रेलवे में भ्रष्टाचार पर सीबीआई की कार्रवाई, मगर आरोपियों के विरुद्ध रेलवे की कार्रवाई नगण्य?

जब पूर्व निर्धारित प्रावधानों के तहत कार्रवाई रोक दी जाती है, तब भ्रष्टाचार केवल फलता-फूलता ही नहीं—संस्थागत बन जाता है!

भारतीय रेल—दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क—आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ भ्रष्टाचार, जोड़तोड़, मनमानी टर्म्स एंड कंडीशंस, किसी विशेष को फेवर करने वाली एलिजिबिलिटी क्रइटेरिया, कमजोर कॉन्ट्रैक्टिंग सिस्टम और प्रशासनिक लापरवाही इत्यादि खामियाँ एक साथ उजागर हो रही हैं।

हाल के महीनों में #CBI ने कई ठेकेदारों और वरिष्ठ रेल अधिकारियों पर रिश्वत के लेन-देन के लिए कार्रवाई की है। पर असली प्रश्न यह है कि इस कड़ी के शीर्ष पर बैठे अधिकारी — विशेषकर जनरल मैनेजर — जो #GCC के तहत कार्रवाई के लिए जिम्मेदार थे/हैं, उन्होंने रिश्वत देने वाली कंपनियों/फर्मों/कॉन्ट्रैक्टरों के विरुद्ध कोई यथोचित कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की!

CBI की कार्रवाई में ठेकेदार/कंपनियों के मालिक और कर्मचारी भी पकड़े जा रहे हैं, पर सिस्टम अभी भी बचा हुआ है! सीबीआई की ऐसी कई कार्रवाईयां हुई हैं मगर खासकर तीन प्रमुख मामलों ने भारतीय रेल की आंतरिक पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं:

  1. #ParasRailtech Pvt Ltd. का मामला — USBRL परियोजना में भ्रष्टाचार की परतें: CBI ने #USBRL (उधमपुर–श्रीनगर–बारामूला रेल लिंक) परियोजना में चीफ इंजीनियर और कॉन्ट्रैक्टर फर्म पारस रेलटेक पर रिश्वत और फर्जी भुगतान के आरोप में FIR दर्ज की। यह मामला केवल एक भ्रष्ट लेन-देन का ही नहीं है। यह एक बड़ी प्रणालीगत विफलता का प्रतीक भी है — जहाँ बिलों की क्लियरेंस, अनुमान बढ़ाने और अतिरिक्त लाभ दिलाने का खेल चलता रहा।
  2. #JhajhariaNirmanLtd. का मामला — रिश्वतखोरी का 32 लाख का सौदा: CBI ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (#SECR) के चीफ इंजीनियर को 32 लाख की रिश्वत लेते पकड़ लिया। कंपनी के मालिक एवं मैनेजिंग डायरेक्टर और कुछ कर्मचारी भी गिरफ्तार हुए। यह घटना बताती है कि ठेकों के आवंटन, सुपरविजन और पेमेंट सिस्टम में घूस एक स्वीकार्य प्रथा बन चुकी है।
  3. #JPWInfratech Pvt Ltd. का मामला — 98.81 लाख की रिश्वत और खराब निर्माण सामग्री: पूर्व मध्य रेलवे (#ECR), हाजीपुर में डिप्टी चीफ इंजीनियर और JPW Infratech के प्रतिनिधियों को 98.81 लाख की रिश्वत के आरोप में पकड़ा गया। सबसे बड़ा आरोप यह था कि अधिकारी जानबूझकर घटिया निर्माण सामग्री को नजरअंदाज कर रहे थे।

यहाँ असली प्रश्न यह उठता है कि उपरोक्त तीनों कंपनियों पर GCC के प्रावधानों का अमल क्यों नहीं किया गया? GM ने अपनी भूमिका क्यों नहीं निभाई?

GCC Condition

जनरल कंडीशंस ऑफ कॉन्ट्रैक्ट (#GCC) में स्पष्ट प्रावधान है कि:

  • कॉन्ट्रैक्ट अनुबंध की तुरंत समाप्ति
  • सभी चालू कार्यों का तुरंत टर्मिनेशन
  • सिक्योरिटी डिपोजिट की पूर्णतः जब्ती
  • भविष्य के टेंडर्स में भागीदारी प्रतिबंधित।
  • रिश्वत देने के आरोपी ठेकेदार/फर्म/कंपनी की तुरंत ब्लैक-लिस्टिंग

लेकिन वास्तविकता यह है कि—उपरोक्त तीनों सहित कई अन्य मामलों में भी CBI की कार्रवाई के बाद भी ठेकेदारों पर GCC के प्रावधानों के तहत कड़ी कार्रवाई नहीं की गई। कुछ मामलों में फर्मों को नए कॉन्ट्रैक्ट भी मिलते रहे। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन महाप्रबंधकों की भूमिका निगरानी और कार्रवाई करने की है—उनकी जवाबदेही तय नहीं की गई—वे प्रमोशन पा रहे हैं, या फिर सुखरूप रिटायर हो रहे हैं।

क्या वास्तव में दोष केवल ठेकेदार का है?

ठेकेदार घूस देता है, लेकिन घूस लेता कौन है? वर्क ऑर्डर कौन देता है? वर्क पास कौन करता है? मेजरमेंट बुक कौन भरता है? बिल कौन पास करता है? GCC के प्रावधान लागू न करने का निर्णय कौन लेता है?

जब सिस्टम के भीतर के अधिकारी ही कार्रवाई रोक दें, तो भ्रष्टाचार केवल फलता-फूलता ही नहीं—संस्थागत बन जाता है।

निष्कर्ष: प्रमोशन रुके, दायित्व तय हो, तभी कुछ सुधार संभव होगा! इसके लिए रेल प्रशासन को ऐसे कुछ कदम तुरंत उठाने होंगे, जैसे-

  1. जिन महाप्रबंधकों/वरिष्ठ अधिकारियों ने GCC लागू नहीं किया—उनका प्रमोशन रोका जाए। उनकी जवाबदेही तय की जाए, और उनके विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित हो, क्योंकि जवाबदेही ऊपर से शुरू होती है, नीचे से नहीं!
  2. CBI मामलों से जुड़े सभी ठेकेदारों पर रेलवे की अपनी स्वतंत्र कार्रवाई अनिवार्य की जाए। रिश्वत देने-लेने वाले दोनों पक्षों पर तुरंत सुनिश्चित कार्रवाई हो!
  3. “Pending inquiry = No promotion” नियम रेलवे में कड़ाई से लागू किया जाए!
  4. रेलवे बोर्ड स्तर पर एक पारदर्शी “Contractor Blacklisting Register” बनाया जाना चाहिए—जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।
  5. बिल पासिंग, मेजरमेंट बुक (MB), टेस्ट रिपोर्ट और क्वॉलिटी कंट्रोल सिस्टम को डिजिटल और टैंपर-प्रूफ बनाया जाए।

अंतिम सत्य यह है कि CBI की कार्रवाई केवल आधी कार्रवाई है! भ्रष्टाचार केवल मजबूरीवश घूस देने वाले ठेकेदारों को पकड़ने या ब्लैकलिस्ट करने से खत्म नहीं होगा। जब तक शीर्ष अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक न तो सिस्टम सुधरेगा, न ही सर्विस सुधरेगी, न ही सर्विस की क्वालिटी सुधरेगी, न ही निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सुधरेगी, न ही सिस्टम पर देश के लोगों का विश्वास बढ़ेगा। अतः आज आवश्यकता है एक साहसी नीति की—जहाँ कार्रवाई नीचे नहीं, ऊपर सुनिश्चित हो!