनता मास्क नहीं लगाएगी तो वह मर जाएगी, और यदि बिना मास्क के पकड़ी गई तो उसे जुर्माना भरना पड़ेगा।
लुटी-पिटी पड़ी जनता पर जुर्माना ₹500 से बढ़ाकर ₹2000 कर दिया गया है। चुनाव में लाखों की भीड़ इकट्ठी करने पर राजनीतिक दलों पर कोई रोक-टोक नहीं, मगर चार जन यदि एकसाथ इकट्ठे होंगे तो कानून और व्यवस्था को लकवा मार जाएगा!
आज स्थिति बिल्कुल ऐसी हो गई है कि जैसे किसी आदमी को कोयले की कोठरी में भेजा जाए और उससे कहा जाए कि वह बिना दाग-धब्बे और बिना कालिख लगे वापस आए, वरना उसको दंडित होना पड़ेगा।
यह ठीक है कि सरकार और व्यवस्था की भी अपनी कुछ मजबूरियां हैं। देश आर्थिक मंदी की चपेट में आ चुका है। कोरोना के कारण पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी के चलते हाहाकार मचा हुआ है। कोई भी देश इससे अछूता नहीं रह गया है।
ऐसे में सरकार की भी मजबूरी थी, उसको लॉकडाउन खोलना ही था और देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास भी शुरू करना था।
पिछले लगभग नौ महीनों के दौरान सरकार द्वारा देश की सर्वसामान्य जनता को कोरोना से बचाव के तमाम उपाय बता दिए गए हैं और सभी तरह की एहतियात बरतने के दिशा-निर्देश भी विभिन्न माध्यमों से जारी करके उस तक पहुंचा दिए गए हैं। अब जनता जाने और उसका नसीब, सरकार की बला से!
इधर जनसामान्य और रोज कमाने-खाने वालों की भी अपनी मजबूरियां हैं। उनकी जो भी जमा-पूंजी थी, वह सब पिछले नौ महीनों के दौरान खत्म हो चुकी है। शुरू में जिन समाजसेवी संस्थाओं और लोगों की परोपकार करके थोड़ा पुण्य कमाने की जो बाढ़ आई हुई थी, अब उनका भी कोई आसरा नहीं बचा है।
इस दरम्यान बहुतों की नौकरी चली गई, तो बहुतों को वेतन कटौती भी सहन करनी पड़ी है। बहुतों को आधे वेतन पर भी नौकरी टिकाए रखने के लिए मजबूर होना पड़ा है। सरकारी कर्मचारी भी इस सबसे अछूता नहीं बचा है। देश में बेरोजगारी चरम पर पहुंच चुकी है। तथापि सरकार को इसकी कोई चिंता है, उसकी इवेंट पॉलिटिक्स को देखते हुए ऐसा लगता तो नहीं है।
आज घर के बाहर का पूरा वातावरण घोर कोरोनामय हो चुका है। अगर कोई व्यक्ति घर से बाहर जा रहा है, तो वह सिर्फ अपने जोखिम पर ही जा रहा है।
क्योंकि वह अब यह ठान चुका है कि जब मरना ही है तो घर में बंद रहकर भूख से मरने के बजाय रोटी के लिए कोरोना से लड़कर मरा जाए।
तथापि इस बात की किसी को कोई गारंटी नहीं है कि तमाम सावधानियों के बावजूद अति-आवश्यक काम के लिए घर से बाहर निकला आदमी कोरोनाग्रस्त नहीं हो चुका है!
यह तय है कि बाजार की शक्तियां तो आर्थिक मंदी होने के नाम पर कोई भी बाजार बंद नहीं होने देंगी। इसलिए जहां तक हो सके हम घर से बाहर कम से कम निकलें, बस सिर्फ इतना ही कर पाना अब हमारे हाथ में रह गया है।
-Suresh Tripathi
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