घरेलू कार्यों में रेलकर्मियों को लगाने की मुफ्तखोरी का दुष्परिणाम!

सत्य घटना पर आधारित एक सत्यकथा: खून ही खून !!

सीनियर सेक्शन इंजीनियर से लेकर ब्रांच अफसरों और विभागों प्रमुखों तक जिस तरह मनमानी पूर्वक रेलकर्मियों का मनमाना और बेजा उपयोग बंगलों और सरकारी आवासों में घरेलू कार्यों के लिए उन्हें व्यक्तिगत गुलाम समझकर किया जाता है, कई बार उसके कितने भयावह दुष्परिणाम पूरे परिवार को भुगतने पड़ते हैं, इसका अंदाजा नहीं होता। लखनऊ सहित ऐसे कई मामले भारतीय रेल के विभिन्न मंडलों एवं जोनों में हो चुके हैं, परंतु यहां जिस मामले का उल्लेख डॉ रवीन्द्र कुमार कर रहे हैं, वह 20 साल पहले दक्षिण मध्य रेलवे, सिकंदराबाद में एक विभाग के बड़े साहब के बंगले पर घटित हुआ था। उन्होंने मामले को एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है और पात्रों के नाम बदल दिए हैं! पढ़ें, और संभव हो तो निरीह रेलकर्मियों को निजी गुलाम समझकर उनका शोषण करने से बाज आएं, जिससे आपके परिवार को ऐसा कोई परिणाम न भुगतना पड़े!

Dr Ravindra Kumar

यह 20 साल से कुछ अधिक पुरानी बात है। 19 मार्च 2003, सोमवार का दिन था। बड़े सॉब ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे थे। 9.30 बजे ऑफिस की गाड़ी आई और वह ऑफिस को निकल गए। बंगला प्यून चंदर ने सॉब के 9 साल के बेटे को बुलाया और आव देखा न ताव उसका गला रेत दिया। मासूम छटपटा भी नहीं पाया। पलक झपकते ही पॉलिथीन और कंबल में लपेटकर उसकी लाश को बाथरूम में छुपा दिया।

ऐसा लगता था कि इसकी सारी तैयारी और रूपरेखा पहले से ही उसने बना रखी थी।

मेम सॉब तब दूसरे बाथरूम में स्नान कर रहीं थीं।

सॉब के तीन बच्चे थे। सॉब दिन भर ऑफिस में और फील्ड में बिजी रहते थे। आए दिन टूर पर (‘लाइन’ पर) निकल जाते। उनका बंगला प्यून अभी लड़कपन में ही था सजने-सँवरने का शौक था। दिन भर अपनी मस्ती में ही रहता। इसके लिए वह मेमसॉब की खूब डांट भी खाता। कहने को वह विवाहित था, पर उसकी पत्नी गाँव में रहती थी।

देखिये, अब किसी भी सॉब का बंगला प्यून बनना किसी की ‘माई एम्बीशन इन लाइफ’ तो होती नहीं। वह तो रेलवे की नौकरी करने आया है। रेलवे की सुविधा यथा फ्री पास, फ्री मेडिकल सुविधा, सरकारी मकान और शानदार वेतन-भत्ते, पेंशन तथा कैरियर के लिए आया है।

अब अगर उसका रास्ता वाया बंगला प्यून है, तो यूं ही सही। कोई भी मन मारकर कम से कम जितने दिन झाड़ू-पोंछा करना है, करता ही है! मेम सॉब की झिड़की सुननी है, तो सुनता ही है। काम तो मेमसॉब ने ही लेना होता है। सॉब तो ऑफिस चले जाते हैं। इस उम्मीद में कि सॉब का ट्रांसफर होने पर या न्यूनतम दिन पूरे होने पर वह भी अन्य की तरह लक-दक कपड़े पहन ठाठ से ऑफिस जाया करेगा।

इस बीच वह या तो खुद ऑफिस हो आया है, या फिर ऑफिस के प्यून लोग ने उसको बढ़ा-चढ़ाकर अपने ऑफिस के सच्चे-झूठे अफसाने सुना रखे होते हैं। अतः ऑफिस में ड्यूटी करने को लेकर उसकी लार टपकती रहती है। शीघ्रश्य: शुभम्!

ऑफिस का खुला-खुला वातावरण। यार-दोस्तों के साथ हंसी-मजाक और अन्य महिला सहकर्मियों का सहचर्य। उन्हें लगता है असली जीवन तो इनका है, वह तो बस घर की चारदीवारी में घुट रहा है। दिन भर दौड़-दौड़ के सारे काम करो। उसके बाद भी चैन नहीं। मेमसॉब या सॉब के बच्चे जब मन किया बेगाने जैसी आवाज देकर बुला लेते, फिर चाहे पानी पीना हो या खाना परोसना हो। बंगला प्यून को खाली बैठा या आराम करता तो देख ही नहीं सकते।

चंदर की मेमसॉब तो कुछ ज्यादा ही परेशान करती हैं, ऐसा चंदर को लगता। असल में काम तो सभी मेमसॉब लेती ही हैं, उसके लिए ही तो नौकरी पर रखा है, मगर दूसरे लोग एक-दूसरे को ऐसे झूठ-मूठ दिखाते बताते कि वह कुछ नहीं करते, दिन भर ऐश करते हैं। बात-बात में और कितनी बार तो छोटी-छोटी बात पर मेमसॉब अपना गुस्सा चंदर पर निकालतीं। कितनी ही बार उन्होने उस पर हाथ भी उठा दिया था। उसका इस बात पर बहुत मजाक बनाया जाता कि उसने इतनी बड़ी-बड़ी जुल्फें क्यों रखी हुई हैं।

वह उम्र के जिस पड़ाव पर था, उसको अपने सजने-सँवरने में कुछ असामान्य न लगता। जबकि उसके बालों को लेकर भी बात का बतंगड़ बनाया जाता। वह गाना गुनगुनाता तो इस बात पर भी उसको जोर की डांट पड़ती। वह सीटी बजाता तो मार खाता। चंदर अंदर ही अंदर घुट रहा था। जब छुट्टी मांगो तब मना कर देतीं। उसको अपने गाँव आने-जाने में ही कितने दिन लग जाते हैं, इस बीच काम कौन करेगा, अतः उसको छुट्टी भी आसानी से नहीं मिलती, बहुत रोना-धोना होता।

इस बार जब वह गाँव गया तो उसकी पत्नी ने भी साथ चलने की जिद की। लेकिन मेमसॉब के व्यवहार को याद कर उसने यही उचित समझा कि पत्नी को गाँव में ही रखा जाए। उसकी मेमसॉब ने पहले ही उसको टेर-टेर कर चेतावनी दे रखी थी कि अभी वह बच्चे-वच्चे करने की सोचे भी नहीं। चंदर को पता था कि पत्नी साथ गई तो मेमसॉब ने उसे भी काम पर जोत देना है। और मिसबिहेव अलग करना है। उसे रात-दिन भला-बुरा कहती है वही नहीं सहा जाता, अब अगर उसकी पत्नी को डाँटेंगी या पत्नी के सामने उसको डाँटेंगी, तो वह तो बिल्कुल भी न सहा जाएगा।

वह भारी मन से छुट्टी से वापस काम पर लग गया। तभी उसको खुशखबरी मिली कि उसकी पत्नी माँ बनने वाली है। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह गाँव जाना चाहता था। जब उसने अपने गाँव जाने की इच्छा जताई तो मेमसॉब ने उसे साफ मना कर दिया गया। सॉब ने भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। फिर उसने ये बताना ही उचित समझा कि उसकी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं वह गर्भ से है।

बस ये सुनना था कि तूफान आ गया। मेमसाब ने उसकी न केवल पिटाई कर दी, उसको खूब भला-बुरा भी कहा। वह अभी बच्चे पैदा न करे, इसकी हिदायत उसको पहले ही दी जा चुकी थी जब वह नौकरी पर आया था। मेमसॉब का मानना था कि फिर चंदर का ध्यान काम में नहीं लगेगा। अपने ही पचड़ों में उलझा रहा करेगा। एक तरह से वह उसकी लाइफ को कंट्रोल करना चाह रहीं थीं, ताकि उनकी दिनचर्या और कामकाज/सेवा में कोई विघ्न-बाधा न पड़े।

अब चंदर को ये लगे कि मेरा बच्चा जो अभी इस दुनिया में आई भी नहीं है, उसको लेकर इतना तूफान और कोसा जा रहा है, जब वह इस दुनिया में होगा, तो उसके साथ ये लोग कैसा व्यवहार करेंगे। और तभी उसने एक फैसला, एक खतरनाक फैसला ले लिया!

चंदर ने अपनी बहन और चार अन्य रिश्तेदारों – उनमें एक चंदर का कजिन था – को अपने क्वार्टर पर बुलाया। बंगले के पीछे ही सर्वेंट क्वार्टर था उसका, जिसमें वह अकेला रहता था। इन चारों लोगों को पीछे के दरवाजे से वह अपने क्वार्टर में चुपचाप ले गया और किसी को कानों-कान खबर न हुई। तीनों के मन में लालच आ गया कि लूटपाट भी कर ली जाए। इतना शानदार बंगला है, गहने-जेवर और धन भी खूब होगा।

छोटे बेटे का गला रेतकर भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ। अब तो सारी प्लानिंग ही बदल चुकी थी। जैसे ही मेमसॉब बाथरूम से निकलीं। चंदर ने उनको पकड़ लिया और एक साथी ने उन पर गोली चला दी। लेकिन हाथापाई में गोली मेमसॉब को न लग के जो चला रहा था उसी को लग गई। बस फिर क्या था, मेमसॉब का भी चाकू से गला रेत दिया गया।

दोपहर को सॉब की छोटी बेटी के स्कूल से आने का समय हो गया। जैसे ही वह आई, इन लोगों ने उसका भी गला काट दिया और उस मासूम की लाश को भी बाथरूम में रख दिया। अब तक उन पर तो जैसे खून सवार हो गया था।

चंदर ने इस सब के बाद सॉब के लिए टिफिन तैयार किया और ऑफिस प्यून – जो टिफिन लेने आता था – के हाथ उसको भिजवा दिया। फिर वे अपने घायल साथी – जिसे गोली लगी थी – को लेकर अस्पताल गए और डॉक्टर को कहानी सुना दी कि फैक्ट्री में एक्सिडेंट से चोट लग गई, बुरी तरह घायल हो गया है, उसको अस्पताल में दाखिल कर वे सभी बंगले में वापिस आ गए और सॉब का इंतजार करने लगे।

शाम को सात बजे सॉब आए तो बंगले में अंधेरा था। चंदर ने ड्राइवर, जो बंगले में आकर सॉब का ब्रीफकेस रखता था, से बाहर ही ब्रीफकेस ले लिया और एकदम नजदीक से पीछे से उनके सिर में गोली दाग दी। सॉब वहीं ढ़ेर हो गए। सभी ने लगभग 44 तोला सोना, महँगी रिस्टवाच और लगभग 50 हजार नकदी अपने कब्जे में ले ली।

चंदर और उसकी बहन और चंदर के एक कजिन को बंगले में छोड़ बाकी दो लोग सामान सहित चले गए। दिन में जब कपड़े धोने वाली और सफाई करने वाली दो मेड इस बीच आई और दफ्तर से कार्पेंटर बेड ठीक करने आया, तो चंदर ने कहा मेमसॉब सो रही हैं और उसको एसिड आदि से बंगले की अच्छी तरह सफाई को बोला है। चंदर और उसकी बहन ने बंगले को धोकर खून के दाग पहले ही मिटा दिए थे।

रात को 11 बजे चंदर और उसके कजिन ने एक-एक कर सभी डेड बॉडी को सॉब की मारुति कार में डाला। रास्ते में पेट्रोल पम्प से 10 लीटर पेट्रोल खरीदा गया और दूर सूनसान इलाके में ले जाकर पेट्रोल छिड़क कर कार को आग लगा दी।

बंगले पर वापस लौटकर चंदर ने कहानी सुनाई कि सॉब अपनी फैमिली के साथ कहीं डिनर पर गए थे अभी तक आए नहीं। एक म्युनिसिपल काउंसिलर ने सुबह-सुबह थाने मे रिपोर्ट कराई कि एक कार उनके इलाके मे धू-धू करके जल रही है। कार तब तक पूरी तरह जल चुकी थी। डेड बॉडी पता चल रही थीं। नंबर प्लेट और चेसिस नंबर से कार के मालिक का पता लगाया गया। तब तक सॉब के बॉस ने बताया कि सॉब की बड़ी बेटी का फोन आया था कि घर में कोई फोन नहीं उठा रहा है, वह राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली से आ रही है और रास्ते में है – वह दिल्ली में पढ़ती थी।

पुलिस का ध्यान चंदर की झुलसी जुल्फों पर गया और फिर उसकी घबराहट और बार-बार बयान बदलने पर भी गया और फिर जो लोग बंगले पर आए थे, यथा कपड़े धोने वाली मेड, बर्तन साफ करने वाली मेड, ऑफिस प्यून, कार्पेंटर आदि के बयान से चंदर का झूठ पकड़ा गया। जरा सी सख्ती से ही वह टूट गया। उसके टूटते ही बाकियों को पकड़ना पुलिस के लिए कठिन नहीं था। उनके कहने पर नजदीक के चर्च के पास के कूड़ेदान से अपराध में प्रयुक्त चाकू और मोबाइल फोन भी बरामद कर लिए गए, साथ ही गहने नगदी आदि भी।

केस चला, कोर्ट से चंदर को फांसी की सजा हुई और बाकी तीन को आजीवन कारावास, जबकि बहन को 6 वर्ष की सजा सुनाई गई।

हाई कोर्ट में अपील पर चंदर की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया, जबकि उसके कजिन का आजीवन कारावास तथा बहन की 6 बरस की सजा बरकरार रही, लेकिन बाकी दो को पर्याप्त सबूत के अभाव में बरी कर दिया गया। यही सजा सुप्रीम कोर्ट तक कायम रही जहां चंदर एंड पार्टी ने अपील की थी।

सबसे पहले चंदर की आग में झुलसी लंबी जुल्फों ने ही शक पैदा किया। अपराध कभी ‘पे’ नहीं करता। देर-सबेर अपराधी न केवल पकड़ा जाता है, बल्कि उसे अपने अपराध की बहुत भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है। जैसे इन लोगों ने अपनी इज्जत, रोजगार और जिंदगी के अमूल्य बरस सलाखों के पीछे रहकर जाना होगा।

सॉब लोग भी ध्यान रखें, यह फिल्मों के बूढ़े रामू काका का जमाना नहीं है। आज का युवा फिर चाहे वह बंगला प्यून हो या कोई और रेलकर्मी, सबकी तरह वह भी जल्दी में है, उसमें सहनशीलता नहीं है, और अगर है, तो बहुत कम है। सबसे बड़ी बात वह अपनी इज्जत, कैरियर और आत्मसम्मान को लेकर कुछ ज्यादा ही ‘टची’ है, यकीन न हो तो अपने खुद के बच्चों को ही देख लें! समाप्त

https://twitter.com/railwhispers/status/1653497350898462720?s=46